
Honest jeweller Rajsamand : यह उस दौर की घटना है, जब महंगाई ने इंसान की संवेदनाओं को भी सिक्कों में तौलना सिखा दिया है। ₹1 की बात आए तो लोग नजरें चुरा लेते हैं, और यदि गलती से कहीं फायदा हो जाए, तो उसे किस्मत का लिखा मान लिया जाता है। ऐसे ही दौर में यह घटना समाज के लिए एक सशक्त संदेश बनकर सामने आती है।
राजसमंद की सर्राफा गली इमली वाले हनुमान जी के पीछे स्थित एक प्रतिष्ठित ज्वेलरी दुकान सिल्वर पैलेस पर एक महिला ग्राहक ने 2.100 मिली ग्राम सोने के टॉप्स खरीदे। खरीदारी पूरी हुई, भुगतान हुआ, और भीड़-भाड़ में अनजाने में वे टॉप्स वहीं दुकान पर छूट गए। न ग्राहक को याद रहा, न कोई ऐसा पता या संपर्क था, जिसके सहारे उसे खोजा जा सके। दुकान के संचालक चाहते तो उन्हें सामान्य माल समझकर रख सकते थे, या चुपचाप अपने हिसाब में जोड़ सकते थे। आखिर इतने महीनों तक कोई लेने भी तो नहीं आया। पर यहां व्यापार तराजू से नहीं, ईमान से तौला जाता है। उन्होंने उन टॉप्स को अलग सुरक्षित रख दिया। यह सोचकर कि “जिसका माल है, वह कभी न कभी लेने जरूर आएगा।” समय बीतता गया… एक महीना, फिर दूसरा महीना। पूरे दो महीने बाद वही महिला दोबारा दुकान पर आई। उसके चेहरे पर संकोच था, आवाज में झिझक— “शायद पिछली बार खरीदे टॉप्स यहीं रह गए थे…”यह सुनते ही दुकानदार के चेहरे पर संतोष की मुस्कान फैल गई। उन्होंने बिना किसी सवाल-जवाब के सहर्ष, पूरे सम्मान के साथ सुरक्षित रखे हुए वही 2.100 मिली ग्राम सोने के टॉप्स उन्हें लौटा दिए। महिला की आँखें भर आईं। अपना पता भंवर कुंवर चौहान(जीता) पीपरडा बताया।
आज के समय में जब सोने के भाव आसमान छू रहे थे, तब खोई हुई चीज वापस मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। यह अनुभव उसके लिए जीवन भर की सीख बन गया। दुकानदार ने बस इतना कहा— “जो हमारा नहीं है, उसे रखना भी हमें शोभा नहीं देता। यह कोई साधारण व्यापारी नहीं, बल्कि राजसमंद सर्राफा संघ के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश सियाल हैं— जो व्यापार को केवल लाभ नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी मानते हैं। यह घटना हमें यह विश्वास दिलाती है कि ईमानदारी आज भी जिंदा है, बस वह शोर नहीं मचाती, शांत रहकर मिसाल बनती है। और सच यही है—महंगाई के इस दौर में भी ईमान अब तक सबसे कीमती है।

वीणा वैष्णव ‘रागिनी’
राजसमंद
