
Acharya Mahashraman Biography : जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान (ग्यारहवें) आचार्य महाश्रमण का व्यक्तित्व केवल एक संत का नहीं, बल्कि एक जीवंत क्रांति का नाम है। अहिंसा, सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के लिए उन्होंने अपने पैरों से धरती को नापी है – वह भी तब, जब दुनिया हवाई जहाज़ और बुलेट ट्रेन की रफ्तार में जी रही है। आज 63 वर्ष की आयु में भी उनके चरणों में थकान नहीं, केवल करुणा और संकल्प है।
विक्रम संवत् २०१९, वैशाख शुक्ल नवमी (13 मई 1962)। राजस्थान के चूरू जिले की धार्मिक नगरी सरदारशहर में दूगड़ परिवार में माता नेमादेवी जी की कोख से एक बालक ने जन्म लिया। पिता झूमरमल ने उसका नाम रखा – मोहन। बचपन से ही मोहन में जो गुण दिखाई दिए, वे साधारण नहीं थे – असाधारण विनम्रता, गजब की एकाग्रता, पाप से डरने वाला कोमल हृदय और ज्ञान के प्रति अतृप्त प्यास। कोई नहीं जानता था कि यही बालक एक दिन लाखों-करोड़ों लोगों का हृदय परिवर्तन करने वाला बनेगा। मात्र सात वर्ष की अल्पायु में पिता का साया उठ गया। जीवन की क्षणभंगुरता ने छोटी-सी उम्र में ही उन्हें गहरे वैराग्य की ओर धकेल दिया। माँ नेमादेवी ने अपने स्नेह की छाँव ऐसा दिया कि बालक को कभी पिता की कमी खलने न दी। माँ का संस्कार और जीवन की नश्वरता का बोध – यही दो बीज थे जिनसे महान तपोवृक्ष फला-फूला।
दीक्षा : मात्र 12 वर्ष की उम्र में संन्यास
Acharya Mahashraman age : विक्रम संवत् २०३१, वैशाख शुक्ला १४ (5 मई 1974)। आचार्य श्री तुलसी दिल्ली में थे। बारह वर्षीय बालक मोहन ने उनसे दीक्षा की अभिलाषा व्यक्त की। आचार्य तुलसी ने परीक्षा ली और सरदारशहर की उसी पुण्य भूमि पर मुनि सुमेरमल (लाडनूँ) को उन्हें दीक्षा देने की आज्ञा दी। उस दिन मोहन से मुनि मुदित कुमार बन गए। बाहरी वस्त्र बदले, आँखों की चमक बदली, बोलने का लहजा बदला, पर सबसे बड़ा बदलाव हुआ – अंदर का। संयम, स्वाध्याय, ध्यान और गुरु-सेवा अब उनका जीवन बन गया। संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, अंग्रेजी – हर भाषा में गहरी पकड़। आँखें प्रायः नीची, वाणी मधुर और कम, मन शांत। आचार्य तुलसी और बाद में युवाचार्य महाप्रज्ञ के सान्निध्य में रहकर उन्होंने ज्ञान का जो अमृत पिया, वह आज भी जन-जन तक पहुँच रहा है।

महाश्रमण की पदवी : एक नया इतिहास
विक्रम संवत् २०४६, भाद्रपद शुक्ल नवमी (6 सितंबर 1989)। लाडनूँ में आचार्य तुलसी के पट्टोत्सव के पावन अवसर पर एक नया पद सृजित हुआ – महाश्रमण। संघ में यह पद आचार्य और युवाचार्य के बाद तीसरा सर्वोच्च पद था। मुनि मुदित कुमार को यह गरिमामय पदवी प्रदान की गई। शासन गौरव मुनि बुद्धमल ने उन्हें सम्मान-सूचक पछेवड़ी ओढ़ाई। उस दिन से मुनि मुदित → महाश्रमण महाश्रमण कहलाए।
युवाचार्य से आचार्य तक का पावन सफर
Acharya Mahashraman walking journey : 5 फ़रवरी 1997 को आचार्य महाप्रज्ञ ने अप्रत्याशित रूप से युवाचार्य की घोषणा की। सर्दी की उस सुबह चौपड़ा हाईस्कूल के मैदान में लाखों श्रावक-श्राविकाओं के सामने आचार्य महाप्रज्ञ ने पुकारा – “आओ मुदित!” और जैसे ही वह एक शब्द गूंजा, लाखों हाथ आकाश की ओर उठे, जयकारों से धरती-अंबर काँप उठा। महाश्रमण युवाचार्य बन गए।
9 मई 2010 को आचार्य महाप्रज्ञ का सरदारशहर में आकस्मिक महाप्रयाण हुआ। ठीक 14 दिन बाद, 23 मई 2010 को सरदारशहर से कुछ ही दूरी पर स्थित गांधीनगर (लाडनूँ) के गांधी विद्या मंदिर प्रांगण में भव्य पट्टाभिषेक समारोह हुआ। देश के शीर्ष राजनेता लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, तत्कालीन राजस्थान स्वास्थ्य मंत्री सहित 35 हजार से अधिक श्रद्धालु उपस्थित थे। उस दिन महाश्रमण तेरापंथ के ग्यारहवें आचार्य बने।
प्रेक्षा ध्यान : आत्म-शुद्धि और आंतरिक परिवर्तन का विज्ञान
