
Illegal mining in Aravalli hills : सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में जारी अवैध खनन को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता जताई है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान Chief Justice of India (CJI) सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि अदालत की सख्त रोक के बावजूद अरावली क्षेत्र में गैरकानूनी खनन गतिविधियां जारी हैं। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं, जिन्हें भविष्य में सुधारा जाना संभव नहीं रहेगा।अरावली पहाड़ियों से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, Justice Joymalya Bagchi और Justice Vipul M. Pancholi की तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि अब केवल आदेश देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी और वैज्ञानिक हस्तक्षेप की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए कि अरावली में अवैध खनन पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए एक Expert Committee का गठन किया जाएगा। इस समिति में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा, ताकि समस्या का समाधान वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और कानूनी दृष्टिकोण से किया जा सके। कोर्ट ने राजस्थान सरकार से स्पष्ट गारंटी भी ली कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का खनन—चाहे वह वैध हो या अवैध—न होने दिया जाए।
कोर्ट रूम से Live Proceedings की अहम बातें
Bench:
Supreme Court Aravalli mining case : अब तक जारी अंतरिम आदेश (Interim Order) यथावत रहेगा।
CJI सूर्यकांत:
कुछ अवैध गतिविधियां अब भी जारी हैं। अगर समय रहते इन्हें नहीं रोका गया, तो इससे पर्यावरण को ऐसा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
CJI:
नई रिट याचिकाएं (Writ Petitions) दाखिल न की जाएं। हमें अच्छी तरह मालूम है कि ये याचिकाएं किस उद्देश्य से लाई जा रही हैं।
कपिल सिब्बल का हस्तक्षेप
Aravalli hills mining ban : हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने कहा कि अरावली पर्वतमाला का इतिहास सभी जानते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अरावली की परिभाषा केवल कागजों के आधार पर नहीं, बल्कि Scientific Basis और भूवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर तय होनी चाहिए। इस पर CJI ने कहा कि अदालत को विभिन्न क्षेत्रों—जैसे Geology, Environmental Science, Ecology और Law—के विशेषज्ञों की जरूरत है। सभी पक्ष अपने-अपने सुझाव दें, ताकि चरणबद्ध तरीके से विशेषज्ञों की एक मजबूत टीम तैयार की जा सके।

30 मिनट की प्रारंभिक सुनवाई की मांग
Supreme Court on illegal mining : कपिल सिब्बल ने अदालत से अनुरोध किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर कम से कम 30 मिनट की प्रारंभिक सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिमालय और अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमालाओं को किसी एक सख्त परिभाषा में बांधना संभव नहीं है, क्योंकि इनमें लगातार Tectonic Movements होते रहते हैं।
जमीनी हकीकत सामने लाने की कोशिश
एक अन्य वकील ने अदालत को बताया कि उन्होंने किसानों के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर काम किया है और कई इलाकों की Geo-Tagging भी की गई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Suo Motu Order का स्वागत करते हुए कहा कि इससे वास्तविक स्थिति सामने लाने में मदद मिलेगी।
29 दिसंबर 2025 के आदेश का हवाला
Rajasthan illegal mining news : CJI सूर्यकांत ने कहा कि 29 दिसंबर 2025 को दिए गए आदेश के संदर्भ में कोर्ट के समक्ष एक विस्तृत नोट और कुछ अहम सवाल रखे जाएंगे, ताकि सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सही और स्थायी फैसला लिया जा सके। राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए K.M. Natarajan ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि राज्य सरकार तत्काल प्रभाव से यह सुनिश्चित करेगी कि प्रदेश में कहीं भी अवैध खनन न हो।इसके साथ ही कोर्ट ने कपिल सिब्बल की ओर से दायर अंतरिम आवेदन को मंजूरी दे दी।
100 मीटर पहाड़ियों पर खनन को लेकर उठा था विवाद
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को एक आदेश में 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों पर खनन की अनुमति दी थी। इस आदेश के बाद देशभर में 100 मीटर की परिभाषा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। बढ़ते विरोध और चिंताओं को देखते हुए कोर्ट ने 29 नवंबर को अपने ही आदेश पर रोक लगा दी थी। साथ ही मामले की गहराई से जांच के लिए एक Expert Committee गठित करने के निर्देश दिए गए थे। इसके अलावा केंद्र सरकार और अरावली से जुड़े चार राज्यों—राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा—को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा गया था।
अरावली संरक्षण ही असली मकसद: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ किया कि यह मामला किसी प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच की कानूनी लड़ाई नहीं है। अदालत का मुख्य उद्देश्य Aravalli Mountain Range Conservation है। पीठ ने कहा कि 29 दिसंबर 2025 के आदेश में जिन बिंदुओं को स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए रेखांकित किया गया था, उन्हें देखते हुए अब अरावली की परिभाषा से जुड़े Scientific, Environmental, Geological और Legal Aspects की दोबारा समीक्षा बेहद जरूरी हो गई है।
