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Holi Festival Memories : जब गलियों में गूंजता था “बुरा ना मानो होली है” – यादों की होली

Deepak Salvi March 4, 2026 1 minute read

होली के रंग

Traditional Holi Celebration India : होली आने के बहुत दिनों पहले ही होली की शुरुआत हो जाती थी जब अपने घर पर जाकर पता चलता कि किसी ने सर में रंग डाल दिया है और उसका रंग धीरे-धीरे धीरे-धीरे गर्दन से होते हुए कपड़ों में चमकने लगता । यह शरारत जरूर किसी न किसी दोस्त की रही होगी और बस उसका नाम सोच सोच कर हम उसे न जाने कितनी गालियां दे दिया करते थे । होली के वह दिन, वह रंग अब पुराने हो चले है। होली में नए रंग आ गए। अब इन नए रंगों में उन रंगों जैसी महक नहीं है । समय के साथ-साथ त्यौहार बदल गए , विचार बदल गए ,व्यवहार बदल गए । रंगों में घुलने वाली महक अपनापन सब धीरे-धीरे से खोता सा चला गया। मिलावटी रंगो ने भी होली के त्यौहार को बहुत नुकसान पहुंचाया। इन रंगों से होने वाले नुकसान एलर्जी आदि ने लोगों को होली से दूर किया वरना होली के आनंद कुछ अलग ही हुआ करते थे ।

Old vs Modern Holi : होली आने के बहुत दिनों पहले ही बच्चों की टोलियां पिचकरिया लेकर एक दूसरे पर पानी की बौछारें मारना शुरू कर देती थी । बाजार से निकलने वाले लोग, गलियों से गुजरने वाले लोग जब ठंडी फुहार महसूस करते तो इधर-उधर उन शैतान टोलियों पर नजर डालते और कभी तो मारने को उतारू हो जाते पर जब तक तो वह टोलियां गलियों में गुम सी हो जाती और चिल्लाती जाती कि बुरा ना मानो होली है । बच्चे तो क्या बड़े-बड़े भी होली के इस माहौल से बच नहीं पाते । वह खुद भी कभी कच्चे, कभी पक्के रंगों से अपने आस पड़ोस दोस्तों यारों को रंग लगाने से नहीं चुकते । बस यह अपनापन ही तो होली था , रंग तो केवल नाम था महज।

Holi festival traditions india : होली का इंतजार बहुत पहले से हो जाता था और कितने ही प्लान बन जाते थे । कैसे खेलना है, क्या करना है और जो घर से बाहर नहीं आ रहा है उसके लिए क्या करना है ? वैसे तो जो होली नहीं खेलता था और होली के दिन कमरे में कैद रहता था उसे हम होली के पहले ही निपटा लिया करते थे । पता नहीं उस दिन मौका मिले ना मिले । उसकी नाराजगी और गुस्सा हवा में उड़ा दिया करते और होली के बाद वह भी नॉर्मल हो जाता था । वह कहता था अगली बार वह बदला लेगा पर हम ऐसा मौका देते ही नहीं थे । इंतजार करते-करते होली का दिन आ जाता ।
होली पर पहनने वाली ड्रेस और विशेष होती । उस ड्रेस का चयन किया जाता है जो आजकल पहने में नहीं आ रही होती । रंगों में बहुत मिलावट होने लगी थी और वह जलन भी करते थे रंग कम चढ़े या आसानी से उतर जाए इसके लिए शरीर पर पहले से तेल मल दिया करते थे पर वह क्या नाम का होता ।जब रंग चढ़ने लगता तो ना तो तेल काम आता ना बचने की कोशिश , बस आंख का हिस्सा बाकी रह जाता बाकी शरीर का कोई भाग नहीं बचता दोस्त ऐसा रंग लगाते कि बस रंग ही रह जाता ।

