
राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित फुलवारी की नाल वन्यजीव अभयारण्य में एक भालू के हमले ने स्थानीय ग्रामीणों में दहशत फैला दी है। यह घटना फलासिया पंचायत समिति के धरावण गांव के पास अभयारण्य के वनखंड क्षेत्र में बुधवार देर शाम घटी, जिसमें दो ग्रामीण, मोतीलाल खराड़ी (35) और मोहनलाल खराड़ी (40), गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों अपने खोए हुए बैल को खोजने के लिए जंगल में गए थे, जब अचानक भालू ने उन पर हमला बोल दिया। घायलों को तत्काल फलासिया के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उदयपुर के एक अस्पताल में रेफर किया गया। इस घटना ने वन्यजीव और मानव के बीच बढ़ते टकराव को एक बार फिर उजागर किया है।
Fulwari ki Naal Wildlife Sanctuary bear attack घायल मोतीलाल ने बताया कि उनका बैल पिछले एक सप्ताह से लापता था, और वे रोजाना उसे खोजने जंगल में जा रहे थे। बुधवार को शाम करीब 4:30 बजे, वे और मोहनलाल धरावण गांव के पास पहाड़ी क्षेत्र में बैल की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान, झाड़ियों में छिपे एक भालू ने अचानक मोहनलाल पर हमला कर दिया। मोहनलाल को बचाने की कोशिश में मोतीलाल भी भालू के निशाने पर आ गए। भालू ने दोनों पर अपने नुकीले पंजों और दांतों से हमला किया, जिससे उनके सिर, हाथ, और पैरों पर गंभीर चोटें आईं। मोतीलाल के पैर में 12 टांके लगे, जबकि मोहनलाल के सिर और कान पर गहरे घाव बने।
दोनों ने शोर मचाकर अपनी जान बचाने की कोशिश की, जिसके बाद भालू जंगल की ओर भाग गया। स्थानीय ग्रामीणों की मदद से दोनों को तुरंत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र फलासिया पहुंचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद, उनकी हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें उदयपुर के एमबी अस्पताल में रेफर किया, जहां उनका इलाज जारी है।
वन विभाग का बयान
Two villagers injured in bear attack Udaipur पानरवा रेंज के रेंजर राजेश कुमार ने घटना की जानकारी मिलते ही त्वरित कार्रवाई की बात कही। उन्होंने बताया, “हमारी टीम को सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर भेजा गया। वन विभाग की टीमें अब उस क्षेत्र में सतर्क मोड पर हैं और भालू की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।” उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि वे जंगल में अकेले न जाएं और विशेष रूप से सुबह-शाम के समय सावधानी बरतें, क्योंकि इस दौरान भालू अधिक सक्रिय होते हैं। रेंजर ने यह भी बताया कि वन विभाग भालू को ट्रैक करने के लिए ट्रेंकुलाइजिंग टीम को तैयार कर रहा है। अगर भालू बार-बार मानव बस्तियों के पास देखा गया, तो उसे पकड़कर सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई जाएगी। इसके अलावा, विभाग स्थानीय ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए मुनादी और जागरूकता शिविर आयोजित करने की तैयारी में है।
फुलवारी की नाल अभयारण्य: जैव-विविधता का खजाना
Rajasthan sloth bear attack news फुलवारी की नाल वन्यजीव अभयारण्य उदयपुर जिले के कोटड़ा, मामेर, और पानरवा रेंज में 511.41 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह अभयारण्य दक्षिणी अरावली पहाड़ियों में स्थित है और अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है। 6 अक्टूबर 1983 को इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। इस क्षेत्र में मानसी, वाकल, और सोम जैसी नदियों का उद्गम होता है, और यहां सफेद मुसली, ब्राह्मी, जंगली हल्दी, और दुर्लभ आर्किड जैसे औषधीय पौधे प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
2025 की वन्यजीव गणना के अनुसार, इस अभयारण्य में 48 स्लॉथ भालू (sloth bears) मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध वन्यजीव आबादी का हिस्सा हैं। इसके अलावा, तेंदुआ, जंगली सूअर, उड़न गिलहरी, और विभिन्न प्रजातियों के पक्षी जैसे ऑरेंज हेडेड थ्रश और ब्लैक नेप्ड मोनार्क भी यहां देखे जाते हैं। अभयारण्य में 134 गांव शामिल हैं, जहां मीणा, गरासिया, और कथोडिया जनजातियां निवास करती हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं।
