
नई दिल्ली। petrol price loss : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेज उछाल ने भारत की तेल कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई बाधित होने के कारण कच्चे तेल के दाम लगातार ऊपर जा रहे हैं, जबकि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। इसका सीधा असर सरकारी और निजी तेल कंपनियों के मुनाफे पर पड़ रहा है।
रेटिंग एजेंसी ICRA की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में तेल कंपनियां हर लीटर पेट्रोल पर करीब 14 रुपए और डीजल पर लगभग 18 रुपए का नुकसान झेल रही हैं। यानी कंपनियां महंगे दाम पर कच्चा तेल खरीद रही हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को पुराने या नियंत्रित रेट पर ईंधन बेचने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल, LPG और CNG समेत कई ऊर्जा उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
मिडिल ईस्ट तनाव से चरमराई Oil Supply Chain
crude oil price hike : दरअसल, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की Oil Supply Chain को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र में जारी संघर्ष और समुद्री मार्गों पर बढ़ती अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
कुछ सप्ताह पहले तक जो Crude Oil 70 से 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मिल रहा था, उसकी कीमत अब बढ़कर 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। यह तेजी सिर्फ कुछ दिनों की नहीं, बल्कि लगातार बनी हुई है।
तेल बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक अस्थिरता के कारण निवेशकों में घबराहट बढ़ी है, जिससे फ्यूचर मार्केट में भी कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जा रही हैं।
61 दिनों में इंडियन बास्केट 42 डॉलर महंगा
oil companies petrol loss per litre : भारत के लिए सबसे अहम इंडियन बास्केट क्रूड की कीमतों में भी जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
| कच्चा तेल | 27 फरवरी | 30 अप्रैल |
|---|---|---|
| इंडियन बास्केट | 71 डॉलर प्रति बैरल | 113 डॉलर प्रति बैरल |
| ओपेक बास्केट | 70 डॉलर प्रति बैरल | 109 डॉलर प्रति बैरल |
| ब्रेंट क्रूड | 73 डॉलर प्रति बैरल | 119 डॉलर प्रति बैरल |
| WTI क्रूड | 67 डॉलर प्रति बैरल | 107 डॉलर प्रति बैरल |
सिर्फ 61 दिनों के भीतर इंडियन बास्केट लगभग 42 डॉलर प्रति बैरल महंगा हो चुका है। इसका असर सीधे भारत के Import Bill पर पड़ रहा है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
होर्मुज रूट पर संकट, दुनिया की सप्लाई प्रभावित
crude oil 120 dollar barrel : विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा Strait of Hormuz से गुजरता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार की lifeline माना जाता है।
दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और LNG व्यापार इसी रास्ते से होता है। मिडिल ईस्ट संकट के कारण इस रूट पर तनाव बढ़ने से शिपमेंट प्रभावित हो रहे हैं। परिणामस्वरूप Transport Cost, Insurance Premium और Freight Charges सभी बढ़ गए हैं। इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि Chemical, Plastic, Fertilizer और Manufacturing सेक्टर भी प्रभावित हो रहे हैं।
LPG पर सरकार और कंपनियों पर दोहरा बोझ
Middle East oil crisis : कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर घरेलू रसोई तक पहुंच चुका है। तेल कंपनियां लागत बढ़ने के बावजूद उपभोक्ताओं को सीमित कीमतों पर LPG सिलेंडर उपलब्ध करा रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, यदि मौजूदा स्थिति जारी रही तो चालू वित्त वर्ष में कंपनियों को LPG बिक्री पर लगभग 80,000 करोड़ रुपए तक की Under-Recovery झेलनी पड़ सकती है। सरल शब्दों में समझें तो यदि किसी कंपनी को गैस सिलेंडर खरीदने, भरने और वितरण में 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन बाजार या सरकारी नीति के कारण उसे 80 रुपए में बेचना पड़ता है, तो शेष 20 रुपए का अंतर Under-Recovery कहलाता है। अभी पेट्रोल, डीजल और LPG के मामले में कंपनियां इसी दबाव का सामना कर रही हैं।
खाद महंगी होने की आशंका, खेती लागत बढ़ेगी
कच्चे तेल और Natural Gas की कीमतें बढ़ने से Fertilizer Industry भी प्रभावित हो रही है। यूरिया और अन्य रासायनिक खाद बनाने में गैस और पेट्रो-आधारित उत्पादों का बड़ा उपयोग होता है।
सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए खाद सब्सिडी पर 1.71 लाख करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया था, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह खर्च बढ़कर 2.25 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
यदि यह लागत लगातार बढ़ती रही तो किसानों की खेती लागत भी बढ़ सकती है, जिसका असर कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर देखने को मिल सकता है।

CNG पर भी दबाव, शहरों में बढ़ सकती है परेशानी
शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन और निजी वाहनों में इस्तेमाल होने वाली CNG भी इस संकट से अछूती नहीं है।
विश्लेषकों का कहना है कि Gas Distribution कंपनियां फिलहाल बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। इससे उनके Profit Margin में गिरावट आने लगी है।
यदि अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार में कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले समय में CNG दरों में भी संशोधन संभव है।
केमिकल और प्लास्टिक सेक्टर पर Negative Outlook
ICRA ने अपनी रिपोर्ट में Chemical, Plastic और Fertilizer Sector के लिए भविष्य को Negative Outlook बताया है।
इन उद्योगों में कच्चे तेल और गैस आधारित Raw Material का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में इनपुट लागत बढ़ने से कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ रही है, जबकि बाजार में मांग और प्रतिस्पर्धा के कारण वे कीमतें तुरंत नहीं बढ़ा पा रही हैं।
इससे आने वाले महीनों में कई कंपनियों के Profitability Margin प्रभावित हो सकते हैं।
कब मिलेगी राहत?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं होता और वैश्विक Supply Chain सामान्य नहीं होती, तब तक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी, सरकारी सब्सिडी पर दबाव और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है।
फिलहाल आम उपभोक्ता को राहत इस बात से है कि कंपनियां नुकसान के बावजूद खुदरा कीमतों में तुरंत वृद्धि नहीं कर रही हैं। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में इसका असर आम आदमी की जेब, रसोई और खेती—तीनों पर दिखाई दे सकता है।



