
Middle class wedding struggle : प्राइवेट ऑफिस के क्लर्क मोहनलाल के तीन लड़कियां हैं, सबसे बड़ी छब्बीस वर्ष की है, जिसकी शादी हो चुकी है, दूसरी अभी तेईस वर्ष की है और पढ़ाई कर रही है, वहीं तीसरी सत्रह वर्ष की है, जो अभी स्कूल में पढ़ रही है। मोहन लाल की तनख्वाह साठ हजार रुपए है,पचास हजार रुपए घर खर्च, बच्चों की पढ़ाई और कुछ लोन की किस्त में खत्म हो जाते हैं, दस हजार रुपए मोहनलाल जैसे तैसे बचा लेता है, क्योंकि उसको पता है, अभी उसके सर पर दो बेटियों की शादी का बोझ है, मोहनलाल की पत्नी सुशीला अपनी बच्चियों को उच्च शिक्षा देकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती है, लेकिन वह इस बात से भी चिंतित है कि उसकी बेटियों की शादी में अन्य खर्च के अलावा जो दहेज के नाम पर सोना दिया जाता है, आखिर उसकी व्यवस्था कैसे होगी और यह चिंता जायज भी है, क्योंकि आज के समय में सोने की बढ़ती कीमत से आज हर मध्यम वर्ग चिंतित नजर आ रहा है, इस कहानी में मोहनलाल और सुशीला और कोई नहीं है बल्कि आप और हम हैं, यह कहानी सभी मध्यवर्गी परिवारों की है।

सोना बना मध्यम वर्ग के लिए अभिशाप
Gold jewellery burden middle class : भारत में विवाह जब होता है, तो उसमें दूल्हा दुल्हन को सोने के जेवर देने की प्रथा है, लेकिन आज के हालात में अगर देखा जाए तो मध्यम वर्ग पहले ही बढ़ती महंगाई से परेशान है, और उसमें सोने की अंधाधुंध बढ़ती हुई कीमतें उसे और ज्यादा परेशान कर रही है।
Rising gold rates impact on marriage : भारत का मध्यम वर्ग अपनी शानो शौकत के लिए सोने के जेवर नहीं खरीदता, बल्कि अपने बेटे-बेटियों के विवाह के लिए सोने के आभूषण खरीदता है, ताकि समाज में उनको हीन दृष्टि से नहीं देखा जाए, और उसका मान सम्मान बचा रहे। वह शादी के लिए कर्ज लेता है, और उस दो दिन की शादी के लिए जो उसने कर्ज लिया है उसको जिंदगी भर चुकाता रहता है, लेकिन आज के परिपेक्ष में हमें इस कुरिति के बारे में सोचना पड़ेगा, हमें समाज स्तर पर इस पर परिचर्चा करनी पड़ेगी, क्योंकि शादी विवाह में आज के समय में दिखावा इतना हावी हो गया है कि जिसके चलते एक विवाह के बाद वह पिता अपने परिवार में दूसरा विवाह करने के लिए बहुत ही चिंतित रहने लगता है। चिंता के कारण पूरे परिवार में एक अशांति का माहौल भी उत्पन्न होने लगता है। गृहक्लेश कई बार तो इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है और अगर इसके मूल में देखा जाए तो हमें समाज में अपना दिखावा ही नजर आता है।

क्या शादी में सोने के गहनों की परंपरा खत्म होनी चाहिए?
Marriage and financial pressure India : इसके लिए अब हमें सामाजिक स्तर पर कुछ प्रयास करने होंगे जिसमें यह तय किया जाए की विवाह में कम से कम व्यय किया जाए। झूठी प्रतिष्ठा को दिखाने के चक्कर में आने वाले समय को अपने लिए दुखदाई ना बनाया जाए। विवाह में पाच ग्राम या दस ग्राम सोने के गहने से ज्यादा नहीं दिया जाए और हो सके तो सोने के जेवर देने का प्रचलन ही बंद कर दिया जाए। ताकि आने वाले समय में किसी मध्यम वर्ग के परिवार की लड़की या लड़के को सोने के आभूषणों की वजह से विवाह से वंचित न रहना पड़े।
Indian wedding expenses middle class : अगर आपको भी यही लगता है की आने वाले समय में इस तरह विवाह में सोने के जेवरों का लेनदेन मध्यम वर्ग में विवाह का संतुलन बिगाड़ सकता है, तो सभी को सामाजिक स्तर पर इस पर मनन और चिंतन करना जरूरी होगा, क्योंकि इसका हल सामाजिक स्तर पर ही निकाला जा सकता है, नहीं तो आने वाले कुछ सालों में हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को इस सोने के लेनदेन की वजह से खोते हुए नजर आएंगे।

राहुल दीक्षित RD
काव्य गोष्ठी मंच कांकरोली
