
Iran US attack impact India विश्व भर में इन दिनों चिंता की लहर दौड़ रही है, और इसका कारण है ईरान और अमेरिका के बीच तीखा होता तनाव। इस तनाव ने न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होरमुज, जो दुनिया के तेल और गैस की आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, एक बार फिर चर्चा में आ गया है। अमेरिका द्वारा ईरान की तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं पर हमले के बाद से इस संकरे जलमार्ग को बंद करने की आशंका ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है। हालाँकि, भारत—जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है—इस बार आत्मविश्वास से भरा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में अपनाई गई सशक्त रणनीति ने भारत को इस संकट से निपटने के लिए तैयार कर दिया है। आइए, इस जटिल स्थिति को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि इससे भारत पर क्या असर पड़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होरमुज: ऊर्जा की जीवनरेखा
Strait of Hormuz closure India : स्ट्रेट ऑफ होरमुज एक संकरी जलधारा है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ती है। इसकी चौड़ाई सबसे संकरे बिंदु पर मात्र 33 किलोमीटर है, फिर भी यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। प्रतिदिन यहां से लगभग 20.3 मिलियन बैरल कच्चे तेल और 290 मिलियन क्यूबिक मीटर तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का परिवहन होता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अपनी आपूर्ति इसी मार्ग से करते हैं। यह मार्ग इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% और LNG व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यह मार्ग बंद होता है, तो यह न केवल तेल की कीमतों में उछाल लाएगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगा।
ईरान ने हाल के तनाव के बीच इस मार्ग को बंद करने की धमकी दी है, जो वैश्विक मंच पर चिंता का कारण बन गया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के लिए यह कदम आत्मघाती हो सकता है, क्योंकि इस मार्ग पर उसकी अपनी तेल निर्यात निर्भरता भी है, खासकर चीन जैसे बड़े खरीदार के लिए। फिर भी, इस धमकी ने बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है, और तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
अमेरिका-ईरान तनाव: तबाही की आशंका
India oil price hike 2025 22 जून 2025 को अमेरिका ने ईरान की तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं—फोर्डो, नतांज और इस्फहान—पर हमले किए, जिसके बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई है। ईरान ने इस हमले को “अनुचित” करार देते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होरमुज को बंद करने का विकल्प भी शामिल है। यह कदम न केवल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा, बल्कि रूस और चीन जैसे देशों के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी करेगा, जो ईरान के करीबी सहयोगी माने जाते हैं।
रूस, जो पहले से ही यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है, इस स्थिति में सीधे हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह चीन के माध्यम से अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी ओर, चीन—जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है—इस संकट से प्रभावित होगा, क्योंकि उसकी ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। अगर स्ट्रेट ऑफ होरमुज बंद होता है, तो चीन को वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख करना पड़ सकता है, जो उसके आर्थिक हितों को चुनौती देगा।
भारत की स्थिति: आत्मविश्वास से भरा रुख
Petrol diesel price after Iran strike हालांकि स्ट्रेट ऑफ होरमुज भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वहां से उसका लगभग 40% कच्चा तेल और आधा प्राकृतिक गैस आता है, फिर भी भारत इस बार चिंतित नहीं दिख रहा। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी ऊर्जा आयात नीति में बड़े बदलाव किए हैं, जिससे वह वैश्विक अस्थिरता से निपटने में सक्षम हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत कर लिया है, और अब वह केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं है।
वैश्विक व्यापार विश्लेषण फर्म Kpler के आंकड़ों के अनुसार, जून 2025 में भारतीय रिफाइनर 2 से 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) रूसी कच्चे तेल का आयात करने की योजना बना रहे हैं, जो पिछले दो वर्षों का उच्चतम स्तर है। यह मात्रा इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से मिलाकर आयात किए जा रहे 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से भी अधिक है। मई 2025 में रूस से भारत का आयात 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो जून में बढ़कर 2.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके अलावा, अमेरिका से तेल आयात भी मई के 280,000 बैरल प्रतिदिन से बढ़कर जून में 439,000 बैरल प्रतिदिन हो गया है। 1 से 19 जून के बीच, भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 35% हिस्सा रूस से आया, जो इस रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है।
भारत की रणनीतिक तैयारी
India oil import strategy crisis भारत ने स्ट्रेट ऑफ होरमुज पर संकट की आशंका को देखते हुए अपनी आयात नीति में लचीलापन लाया है। रूसी तेल, जो सुएज नहर, केप ऑफ गुड होप या प्रशांत महासागर के रास्ते आता है, होरमुज से स्वतंत्र है। 2022 से अब तक, रूस से भारत का तेल आयात 1% से बढ़कर 40% से अधिक हो गया है, क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारत को छूट दरों पर तेल उपलब्ध कराया। इसके अलावा, भारत अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला और ब्राजील जैसे देशों से आयात बढ़ाने की योजना बना रहा है, हालांकि इन रास्तों पर परिवहन लागत अधिक होगी।
भारत के पास 9-10 दिन के आयात के बराबर रणनीतिक भंडार भी है, जो किसी भी तत्काल आपूर्ति बाधा को संभालने में मदद कर सकता है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 13 जून को आश्वासन दिया कि भारत के पास पर्याप्त ऊर्जा भंडार है और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL), और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने कीमतें स्थिर रखकर पहले से ही मुनाफे का मार्जिन बना लिया है, जो कुछ समय तक दबाव को झेलने में सहायक होगा।

तेल की कीमतों पर असर और भारत की प्रतिक्रिया
अमेरिका के हमले के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें $77 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, और अगर तनाव बढ़ता है, तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह $90 या उससे अधिक हो सकती है। भारत में अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार सब्सिडी या रणनीतिक भंडार से राहत देने की योजना बना सकती है। हालांकि, इससे पहले कि पेट्रोल और डीजल के दामों में उछाल आए, भारत की रिफाइनरियां और नीति निर्माता स्थिति पर नजर रख रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर, अगर स्ट्रेट ऑफ होरमुज बंद होता है, तो तेल की कीमतों में भारी वृद्धि की संभावना है। विश्लेषकों के अनुसार, यह $100 प्रति बैरल तक जा सकता है, जो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। फिर भी, भारत की विविधित आयात रणनीति और भंडार इस संकट को कम करने में मदद कर सकते हैं।
रूस और चीन की भूमिका
रूस, जो यूक्रेन युद्ध में उलझा है, इस संकट में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर पाएगा, लेकिन वह चीन के साथ मिलकर कूटनीतिक दबाव बना सकता है। चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक है, इस स्थिति से प्रभावित होगा। अगर होरमुज बंद होता है, तो चीन को अफ्रीका या अन्य क्षेत्रों से तेल आयात बढ़ाना पड़ेगा, जो उसकी लागत को बढ़ाएगा। यह स्थिति रूस-चीन-ईरान गठबंधन को मजबूत करने की ओर ले जा सकती है, लेकिन साथ ही आर्थिक जोखिम भी बढ़ाएगी।



