
Acharya Mahashraman Chaturmas जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें आचार्य महाश्रमण की पावन सन्निधि में कोबा, अहमदाबार में आयोजित चातुर्मास के दौरान हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आध्यात्मिक प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं। आचार्यश्री के प्रवचन और साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा के उद्बोधन श्रावकों को आत्मशुद्धि और धर्म के मार्ग पर प्रेरित कर रहे हैं। सोमवार को वीर भिक्षु समवसरण में आयोजित कार्यक्रम में आचार्य ने ‘आयारो’ आगम के आधार पर आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने के लिए संवर और निर्जरा की साधना पर जोर दिया। इस अवसर पर नवरंगपुर ज्ञानशाला के बच्चों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति दी, जबकि मुनियों ने तप और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला।
तेरापंथ धर्मसंघ के कार्यकर्ता राजकुमार दक ने बताया कि सोमवार को वीर भिक्षु समवसरण में साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने अपने प्रेरक उद्बोधन से श्रद्धालुओं को धर्म और अध्यात्म के प्रति प्रोत्साहित किया। इसके बाद, आचार्य महाश्रमण ने ‘आयारो’ आगम के आधार पर अपने मंगल प्रवचन में आत्मा और कर्मों के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा, “आत्मा पर अनादि काल से कर्मों का कब्जा है, जो उसकी शक्तियों को दबाकर जन्म-मरण के चक्र में बाँधे रखता है। इन कर्मों के कारण ही आत्मा दुख का अनुभव करती है। आत्मा को इस बंधन से मुक्त करने के लिए एक युद्ध की आवश्यकता है, और यह युद्ध धर्म और अध्यात्म की साधना के माध्यम से लड़ा जाता है।” आचार्य ने तात्त्विक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि आत्मा को कर्मों से मुक्त करने के लिए संवर (नए कर्मों के प्रवेश को रोकना) और निर्जरा (संचित कर्मों का नाश) की साधना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि यह साधना केवल मानव जीवन में ही संभव है। “तिर्यंच (पशु) योनि में संवर की साधना सीमित रूप में हो सकती है, लेकिन निर्जरा का मार्ग केवल मनुष्य योनि में खुलता है। इसलिए, इस मानव जीवन का उपयोग धर्म की साधना और आत्मशुद्धि के लिए करना चाहिए,” उन्होंने जोर दिया।

चातुर्मास और पर्युषण का महत्व

Jain Terapanth Chaturmas sermons आचार्य ने हाल ही में संपन्न हुए पर्युषण पर्वाधिराज का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पर्व धर्म की उत्कृष्ट साधना का अवसर प्रदान करता है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ परंपरा में ज्ञानशाला व्यवस्था के माध्यम से बच्चों और युवाओं को नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है। उन्होंने कहा, “श्रावण और भाद्रपद का महीना धर्म की साधना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस दौरान तप, त्याग, और स्वाध्याय के माध्यम से आत्मा को शुद्ध करने का अवसर प्राप्त होता है।”
उन्होंने तेरापंथी श्रावकों को प्रेरित करते हुए कहा कि सप्ताह में कम से कम एक दिन सामायिक (ध्यान और आत्मचिंतन) का अभ्यास करना चाहिए। इसके साथ ही, प्रत्याख्यान (कुछ विशेष त्याग), अहिंसा का पालन, और नवकार मंत्र का जप जैसे छोटे-छोटे कार्य जीवन में शामिल करने चाहिए। “जीवन में जितना संभव हो, धर्म से युक्त कार्य करें। ध्यान, उपवास, तपस्या, और स्वाध्याय के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करें। मानसिक उलझनों से बचें और प्रसन्न रहने का प्रयास करें,” आचार्य ने सलाह दी।
ज्ञानशाला की प्रस्तुति और तपस्या पर चर्चा

Jain philosophy karma and soul liberation आचार्य के प्रवचन के बाद, नवरंगपुर ज्ञानशाला के बच्चों ने अपनी रचनात्मक प्रस्तुति दी, जिसमें उन्होंने धर्म, तप, और अहिंसा के महत्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। मुनि मदनकुमार ने तपस्या के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि तप आत्मा को कर्मों से मुक्त करने और मन को शांति प्रदान करने का सशक्त साधन है। उन्होंने उपवास, स्वाध्याय, और ध्यान जैसे तप के रूपों को अपनाने की सलाह दी।

दूगड़ परिवार को आध्यात्मिक संबल
Chaturmas significance in Jainism कार्यक्रम के दौरान रतनगढ़-कोलकाता के स्व. बुद्धमल दूगड़ का परिवार आचार्य की मंगल सन्निधि में आध्यात्मिक संबल प्राप्त करने के लिए उपस्थित था। आचार्य ने परिवार को पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्हें धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा और मुख्यमुनि महावीरकुमार ने भी परिवार को आध्यात्मिक मार्गदर्शन और संबल प्रदान किया। इसके अलावा, मुनि दिनेशकुमार, मुनि कुमारश्रमण, मुनि योगेशकुमार, मुनि कीर्तिकुमार, मुनि विश्रुतकुमार, और मुनि ध्यानमूर्ति ने भी अपने विचार व्यक्त किए, जिसमें उन्होंने तप, त्याग, और अहिंसा के महत्व पर बल दिया।
जैन दर्शन में संवर और निर्जरा का महत्व
Jain fasting penance significance जैन दर्शन में संवर और निर्जरा आत्मशुद्धि के दो मूलभूत सिद्धांत हैं। संवर का अर्थ है नए कर्मों को आत्मा में प्रवेश करने से रोकना, जो सावधानी, संयम, और धार्मिक अनुशासन के माध्यम से संभव है। निर्जरा का अर्थ है पहले से संचित कर्मों का नाश करना, जो तप, उपवास, स्वाध्याय, और ध्यान जैसे साधनों से होता है। आचार्यश्री ने कहा कि इन दोनों साधनाओं के माध्यम से ही आत्मा कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकती है।
