
भीलवाड़ा। Rajasthan biogas village : देशभर में जहां एलपीजी सिलेंडर की किल्लत, लंबी लाइनें और बढ़ती कीमतें आम लोगों की परेशानी बढ़ा रही हैं, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का एक गांव आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश कर रहा है, जिसने इस संकट को अपने लिए लगभग खत्म कर दिया है। आसींद तहसील का मोतीपुर गांव इन दिनों अपने अनूठे बायोगैस मॉडल की वजह से चर्चा में है। यहां करीब 120 परिवारों ने अपने घरों या बाड़ों में बायोगैस प्लांट लगा रखे हैं और दावा है कि कई घरों में पिछले तीन से चार साल से एलपीजी सिलेंडर मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह मॉडल सिर्फ रसोई गैस का विकल्प नहीं बना, बल्कि गांव के लोगों के लिए यह आर्थिक राहत, खेती के लिए जैविक खाद, पशुपालन में सुविधा और स्थानीय रोजगार का भी मजबूत माध्यम बन गया है। गांव वालों का कहना है कि यह व्यवस्था इतनी कारगर है कि उन्हें अब गैस खत्म होने, सिलेंडर बुकिंग या बाजार की महंगाई की चिंता नहीं सताती।
मोतीपुर बना आत्मनिर्भरता का उदाहरण
Motipur village biogas model : भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील स्थित मोतीपुर गांव में करीब 200 परिवार रहते हैं। इनमें से लगभग 120 परिवारों ने बायोगैस प्लांट लगाकर घरेलू गैस की जरूरत का समाधान अपने स्तर पर कर लिया है। गांव में प्रवेश करते ही कई घरों और बाड़ों में लगे निजी बायोगैस प्लांट नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन प्लांटों की कार्यक्षमता काफी अच्छी है और नियमित उपयोग के बावजूद इनमें गैस की कोई कमी महसूस नहीं होती। ग्रामीण गोपाल गोस्वामी बताते हैं कि उनके घर में बायोगैस प्लांट लगे हुए तीन साल से ज्यादा समय हो चुका है। इस दौरान उन्हें एक भी बार एलपीजी सिलेंडर मंगाने की जरूरत नहीं पड़ी। घर का खाना बनाना हो, पानी गर्म करना हो या पशुओं के लिए दाना तैयार करना हो—सभी काम इसी गैस से हो जाते हैं। उनका कहना है कि कई बार तो प्लांट में इतनी गैस बन जाती है कि जरूरत पड़े तो पड़ोसी को भी मदद की जा सकती है।
मेहमान आएं या घर में समारोह
Bhilwara biogas plant village : ग्रामीणों का कहना है कि इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत इसकी निरंतरता और भरोसेमंदी है। सामान्य दिनों के अलावा अगर घर में मेहमान आ जाएं या कोई बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम हो, तब भी अतिरिक्त एलपीजी सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती। गोपाल गोस्वामी का मानना है कि सरकार की मदद से लगाए गए ये गोबर गैस प्लांट किसानों और पशुपालकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए हैं।
वे बताते हैं कि इस प्लांट से सिर्फ गैस ही नहीं, बल्कि उत्तम गुणवत्ता की खाद भी तैयार होती है, जो फसलों के लिए काफी लाभकारी है। इससे खेतों की उर्वरता बढ़ती है, उत्पादन बेहतर होता है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है। ग्रामीणों का दावा है कि इस जैविक खाद के उपयोग से फसलों में रोगों का असर भी कम देखने को मिलता है।
बायोगैस की आंच ने तोड़े भ्रम, चुटकियों में बन गई चाय
biogas plant in Rajasthan village : अक्सर लोगों के मन में यह धारणा रहती है कि गोबर गैस की आंच कम होती होगी, उस पर खाना देर से पकता होगा या उसका दबाव स्थिर नहीं रहता होगा। लेकिन मोतीपुर में दिखा दृश्य इन आशंकाओं को काफी हद तक गलत साबित करता है।
गोपाल गोस्वामी की बेटी किरण गोस्वामी ने घर की रसोई में बायोगैस से संचालित चूल्हे पर चाय बनाकर पूरी प्रक्रिया समझाई। उन्होंने बताया कि प्लांट से पाइप के जरिए सीधा गैस कनेक्शन रसोई तक पहुंचाया गया है। गैस किसी सिलेंडर में स्टोर नहीं होती, बल्कि सीधे पाइपलाइन से चूल्हे तक आती है। चूल्हे पर लगे वॉल्व को रेगुलेटर की तरह ऑन-ऑफ किया जाता है।