Holi festival story india : सुबह की चाय के साथ होली की शुरुआत हो जाती । एक से दो,दो से चार, चार से आठ टोली बढ़ती जाती । हो हल्ला बढ़ता हुआ एक घर से दूसरे घर, तीसरे घर,चौथे घर तक जा पहुंचता। एक-एक को घरों से निकालते हुए रंग लगाते हुए हो हल्ला मचाते हुए होली की शुरुआत हो जाती । कितनी ही दीवारों पर हमारे हाथों के निशान बन जाते थे। घर के मालिक हल्ला करते थे पर परवाह किसे । उन पर भी हम रंग डालकर भाग जाते थे। इतने भरे हुए रहते थे की पहचान ही नहीं पाते थे किसने रंग डाला । जेब में पड़े हुए सिक्के इतने कलरफुल हो जाते की दुकानदार भी लेने से मना कर देता । नोट को तो हम प्लास्टिक की पन्नियों में पेक करके ले जाते। होली के कई किस्से यार आज भी नहीं भूले जाते ।

होली का दिन सवेरे 7:00 बजे शुरू हो जाता था शरीर पर अच्छे से तेल मलकर जाते हैं ताकि कोई पक्का कलर इतना पक्का ना हो की छूटे ही नहीं। रंग पिचकरिया हमारे हथियार से होते । पिचकारी लेकर तो ऐसे चलते हैं जैसे सिपाही युद्ध में चलता है और हमारे निशाने उसकी तो प्रेक्टिस बहुत दिनों से जारी रहती थी तो चूक कैसे जाए । गुब्बारों में भरा हुआ रंग का पानी बम का कार्य करता । जैसे ही किसी की पीठ पर पड़ता और छपाक बजता तो पूछो मत बहुत आनंद आता । दिन के बढ़ते बढ़ते टोली बड़ी होती जाती । एक-एक करके दोस्त जुड़ते जाते हैं मस्ती बढ़ती जाती , आनंद बढ़ता जाता। स्पीकर लग जाते, गाने शुरू हो जाते । खाना पीना चलता रहता तो कोई गुलाल उड़ाने में लगा रहता । शहर के मस्तानों की टोलियां बाइक पर शोर मचाती निकलती। आंखों पर चश्मा, सर पर कपड़ा और पूरा शरीर रंग से भरा हुआ । इतनी गुलाल इतना रंग लगा हुआ होता कि हमारा लगाया हुआ रंग तो असर ही नहीं करता ।

दिन के चढ़ते चढ़ते रंग और होली का मिजाज दोनों ही असर दिखाने लगता । उम्र केवल एक नंबर होती । सब अपनी मस्ती में मस्त । कोई बचपन की मस्तियों को जीता तो कोई बचपन के लुत्फ उठाता। बीच चौक में देवालय सा सज जाता । कोई भोपा बन जाता तो हजूरिया सा तन जाता । फिर बारी बारी सब पैरों में आ पड़ते । फिर कभी किसी को कंधों पर उठाकर सवारी सी निकल पड़ती । कंधों पे बैठा दोस्त भी अपनेआप को बादशाह से कम नहीं समझता । हो हल्ला , म्यूजिक , डांस से मस्ती परवान चढ़ती । भरी दुपहरी तक आते आते पानी की पौ बड़ी टंकी रंग से भर जाती। बस फिर क्या , सबको बारी बारी पकड़ उसी में डुबकी खिलाते और मनचाहे रंग में रंग देते । कपड़े फटते तो मौहल्ले से गुजर रहे तारों पर जा सजते । लास्ट तक तो ऐसा लगता जैसे रेडीमेड कपड़ों की प्रदर्शनी लग गई हो। रंगों की इस दुनिया में आवाज ही पहचान रह जाती बस । कुछ खाने पीने का मन होता तो बड़ी मुश्किल हो जाती । हाथों का रंग उसमें लगे बिना रहता ही नहीं । लड़के तो लड़के लड़कियों और महिलाओं की मस्तियां भी कभी कम नहीं होती ।

