
Rajasthan unique tradition : राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के बड़ोदिया गांव में होली की पूर्व संध्या पर एक ऐसी परंपरा निभाई गई, जिसे सुनकर बाहरी लोग चौंक जाते हैं। लेकिन गांव वालों के लिए यह आस्था, परंपरा और सामाजिक संदेश का संगम है। मान्यता के अनुसार, होली से पहले आधी रात को दो बालकों का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि यह रस्म नहीं निभाई गई, तो सदियों पुराना श्राप गांव पर संकट बनकर टूट सकता है।
आधी रात को जगाए गए दो बच्चे
Banswara village ritual : परंपरा के मुताबिक, रात करीब एक बजे सो रहे दो बालकों को उठाकर विवाह की रस्में पूरी की जाती हैं। इस बार भी गांव में ऐसा ही हुआ। चुन्नू और मुन्नू नाम के दो बालकों को विवाह के लिए तैयार किया गया। शुरुआत में दोनों ही ‘दूल्हा’ बनने की जिद पर अड़ गए। स्थिति को संभालने के लिए गांव के मुखिया नाथजी भाई पटेल और डॉ. स्वामी विवेकानंद महाराज ने हस्तक्षेप किया। पंचों की सहमति से तय हुआ कि चुन्नू दूल्हा बनेगा और मुन्नू दुल्हन की भूमिका निभाएगा।
महिलाओं ने पारंपरिक रीति से हल्दी लगाई और पंडित दिलीप शर्मा ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विवाह की रस्में पूरी कराईं। सिंदूर दान और मंगलसूत्र की रस्म भी प्रतीकात्मक रूप से संपन्न की गई।
परंपरा के साथ समाज सुधार का संदेश
500 year old curse story : यह आयोजन केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है। इसे सामाजिक जागरूकता से भी जोड़ा गया। हवन कुंड में लकड़ी के साथ गुटखा, बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू उत्पादों को भी अग्नि में अर्पित किया गया। इसके माध्यम से ग्रामीणों ने नशामुक्ति का संदेश दिया। सात फेरे लेते समय नशे से दूर रहने की शपथ भी दिलाई गई।
‘मामेरा’ की रस्म के दौरान दूल्हा-दुल्हन को नकद राशि के साथ पेन और किताबें भेंट की गईं, ताकि शिक्षा का महत्व उजागर किया जा सके और नई पीढ़ी को पढ़ाई व राष्ट्रसेवा के प्रति प्रेरित किया जा सके।

500 साल पुरानी मान्यता और ‘खेर’ जाति का श्राप
Midnight ritual wedding India : ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा लगभग 500 साल पुरानी है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहां ‘खेर’ जाति का शासन था। बाद में गोल पटेल समाज यहां आकर बस गया। उस समय एक सिद्ध बाबा की सहायता से खेर जाति को यहां से हटना पड़ा। जाते-जाते खेर जाति के मुखिया ने कथित रूप से श्राप दिया कि यदि होली से पहले यह विवाह परंपरा नहीं निभाई गई, तो गांव पर विपत्ति आएगी।
जब परंपरा नहीं निभी, तो आया संकट
Holi village custom Rajasthan ; गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि करीब 90 साल पहले भारी बारिश के कारण यह रस्म पूरी नहीं हो सकी थी। उसके बाद गांव में अकाल जैसी स्थिति बनी और 200 से ज्यादा दुधारू पशुओं की अचानक मौत हो गई। उस घटना ने ग्रामीणों के मन में भय और आस्था दोनों को मजबूत कर दिया। तभी से यह परंपरा हर साल बिना चूक निभाई जा रही है।
आज भी जीवंत है परंपरा
हर साल फागुन के गीत, ढोल-नगाड़ों की धुन और उत्सव के माहौल के बीच यह अनोखा विवाह आयोजित किया जाता है। ग्रामीण इसे गांव की सुरक्षा और समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।