Terapanth Acharya Mahashraman : आचार्य महाश्रमण, जिन्होंने प्रेक्षा ध्यान को जीवन में धारण कर उसकी गहनतम अनुभूति प्राप्त की है, आज मानव जाति को आंतरिक परिवर्तन के मार्ग पर प्रेरित कर रहे हैं। प्रेक्षा ध्यान के प्रणेता आचार्य श्री महाप्रज्ञ के सान्निध्य में उन्होंने वर्षों तक ध्यान के सूक्ष्म रहस्यों का आत्मिक अध्ययन किया। उनके द्वारा संचालित ध्यान शिविरों से अब तक दुनिया भर के 5,50,000 से अधिक लोग शांति, संतुलन और मानसिक आनंद का अनुभव कर चुके हैं। प्रेक्षा ध्यान विधि वर्ष 1975 में गणाधिपति तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ के अथक शोध, साधना और अनुभव का परिणाम है। यह विधि पारंपरिक जैन आगम, आधुनिक विज्ञान तथा व्यावहारिक प्रयोगों का अद्वितीय समन्वय है। भगवान महावीर द्वारा साधित ध्यान पद्धतियों का 20 वर्षों तक गहन अध्ययन करने के बाद आचार्य महाप्रज्ञ ने उसे सरल, वैज्ञानिक और अनुपालन योग्य रूप में प्रेक्षा ध्यान के रूप में प्रस्तुत किया।
सरल शब्दों में ‘प्रेक्षा’ का अर्थ है—स्वयं को देखना, अपने शरीर, मन, प्राण और आत्मा में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म स्पंदनों को बिना राग-द्वेष के अनुभव करना। यह केवल ध्यान नहीं, बल्कि चेतना की शुद्धि का गहन अभ्यास है। प्रेक्षा ध्यान का मूल उद्देश्य है—चेतना का परिष्कार, दृष्टिकोण में परिवर्तन, व्यवहार में सुधार, विचारों की पवित्रता और आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति। यह ध्यान पद्धति मानसिक तनाव को कम करने, भावनाओं को संतुलित करने, आंतरिक ऊर्जा को पुनर्संरचित करने और एकाग्रता को विकसित करने में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह सिद्ध किया है कि प्रेक्षा ध्यान मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के साथ-साथ शारीरिक और भावनात्मक व्याधियों को दूर करने में भी सहायक है। यह ध्यानात्मक शांति का वह द्वार है जो व्यक्ति को आत्म-बल, आत्म-विश्वास और आत्म-नियंत्रण प्रदान करता है। देश और दुनिया के अनेक शहरों में प्रेक्षा ध्यान के हजारों शिविर आयोजित हो चुके हैं, जिनमें विभिन्न संस्कृतियों और देशों के लोगों ने भाग लेकर आंतरिक रूपांतरण का अनुभव किया है। निरंतर अभ्यास इसे और अधिक प्रभावी बना देता है। आज आचार्य श्री महाश्रमण के मार्गदर्शन में प्रेक्षा ध्यान लाखों जीवनों को आलोकित कर रहा है और मानवता को एक नए चेतना-युग की ओर अग्रसर कर रहा है।
अहिंसा यात्रा : विश्व की सबसे लंबी पैदल आध्यात्मिक यात्रा
Jain Acharya Mahashraman life story : 9 नवंबर 2014 को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से आचार्य महाश्रमण ने अहिंसा यात्रा प्रारंभ की। तीन मुख्य संकल्प थे – सद्भावना, नैतिकता, नशामुक्ति। आज तक यह यात्रा 60,000 किलोमीटर से अधिक पूर्ण हो चुकी है। इस यात्रा में 1 करोड़ से अधिक लोगों ने नशीली चीजों का हमेशा के लिए त्याग कर दिया। वहीं 55 लाख से अधिक लोगों ने जीवनपर्यंत शाकाहारी बने रहने का संकल्प लिया।
संस्थाएँ और योगदान
आचार्य के मार्गदर्शन में चल रही प्रमुख संस्थाएँ –
- जैन विश्वभारती (डिम्ड विश्वविद्यालय), लाडनूँ
- अणुव्रत महासमिति
- तेरापंथ प्रोफुलेंस महासभा
- जीवन विज्ञान अकादमी
- प्रेक्षा ध्यान केंद्र
महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, बाल संस्कार, युवा जागृति – हर क्षेत्र में उनका सक्रिय योगदान है।
सम्मान और प्रशस्तियाँ
- भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा प्रशंसा
- राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा पुस्तक “विजयी बनो” का लोकार्पण (10 जुलाई 2013)
- पेसिफिक यूनिवर्सिटी द्वारा “शांतिदूत” की उपाधि
- दिगंबर जैन समाज द्वारा “श्रमण संस्कृति उद्गाता” सम्मान
प्रमुख पुस्तकें (कुछ)
- आओ हम जीना सीखें
- क्या कहता है जैन वाङ्मय
- दुख-मुक्ति का मार्ग
- संवाद भगवान से
- विजयी बनो
- धम्मो मंगल मुखित्तम
- महात्मा महाप्रज्ञ (जीवनी)