मानव-वन्यजीव टकराव: बढ़ती चुनौती
Human wildlife conflict Udaipur यह घटना मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव का एक और उदाहरण है। फुलवारी की नाल अभयारण्य में मानव बस्तियों और जंगल की निकटता के कारण ऐसी घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल में मानव गतिविधियों, जैसे पशु चराना, तendu पत्ते तोड़ना, या लकड़ी इकट्ठा करना, के कारण भालू और अन्य वन्यजीवों के साथ टकराव बढ़ रहा है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और जंगल में पानी की कमी के कारण भालू भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों के करीब आ रहे हैं।
हाल ही में, अप्रैल 2025 में फुलवारी की नाल अभयारण्य में दावानल (forest fire) की घटनाओं ने भी वन्यजीवों के आवास को प्रभावित किया था। इन आग की घटनाओं ने कई जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया, जिससे मानव-वन्यजीव टकराव की संभावना बढ़ गई।

अन्य क्षेत्रों में भालू हमले की घटनाएं
फुलवारी की नाल में यह कोई पहली घटना नहीं है। हाल के महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों में भालू हमले की खबरें सामने आई हैं। उदाहरण के लिए:
- छत्तीसगढ़: अगस्त 2025 में, गरियाबंद जिले में एक ग्रामीण पर भालू ने हमला किया, जिसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।
- उत्तराखंड: मार्च 2025 में, कोटद्वार के बीरोंखाल गांव में एक बुजुर्ग की भालू के हमले में मौत हो गई।
- झारखंड: फरवरी 2025 में, हरनाटांड़ में भालू ने तीन लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया।
- छत्तीसगढ़: मई 2025 में, कोरबा जिले में एक महिला सहित चार ग्रामीण भालू और जंगली सूअर के हमले में घायल हो गए।
इन घटनाओं ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के सामने वन्यजीवों की सुरक्षा और मानव जीवन की रक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को और गंभीर कर दिया है।
ग्रामीणों की मांग: सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
धरावण गांव के ग्रामीणों ने वन विभाग से मांग की है कि जंगल में गश्त बढ़ाई जाए और भालू के हमलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। स्थानीय निवासी रमण भगोरा ने कहा, “हमारे गांव जंगल से सटे हैं, और हमें रोजमर्रा के कामों के लिए जंगल में जाना पड़ता है। लेकिन भालू के हमले की घटनाएं हमें डराने लगी हैं।” ग्रामीणों ने सुझाव दिया कि वन विभाग को जंगल में पानी और भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर न आएं।
पर्यावरण संरक्षणकर्ता माता माल हरवानी ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “फुलवारी की नाल अभयारण्य की जैव-विविधता को बचाने के लिए हमें मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करना होगा। इसके लिए जागरूकता अभियान और सुरक्षा उपाय जरूरी हैं।”
वन विभाग की पहल: इको-टूरिज्म और जागरूकता
फुलवारी की नाल अभयारण्य में वन विभाग ने हाल के वर्षों में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। अगस्त 2024 में, विभाग ने पर्यटकों को अभयारण्य की प्राकृतिक सुंदरता और जैव-विविधता से परिचित कराने के लिए ट्रेकिंग और नेचर वॉक का आयोजन किया था। डीएफओ देवेंद्र कुमार तिवारी ने बताया कि भविष्य में गोरमघाट, सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य, और जवाई तेंदुआ संरक्षण क्षेत्र में भी इसी तरह के आयोजन किए जाएंगे।
हालांकि, भालू के हमले जैसी घटनाएं इको-टूरिज्म की सुरक्षा पर सवाल उठाती हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पर्यटकों और ग्रामीणों को जंगल में जाने से पहले प्रशिक्षण और सुरक्षा दिशानिर्देश दिए जाएं। इसके अलावा, वन विभाग को रात के समय गश्त बढ़ाने और सीसीटीवी निगरानी जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग करने की जरूरत है।