यूं कहो उनके असली अवतार होली पर ही नजर आते । उनके तेवर , अंदाज और मस्तियां सब बाहर आने लगती । सारा दिन खेलकर बदन टूटने लगता । थककर मंदिर या घर के बाहर बनी चबूतरियों पर लेट जाते । मौहल्ले की दीवारें हमारी सुंदर कलाओं की गवाह बन जाती जो धुलेंडी से शीतला सप्तमी तक रहती और फिर सप्तमी पर फिर नया रंग रोगन हो जाता। कुछ दुकानों और मकानों पर तो इतना पक्का रंग चढ़ जाता कि उनके मालिकों के गुस्से कई दिन तक शांत नहीं होते । खैर ये सब होली की मस्तियां होती । होली खेलने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती दर्पण में खुद को पहचानने की होती । “क्या यह मैं ही हूं “, यही प्रश्न दिमाग करता और दिल कहता, “हम्ममम तुम्ही हो” । टोलियां अब झील की और चल देती । झील के घाट हमारी अगवानी को तैयार रहते । आखिर रोज आने का कहां वक्त मिल पाता । हमारी ही तरह शहर के कई लोग झील पर मिल जाते । जैसे तैसे रंग उतारने के जतन होते । कोई पत्थर घिसता, कोई साबुन। फिर भी कहीं न कहीं होली अपने निशान छोड़ ही जाती जो अगले दिन स्कूलों में बता देती की होली जमकर खेली गई है। शाम को सभी फिर मौहल्ले में आ बैठते । बाजार खुलते नहीं तो बस सभी दोस्तों की बाते, ठहाके गलियों में गुंजायमान होते । होली की मस्तियां कई दिनों तक हंसाती।


होली हर वर्ष अपनी खट्टी मीठी यादें छोड़ जाती । समय के साथ बचपन चला गया । दोस्त सब काम धंधों में व्यस्त हो गए । कोई किस शहर तो कोई किस शहर । सभी का मिलना भी संभव नहीं हो पाता । कई तो गली मौहल्लों से निकल कॉलोनी में जा बसे । वहां नए साथी बन गए पर बचपन वाली बात कहां ? कॉलोनी की होली कुछ अलग होती । कच्चे रंग से या यूं कहो गुलाल से खेली जाने वाली होली रह गई अब बस । वैसे भी मिलावटी रंगो से कई ने तो होली खेलना ही बंद कर दिया । जो कोई खेलता भी तो केवल गुलाल । सब आस पड़ोस के मिलते । एक दूसरे के घर जाते और कुछ 1 या 2 घंटों की होली महज । डांस मस्ती संगीत कॉलोनी में इतना नहीं रहा अब । घर घर के भी मिलकर कितना खेले आखिर । बच्चों के मन को तोड़ा नहीं जाता । उनकी चहलकदमियां देखते । उनकी मस्तियां देखते । अब वक्त के साथ साथ उनकी पिचकारियां भी बदल गई है । होली खेलते तो लगता है कि सचमुच होली प्रेम और मस्ती का त्यौहार है। होली रंगों का त्यौहार है । आपसी मनमुटाव को दूर करने का त्यौहार है। ये जीवन को जीने का त्यौहार है। होली खुशियों का त्यौहार है। होली जबरदस्ती का त्यौहार नहीं है ये मिलने मिलाने का और आनंद का त्यौहार है। सबको होली खेलना चाहिए और आखिर हम अपने त्यौहार नहीं मनाएंगे तो कौन मनाएगा फिर । ये त्यौहार इतिहास के पन्नों तक रह जाएंगे केवल । बस यही ध्यान रखना चाहिए कि अपने त्यौहार से किसी का मन न दुखे । प्रेम और सादगी से हर त्यौहार मनाया जाना चाहिए । सबको होली का राम राम । हैप्पी होली सबको ।

कमलेश जोशी “कमल”
कांकरोली, राजसमंद

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