
Iran war fertilizer impact : अमेरिका–इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और खेती पर साफ नजर आने लगा है। वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में उर्वरक उत्पादन में करीब 24.6% की गिरावट दर्ज की गई है। यह कमी पिछले साल मार्च 2025 की तुलना में लगभग एक चौथाई है, जो चिंता का विषय बन चुकी है।
उर्वरक, खासकर यूरिया बनाने के लिए प्राकृतिक गैस सबसे जरूरी कच्चा माल है। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के कारण गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे कई फर्टिलाइजर प्लांट अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। उत्पादन लागत बढ़ने के चलते कुछ यूनिट्स ने उत्पादन घटा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है, इस समय सबसे बड़ा संकट बिंदु बन गया है। यह रास्ता दुनिया के लगभग 20% तेल और LNG सप्लाई के लिए अहम है। युद्ध के कारण यहां जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे भारत समेत कई देशों की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
भारत की खाड़ी देशों पर भारी निर्भरता
India fertilizer crisis : भारत अपनी जरूरत की करीब 60% LNG और 40% यूरिया के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। इसके अलावा, DAP और पोटाश जैसे उर्वरकों में 80–90% तक आयात पर निर्भरता है। ऐसे में सप्लाई रुकने का असर सीधे उत्पादन और उपलब्धता पर पड़ रहा है।

उत्पादन घटने के प्रमुख कारण
- कच्चे माल की कमी: नेचुरल गैस की सप्लाई बाधित
- होर्मुज रूट बंद: जहाजों की आवाजाही प्रभावित
- ऊर्जा कीमतों में उछाल: गैस और तेल महंगे
- लॉजिस्टिक लागत बढ़ी: बीमा और ट्रांसपोर्ट महंगा
खेती और किसानों पर क्या होगा असर?
Urea shortage India : भारत की लगभग 45% आबादी खेती पर निर्भर है, इसलिए उर्वरक संकट का असर व्यापक हो सकता है।
- खाद्य सुरक्षा पर खतरा: पैदावार 10–15% तक घट सकती है
- किसानों की आय पर चोट: लागत बढ़ेगी, मुनाफा घटेगा
- कालाबाजारी की आशंका: खाद की कमी से कीमतें बढ़ सकती हैं
- महंगाई में इजाफा: अनाज की कीमतें बढ़ने की संभावना
सरकार पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
LNG supply disruption : सरकार किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी देती है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने से यह बोझ और बढ़ेगा, जिससे राजकोषीय घाटे पर दबाव पड़ सकता है। खेती से जुड़ी आय में कमी आने पर ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घटेगी। इसका असर छोटे व्यापारियों और स्थानीय बाजारों पर भी देखने को मिलेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती हैं।
सरकार के सामने क्या हैं विकल्प?
शॉर्ट टर्म उपाय
- सप्लाई चेन को विविध बनाना (रूस, कनाडा, अफ्रीका से डील)
- बफर स्टॉक का उपयोग
- DBT के जरिए सब्सिडी का सही वितरण
लॉन्ग टर्म रणनीति
- नैनो यूरिया को बढ़ावा
- कोल गैसीफिकेशन से यूरिया उत्पादन
- ग्रीन अमोनिया तकनीक का विकास
- विदेशों में फर्टिलाइजर प्लांट में निवेश
वैश्विक संकट का असर भारत पर गहरा
Hormuz route crisis : होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के करीब एक-तिहाई उर्वरक गुजरते हैं। इस मार्ग में रुकावट आने से यूरोप, चीन और जापान जैसे बड़े देश भी प्रभावित हो रहे हैं। इसका असर वैश्विक खाद्य उत्पादन और महंगाई पर पड़ना तय माना जा रहा है।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले खरीफ सीजन (जून–जुलाई) की बुवाई पर गंभीर असर पड़ सकता है। इससे खाद की कमी और खाद्य महंगाई दोनों बढ़ सकती हैं।
सरकार का दावा- पर्याप्त है बफर स्टॉक
सरकार का कहना है कि फिलहाल खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। साथ ही मोरक्को और जॉर्डन जैसे देशों से वैकल्पिक सप्लाई के लिए बातचीत जारी है, ताकि संकट का असर कम किया जा सके।
‘वेक-अप कॉल’ बना यह संकट
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्थिति भारत के लिए एक चेतावनी है। अब समय आ गया है कि देश विदेशी ऊर्जा और कच्चे माल पर निर्भरता कम करे और स्वदेशी विकल्पों जैसे नैनो फर्टिलाइजर और ऑर्गेनिक खेती को तेजी से अपनाए।