जैसे ही वॉल्व खोला गया और माचिस की तीली बर्नर के पास लाई गई, वैसे ही सामान्य एलपीजी चूल्हे की तरह तेज लौ निकलने लगी। ग्रामीणों का दावा है कि कई बार इसकी आंच एलपीजी सिलेंडर से भी तेज महसूस होती है। किरण ने बताया कि इस पर खाना जल्दी तैयार हो जाता है और रोजमर्रा के काम बिना किसी परेशानी के चलते हैं।
तीन हिस्सों में तैयार होता है पूरा बायोगैस सिस्टम
Rajasthan village own gas plant : मोतीपुर गांव में लगे बायोगैस प्लांट की संरचना को समझाते हुए भीलवाड़ा जिला सरस डेयरी के वरिष्ठ सहायक संदीप दाधीच ने बताया कि एक प्लांट लगभग 18×8 वर्गफीट जगह में तैयार किया जाता है। यह मुख्य रूप से तीन हिस्सों में काम करता है। सबसे पहले एक टबनुमा पात्र होता है, जिसमें गाय का गोबर डाला जाता है। इसमें एक बार में करीब 5 से 8 किलो गोबर और उतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर पतला घोल बनाया जाता है। इस घोल को हाथ या डंडे की मदद से अच्छी तरह मिलाया जाता है ताकि गैस बनने की प्रक्रिया सुचारू रूप से शुरू हो सके। इसके बाद यह घोल नीचे लगे पाइप के जरिए एक बड़े गुब्बारेनुमा हिस्से में पहुंचता है। यह भाग मोटे काले प्लास्टिक से बना होता है और इसका कुछ हिस्सा जमीन के नीचे तथा कुछ हिस्सा बाहर रहता है। इसी भाग में वातावरण और जमीन की गर्माहट के कारण गोबर के घोल से गैस बनती है। इस गुब्बारेनुमा चैम्बर से एक पाइप सीधे रसोई के चूल्हे से जुड़ी होती है, जबकि दूसरी पाइप में ऑटोमैटिक ओवरफ्लो वाल्व लगा रहता है। यदि अधिक गैस बन जाती है, तो अतिरिक्त गैस सुरक्षित तरीके से बाहर निकल जाती है।

सुरक्षा को लेकर भी ग्रामीण निश्चिंत
बायोगैस को लेकर कई बार लोगों में सुरक्षा संबंधी आशंकाएं भी रहती हैं। इस पर संदीप दाधीच का कहना है कि यह व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है। अधिक मात्रा में बनने वाली गैस जब ओवरफ्लो के जरिए बाहर निकलती है, तो वह हवा में फैल जाती है। उनका दावा है कि यह हल्की होने के कारण सामान्य परिस्थितियों में आग नहीं पकड़ती और प्लांट का संचालन पूरी तरह नियंत्रित तरीके से किया जाता है। ग्रामीणों का भी कहना है कि वर्षों से उपयोग के बावजूद उन्हें किसी प्रकार की बड़ी सुरक्षा समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। नियमित रखरखाव और सही उपयोग के कारण यह मॉडल उनके लिए भरोसेमंद साबित हुआ है।
एक बार गोबर डालो, दिनभर मिले गैस
ग्रामीणों के अनुसार यदि सुबह एक बार गोबर और पानी का घोल बनाकर प्लांट में डाल दिया जाए, तो दिनभर के लिए गैस उपलब्ध हो जाती है। दावा है कि इससे करीब तीन किलो तक गैस उत्पादन संभव हो जाता है, जो एक सामान्य परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त है। जब गोबर के घोल से पूरी गैस बन जाती है, तब बचा हुआ वेस्ट आउटपुट पाइप से बाहर निकलकर वेस्ट टैंक में जमा होता रहता है। जब यह टैंक भर जाता है, तो डेयरी प्लांट के कर्मचारियों को सूचित किया जाता है, जो इस अवशेष को टैंकर में भरकर जैविक खाद बनाने वाले प्लांट तक पहुंचाते हैं।
4 साल से घर में नहीं आया LPG सिलेंडर
गांव के एक अन्य ग्रामीण रतन सिंह को बायोगैस प्लांट के सफल संचालन और अच्छे रखरखाव के लिए कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है। उनके घर पर प्लांट की स्थिति दिखाते हुए उनकी बेटी चित्रा कंवर राठौड़ ने बताया कि गुब्बारे का फुलाव ही यह बता देता है कि प्लांट में कितनी गैस तैयार हो रही है। वे बताती हैं कि वे रोज एक बड़ी तगारी गोबर और एक बाल्टी पानी प्लांट में डालते हैं। इसी से पूरे परिवार के लिए खाना बनता है और सर्दियों में नहाने लायक पानी भी आसानी से गर्म हो जाता है। उनका दावा है कि पिछले चार वर्षों से उनके घर में एलपीजी का एक भी सिलेंडर नहीं आया। इतना ही नहीं, प्लांट से निकलने वाले वेस्ट मटेरियल पर भी उन्हें 75 पैसे प्रति किलो के हिसाब से भुगतान मिलता है। यानी यह मॉडल सिर्फ खर्च बचाने वाला नहीं, बल्कि छोटी अतिरिक्त आय का साधन भी बन गया है।
