
Nathdwara Holi Dhulandi Tradition : राजसमंद जिले के नाथद्वारा में धुलंडी के पावन अवसर पर श्रीनाथजी मंदिर से जुड़ी एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा का भव्य आयोजन देखने को मिला। मंगलवार रात शहर में परंपरागत ‘बादशाह की सवारी’ निकाली गई, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय लोग उमड़ पड़े। यह अनूठी परंपरा पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय की प्रधान पीठ श्रीनाथजी मंदिर से जुड़ी हुई है और सदियों से धुलंडी के दिन पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जाती है।
गुर्जरपुरा से शुरू हुई शाही सवारी
Shrinathji Temple Badshah Sawari : परंपरा के अनुसार बादशाह की सवारी की शुरुआत नाथद्वारा के गुर्जरपुरा स्थित बादशाह गली से की गई। इस सवारी में एक व्यक्ति को बादशाह का रूप दिया जाता है। वह मुगलकालीन अंदाज की पारंपरिक पोशाक पहनता है, नकली दाढ़ी-मूंछ लगाता है और आंखों में काजल लगाकर राजसी रूप धारण करता है। इसके बाद वह अपने हाथों में श्रीनाथजी की पावन छवि लेकर पालकी में सवार होता है और पूरे शाही अंदाज में नगर भ्रमण के लिए निकलता है।
इस दौरान सवारी के आगे मंदिर मंडल का बैंड और बांसुरी की मधुर धुनें वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। ढोल, नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज के साथ पूरा नगर धार्मिक उत्साह और उल्लास में डूब जाता है। रास्ते भर श्रद्धालु इस अनूठी सवारी के दर्शन करते हैं और श्रीनाथजी के जयकारों से माहौल गूंज उठता है।

मंदिर परिक्रमा के बाद सूरजपोल पहुंची सवारी
Nathdwara Badshah Sawari 2026 : नगर भ्रमण करते हुए यह शाही सवारी श्रीनाथजी मंदिर की परिक्रमा करती हुई सूरजपोल पहुंचती है। यहां इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक दृश्य देखने को मिलता है। बादशाह का रूप धारण किए व्यक्ति को मंदिर परिसर में स्थित नवधा भक्ति के प्रतीक नौ सीढ़ियों तक लाया जाता है।
दाढ़ी से साफ की नवधा भक्ति की नौ सीढ़ियां
Badshah Sawari Nathdwara History : परंपरा के अनुसार बादशाह बने व्यक्ति को अपनी लंबी दाढ़ी से इन नौ सीढ़ियों को साफ करना होता है। यह दृश्य इस आयोजन का सबसे प्रमुख और आकर्षक हिस्सा माना जाता है। जैसे ही वह अपनी दाढ़ी से सीढ़ियों को साफ करता है, वहां मौजूद श्रद्धालु इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए उत्साह से भर उठते हैं।
इन नौ सीढ़ियों को नवधा भक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो भगवान के प्रति नौ प्रकार की भक्ति भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। दाढ़ी से सीढ़ियां साफ करने की यह परंपरा विनम्रता, समर्पण और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
परंपरा के अनुसार सुनाई जाती हैं खरी-खोटी
इस अनूठे अनुष्ठान के बाद मंदिर के परछना विभाग के मुखिया द्वारा बादशाह बने व्यक्ति को वस्त्र और आभूषण भेंट किए जाते हैं। इसके साथ ही एक और रोचक परंपरा निभाई जाती है। आयोजन में मौजूद लोग बादशाह बने व्यक्ति को मजाकिया अंदाज में खरी-खोटी भी सुनाते हैं। यह सब इस परंपरा का हिस्सा माना जाता है और इसे श्रद्धा व हास्य के मिश्रण के रूप में देखा जाता है।
औरंगजेब काल से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा मुगल बादशाह औरंगजेब के समय से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति में निभाई जाती है। कहा जाता है कि उस दौर में धार्मिक परिस्थितियों से जुड़े एक प्रसंग के बाद यह अनूठी परंपरा शुरू हुई थी। तभी से नाथद्वारा में धुलंडी के अवसर पर ‘बादशाह की सवारी’ निकालने की परंपरा जारी है।
श्रद्धा, इतिहास और संस्कृति का अनोखा संगम
नाथद्वारा की यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा संगम भी है। हर साल धुलंडी के अवसर पर यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है। स्थानीय लोग और दूर-दराज से आए भक्त इस परंपरा के साक्षी बनते हैं और इसे नाथद्वारा की पहचान के रूप में देखते हैं।
सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। यही कारण है कि धुलंडी के दिन नाथद्वारा की गलियां भक्तों की भीड़, भक्ति गीतों और उत्सव के रंगों से सराबोर दिखाई देती हैं।





