
घर……या अहंकार का मंच ? husband wife argument story
शहर के उस मध्यमवर्गीय घर में सब कुछ था —
अच्छी नौकरी, अच्छा वेतन, आधुनिक सोच, सजा-सँवरा ड्रॉइंग रूम…घर में सारी सुविधाएं।
पर जो नहीं था, “वह था सुकून।”
विधि सुबह स्कूल जाती, शाम को लौटती।
आते ही उसका स्वर आदेशात्मक हो जाता।
हर बात पर तर्क वितर्क। तर्क वितर्क तो ठीक था पर वह कुतर्क से अपनी बात रखती थी।
बड़े बुजुर्गों का उसे जरा भी ख्याल नहीं रहता।
सासू माँ को लगता — “बहू अब पहले जैसी नहीं रही।”
पति अमित को लगता — “घर में बात-बात पर कुतर्क क्यों?”
धीरे-धीरे घर में संवाद कम और ताने अधिक हो गए।
विधि कहती — “मैं कमाती हूँ, मुझे अपनी पसंद से जीने का हक है।”
मैं जैसे चाहे वैसे कपड़े पहनूंगी आपको कोई हक नहीं है मुझे रोकने का।
सास कहती — “तुम्हारी कमाई से ही घर नहीं चलता। घर तो तुम्हारे आने से पहले भी चल रहा था।
तुम पढ़ी लिखी हो ,”विद्या से तो विनम्रता आती है बहु।”और अमित… दोनों के बीच खड़ा,
कभी इधर झुकता, कभी उधर। वो तो खिलोना बन गया।
एक दिन बात इतनी बढ़ी कि तलाक शब्द हवा में तैर गया।
बहू ने अपने तैवर दिखाते हुए कहा,” मुझे आपके साथ नहीं रहना, मुझे तलाक दे दो।”
दीवारें भी जैसे काँप उठीं। उसी शाम गांव से मांगी काकी आई थीं।
आस-पड़ोस से उन्होंने सब सुन लिया था
लाठी टेकती हुई आँगन में बैठीं और सब सुनती रहीं।
फिर बोलीं — “इतना शोर क्यों है इस घर में?
घर है या अदालत?”
सब चुप।
काकी ने पहले सास की ओर देखा —क्यों रे तुझे ही नौकरी वाली बहू चाहिए थी न ? अब जब
“बहू नौकरी करती है ,तो बुरा क्या ?
तुमने ही तो पढ़ाई की दुहाई दी थी।
अब उसके पंख देख डर क्यों रही हो ?”
फिर विधि की ओर मुड़ीं — “और तू बिटिया,
कमाई से कद बड़ा होता है,
पर जुबान बड़ी हो जाए, तो घर छोटा पड़ जाता है।
तलाक कोई खिलौना नहीं,जिसे गुस्से में उछाल दिया जाए।
तुझे अपनी कमाई पर इतना क्या घमंड ?
“तुझसे पहले भी यह घर चलता था”
तुझे कपड़े पहनने का भी ढंग नहीं, तुझे देख कर दूसरी बहूएं भी बिगड़ रही है।
शिक्षक तो समाज के लिए आदर्श होता है, तू बच्चों को क्या सिखाएगी।
काकी अमित से बोलीं — “और तू… बीच में खड़ा तमाशबीन मत बन।
घर का पुरुष है,अगर मौन रहेगा, तो दीवारें ही बोलेंगी।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
काकी ने आख़िरी बात कही —“घर… अहंकार का मंच नहीं होता।
यह वह जगह है जहाँ कोई जीतता नहीं, “सब साथ जीते हैं।”
जिस दिन तुमने,” ‘मैं’ छोड़कर ‘हम’ सीख लिया बहु, यह घर स्वर्ग बन जाएगा।”
उस दिन यह मकान फिर से घर सा लगेगा।”
बात बात पर अपने पीहर से तुलना मत किया कर, अब यही तेरा घर है।
बाप के घर में बेटी, कैसे भी रहे। ससुराल में ससुराल के हिसाब से रहना पड़ता है।
उस रात पहली बार विधि ने सास के कमरे में जाकर चाय दी।
अमित ने दोनों के बीच बैठकर बात की।
बहस ही खत्म नहीं हुई, संवाद शुरू हो गया था।
और शायद यही किसी भी घर की असली शुरुआत होती है।

वीणा वैष्णव ‘रागिनी’
राजसमंद