अतिरिक्त गोबर भी नहीं जाता बेकार
गांव के किसान देवराज जाट बताते हैं कि उनके पास 10-12 गायें हैं, इसलिए गोबर की मात्रा अधिक होती है। बायोगैस प्लांट में रोजाना सीमित मात्रा में ही गोबर उपयोग हो पाता है। ऐसे में बचा हुआ अतिरिक्त गोबर वे खेतों तक नाली के जरिए पहुंचा देते हैं और उससे जैविक खाद का काम लेते हैं। उनका कहना है कि बायोगैस प्लांट लगने के बाद उनके घर में ईंधन से जुड़ी लगभग सभी समस्याएं खत्म हो गई हैं। अब उन्हें बाजार की कीमतों और एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
40 हजार की लागत, 30 हजार की सब्सिडी
ग्रामीण ओमप्रकाश जाट के मुताबिक गांव को आत्मनिर्भर बनाने के पीछे पूर्व मंत्री रामलाल जाट और भीलवाड़ा की सरस डेयरी की दूरदर्शी सोच का बड़ा योगदान है। करीब चार साल पहले जब रामलाल जाट डेयरी चेयरमैन थे, तब उन्होंने ग्रामीणों को समझाकर इस योजना से जोड़ा। एक बायोगैस प्लांट लगाने की कुल लागत करीब 40 हजार रुपए थी। इसमें से 30 हजार रुपए की सब्सिडी दी गई, जबकि शेष 10 हजार रुपए भी किस्तों के रूप में लिए गए। ग्रामीणों से लगभग 1000 रुपए प्रतिमाह की आसान किश्त तय की गई थी। इसी योजना के तहत गांव के करीब 120 परिवारों ने अपने यहां ये प्लांट लगवाए।
वेस्ट से बन रही आधुनिक जैविक खाद
मोतीपुर गांव का यह मॉडल सिर्फ घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं है। बायोगैस प्लांट से निकलने वाले वेस्ट का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर जैविक खाद भी तैयार की जा रही है। इसके लिए गांव की डेयरी सहकारी समिति ने सरकार से करीब दो हेक्टेयर जमीन 99 साल की लीज पर ली। इसके बाद भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की मदद से यहां जैविक खाद का आधुनिक प्लांट स्थापित किया गया। इस प्लांट में बायो वेस्ट को वैज्ञानिक प्रक्रिया से खाद में बदला जाता है। आधुनिक मशीनों की मदद से खाद तैयार कर उसकी पैकिंग की जाती है। बताया गया कि बाजार में 25 किलो का एक बैग 375 रुपए के हिसाब से बेचा जाता है और इसकी मांग भी अच्छी बनी हुई है।
गांव में रोजगार के अवसर भी बढ़े
इस पूरी व्यवस्था का एक बड़ा सकारात्मक असर गांव में रोजगार सृजन के रूप में भी देखने को मिला है। जैविक खाद प्लांट से गांव के कम से कम 5 लोगों को रोजगार मिला है। साथ ही एक ट्रैक्टर भी कॉन्ट्रैक्ट पर लगाया गया है, जो प्लांट से जुड़े परिवहन कार्यों में इस्तेमाल होता है। ग्रामीणों के अनुसार जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त भी यहां दो-तीन बार दौरा कर इस मॉडल को देख चुके हैं। इससे यह साफ है कि मोतीपुर का यह प्रयोग प्रशासनिक स्तर पर भी ध्यान आकर्षित कर चुका है।
आत्मनिर्भर गांव की मिसाल बना मोतीपुर
मोतीपुर गांव का यह बायोगैस मॉडल आज के दौर में ग्रामीण आत्मनिर्भरता की एक मजबूत मिसाल बनकर उभरा है। जहां दूसरे इलाकों में रसोई गैस की कमी, महंगाई और सप्लाई संकट चिंता का कारण बने हुए हैं, वहीं इस गांव के लोगों ने अपने संसाधनों के सहारे इसका हल निकाल लिया है। गोबर, पानी और स्थानीय सहयोग से तैयार यह व्यवस्था न केवल ग्रामीणों की रसोई चला रही है, बल्कि खेती को जैविक बना रही है, खाद तैयार कर रही है, अतिरिक्त आय दे रही है और रोजगार भी पैदा कर रही है। यही वजह है कि मोतीपुर अब केवल एक गांव नहीं, बल्कि ग्रामीण नवाचार और आत्मनिर्भर ऊर्जा मॉडल के रूप में एक प्रेरक उदाहरण बन गया है।



