
Ncert Book Controversy : राजस्थान का गौरवशाली इतिहास एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। इस बार विवाद का कारण राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक है, जिसमें जैसलमेर को मराठा साम्राज्य के अधीन दर्शाया गया है। इस दावे ने जैसलमेर के पूर्व राजपरिवार और इतिहास प्रेमियों में आक्रोश पैदा कर दिया है। पूर्व राजपरिवार के सदस्यों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला करार दिया है। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस गलत चित्रण को तत्काल सुधारने की मांग की है।
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक, “Exploring Society: India and Beyond”, के तीसरे अध्याय (इकाई 3, पृष्ठ 71) में एक मानचित्र प्रकाशित किया गया है, जिसमें जैसलमेर को 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। इस मानचित्र को जैसलमेर के पूर्व राजपरिवार ने ऐतिहासिक रूप से भ्रामक और तथ्यहीन बताया है। उनके अनुसार, यह न केवल जैसलमेर की ऐतिहासिक स्वतंत्रता को नकारता है, बल्कि राजस्थान की अन्य रियासतों की स्वायत्तता को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करता है। जैसलमेर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य चैतन्यराज सिंह ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “जैसलमेर को मराठा साम्राज्य के मानचित्र में शामिल करना पूरी तरह से अनुचित और तथ्यहीन है। ऐतिहासिक दस्तावेजों, राजकीय अभिलेखों और प्रामाणिक स्रोतों में कहीं भी मराठा साम्राज्य का जैसलमेर पर प्रभुत्व, कराधान, आक्रमण या हस्तक्षेप का उल्लेख नहीं है।” उन्होंने इसे एक गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि करार देते हुए एनसीईआरटी की विश्वसनीयता और अकादमिक गंभीरता पर सवाल उठाए।
चैतन्यराज ने आगे कहा, “यह केवल एक मानचित्र की गलती नहीं है, बल्कि जैसलमेर की ऐतिहासिक गरिमा, सांस्कृतिक पहचान और विद्यार्थियों को प्रदान किए जाने वाले ज्ञान की सत्यता से जुड़ा मामला है। एनसीईआरटी जैसी प्रतिष्ठित संस्था से इस तरह की भूल न केवल निराशाजनक है, बल्कि यह हमारी भावनाओं को भी ठेस पहुंचाती है।”
जैसलमेर फोर्ट पैलेस म्यूजियम का बयान
NCERT Jaisalmer Maratha controversy : जैसलमेर फोर्ट पैलेस म्यूजियम एंड हेरिटेज सेंटर के निदेशक देवेंद्र प्रताप सिंह ने भी इस मामले में अपनी आपत्ति दर्ज की। उन्होंने कहा, “जैसलमेर रियासत का मराठा साम्राज्य से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध कभी नहीं रहा। न तो मराठाओं का यहाँ शासन था, न ही कोई कर संबंध। फिर भी, एनसीईआरटी के इस मानचित्र में जैसलमेर को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।” उन्होंने इस त्रुटि को जैसलमेर के निवासियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ बताते हुए तत्काल सुधार की मांग की।
राजस्थान के अन्य राजपरिवारों का विरोध
Rajasthan royal families protest NCERT book : यह विवाद केवल जैसलमेर तक सीमित नहीं है। राजस्थान के अन्य पूर्व राजपरिवारों ने भी एनसीईआरटी के इस दावे को गलत और भ्रामक बताया है। बूंदी के पूर्व राजपरिवार के सदस्य ब्रिगेडियर भूपेश सिंह हाड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने लिखा, “यह कौन सा काल्पनिक साम्राज्य है, जिसने राजपूताना पर शासन किया? हम कभी भी मराठा साम्राज्य के अधीन नहीं थे। मनगढ़ंत कहानियों से हमारे स्वाभिमान को ठेस न पहुंचाएं।”
Jaisalmer History : इसी तरह, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह, जो अलवर के पूर्व राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं, ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने X पर लिखा, “इतिहास को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए, न कि क्षेत्रीय या राजनीतिक एजेंडों के आधार पर। एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में मराठा साम्राज्य के विस्तार का दावा ऐतिहासिक रूप से गलत और भ्रामक है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 18वीं शताब्दी में राजस्थान की रियासतें, जैसे मारवाड़, मेवाड़, बीकानेर, जयपुर, भरतपुर, जैसलमेर और अलवर, अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम थीं।
मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और नाथद्वारा से विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ ने भी इस मामले में अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, “पहले हमें ब्रिटिश शासन के अधीन बताया गया, और अब मराठा शासन के अधीन दिखाया जा रहा है। एनसीईआरटी के विशेषज्ञ आखिर भारत के तथ्यात्मक इतिहास को सही रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम हैं या नहीं? इस पर गंभीर सवाल उठते हैं।”
राजसमंद सांसद की केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात
Mahima Kumari Mewar : इस विवाद को लेकर राजसमंद की सांसद महिमा कुमारी मेवाड़ ने 6 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मुलाकात की। उन्होंने एनसीईआरटी की किताब में मेवाड़ और जैसलमेर को मराठा साम्राज्य के अधीन दिखाए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई। सांसद मेवाड़ ने कहा, “मेवाड़ का इतिहास स्वतंत्रता और स्वाभिमान का प्रतीक रहा है। इसे किसी भी तरह से विकृत करना न केवल गलत है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।” उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से इस त्रुटि को प्राथमिकता के आधार पर सुधारने का अनुरोध किया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और आवश्यक सुधार करने का आश्वासन दिया।
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की प्रतिक्रिया
राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने भी इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वे इस मामले को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष उठाएंगे और तथ्यों की जांच के लिए पत्र लिखेंगे। दिलावर ने इस त्रुटि को गंभीर बताते हुए कहा कि यह न केवल ऐतिहासिक सत्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बल्कि विद्यार्थियों के मन में गलत धारणाएं भी पैदा करता है।

इतिहासकारों का दृष्टिकोण
प्रख्यात इतिहासकार देवेंद्र कुमार भगत ने इस मुद्दे पर विस्तृत टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “एनसीईआरटी की किताब में जैसलमेर को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाना पूरी तरह से तथ्यहीन है। न केवल जैसलमेर, बल्कि मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़ और बीकानेर जैसी राजस्थान की प्रमुख रियासतें कभी भी मराठा साम्राज्य के अधीन नहीं रहीं।” उन्होंने मराठा इतिहासकार गोविंद स्वरूप सरदेसाई की पुस्तक और अन्य प्रामाणिक स्रोतों, जैसे यदुनाथ सरकार और डॉ. सतीश चंद्रा की रचनाओं का हवाला देते हुए कहा कि इनमें कहीं भी राजस्थान पर मराठा आधिपत्य का उल्लेख नहीं है।
भगत ने यह भी बताया कि मराठा सूबेदारों, जैसे बाजीराव प्रथम, महाजी सिंधिया और होल्कर, ने मालवा तक अपनी सीमाओं का विस्तार किया, लेकिन राजपूताना में उनकी कोई प्रत्यक्ष सत्ता नहीं थी। उन्होंने 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि इस युद्ध में मराठाओं की हार हुई थी, लेकिन राजपूताना की रियासतों ने हमेशा उनकी स्वायत्तता का सम्मान किया।



