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Ash Wednesday : जानें क्यों माथे पर लगाई जाती है राख और लेंट में उपवास की गजब कहानी | lent days 2025

Laxman Singh Rathor March 5, 2025 1 minute read

ईसाई धर्म में ऐश बुधवार (Ash Wednesday) एक महत्वपूर्ण दिन होता है, जो लेंट (Lent day 2025) की 40 दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है। इस दौरान प्रार्थना, उपवास और सेवा के माध्यम से यीशु मसीह के बलिदान और पुनरुत्थान को याद किया जाता है। यह दिन खासतौर पर माथे पर राख के क्रॉस के निशान से पहचाना जाता है, जो पश्चाताप और पवित्रता का प्रतीक होता है।

लेंट एक 40 दिवसीय धार्मिक साधना का समय है, जो ईस्टर संडे से पहले आता है। इस दौरान ईसाई अनुयायी आत्मशुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना से प्रार्थना और उपवास करते हैं। ऐतिहासिक रूप से, 601 ईस्वी में पोप ग्रेगोरी ने पहली बार लेंट को आधिकारिक रूप से मनाने की परंपरा शुरू की थी। उस समय यह 46 दिनों तक मनाया जाता था, जिसमें 40 दिन उपवास के लिए और छह रविवार पर्व के रूप में शामिल थे।

ऐश बुधवार केवल लेंट की शुरुआत का दिन नहीं, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण, पश्चाताप और नए सिरे से आध्यात्मिक यात्रा शुरू करने का अवसर है। यह समय ईसाई समुदाय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, जब वे ईश्वर के करीब आने और उनके द्वारा दिखाए गए प्रेम और बलिदान को समझने का प्रयास करते हैं।

इस वर्ष, ऐश बुधवार 5 मार्च को पड़ रहा है और लेंट का समापन 17 अप्रैल, जिसे होली थर्सडे (Holy Thursday) कहा जाता है, पर होगा।

ऐश बुधवार: राख का क्या महत्व है?

ऐश बुधवार को चर्च में विशेष प्रार्थनाएँ आयोजित की जाती हैं, जिसमें पुजारी श्रद्धालुओं के माथे पर राख से क्रॉस का निशान बनाते हैं। यह राख पिछले वर्ष के पाम संडे (Palm Sunday) की सूखी हुई पत्तियों को जलाकर तैयार की जाती है। ईसाई धर्म में यह निशान यह दर्शाता है कि मनुष्य नश्वर है और उसे हमेशा अपनी आत्मा की पवित्रता के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। अमेरिका में, राख को पवित्र जल या तेल के साथ मिलाकर एक हल्का पेस्ट बनाया जाता है, जबकि कुछ अन्य देशों में सूखी राख सीधे माथे पर छिड़की जाती है।

लेंट के दौरान उपवास और मांसाहार का परहेज क्यों?

लेंट का 40 दिन का समय यीशु मसीह के उस उपवास की याद दिलाता है, जब उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से पहले 40 दिन रेगिस्तान में रहकर प्रार्थना और उपवास किया था। इसी परंपरा को निभाने के लिए लेंट के दौरान अनुयायी उपवास रखते हैं।

इसके अलावा, इस दौरान हर शुक्रवार को मांसाहार का त्याग किया जाता है, विशेष रूप से ऐश बुधवार और गुड फ्राइडे (Good Friday) पर। मांस से परहेज करने का कारण यह माना जाता है कि गुड फ्राइडे को यीशु ने अपने शरीर का बलिदान दिया था, इसलिए श्रद्धालु उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इन दिनों मांसाहार नहीं करते। हालाँकि, मछली को इसमें शामिल नहीं किया जाता और डेयरी उत्पाद जैसे दूध, अंडे, मक्खन आदि खाने की अनुमति होती है।

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लेंट का उद्देश्य और इसका आध्यात्मिक महत्व

लेंट केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक विकास का समय होता है। इस दौरान ईसाई अनुयायी अपने जीवन की गलतियों को सुधारने, जरूरतमंदों की सेवा करने और प्रार्थना के माध्यम से अपने विश्वास को मजबूत करने का प्रयास करते हैं।

कैथोलिक चर्च के अनुसार, लेंट के दौरान तीन प्रमुख कार्य करने की सलाह दी जाती है:

  1. प्रार्थना – ईश्वर के साथ संबंध को गहरा करने के लिए।
  2. उपवास – आत्मसंयम और आत्म-नियंत्रण के अभ्यास के रूप में।
  3. दान-पुण्य – जरूरतमंदों की सेवा के लिए।

पोप फ्रांसिस की तबीयत बनी चिंता का विषय

इस वर्ष ऐश बुधवार ऐसे समय में आया है जब पोप फ्रांसिस को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें 14 फरवरी को श्वसन संबंधी बीमारी के कारण रोम के जेमेली अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वेटिकन के अनुसार, पोप को दो बार “तीव्र श्वसन विफलता” का सामना करना पड़ा, जिसके कारण डॉक्टरों को उनकी सांस नली खोलने के लिए दो प्रक्रियाएँ करनी पड़ीं।

कैसे मनाएं लेंट?

यदि आप इस लेंट सीजन को सही तरीके से मनाना चाहते हैं, तो आप निम्नलिखित बातों का पालन कर सकते हैं:

  • नियमित रूप से प्रार्थना करें और ईश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना करें।
  • स्वयं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करें, जैसे सोशल मीडिया से दूरी बनाना या किसी बुरी आदत को छोड़ना।
  • जरूरतमंदों की मदद करें, चाहे वह आर्थिक रूप से हो या सेवा कार्यों के माध्यम से।
  • हर शुक्रवार को मांसाहार से परहेज करें और संयम बरतें।
  • पवित्र बाइबिल का अध्ययन करें और आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाएं।
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परम्परा के शुरू होने की कहानी

ऐश बुधवार (Ash Wednesday) की परंपरा ईसाई धर्म में कई सदियों से चली आ रही है। यह दिन लेंट (Lent) नामक 40 दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है, जो ईस्टर संडे से पहले मनाया जाता है। ऐश बुधवार विशेष रूप से पश्चाताप, प्रायश्चित और आत्मशुद्धि से जुड़ा हुआ है।

ऐश बुधवार की परंपरा की शुरुआत लगभग 10वीं शताब्दी में हुई थी, लेकिन इसका आधार बाइबिल और प्राचीन यहूदी तथा ईसाई परंपराओं में मिलता है। पुराने नियम (Old Testament) में कई स्थानों पर राख (Ashes) को पश्चाताप और विनम्रता का प्रतीक माना गया है। उदाहरण के लिए, योना (Jonah) की पुस्तक में वर्णन मिलता है कि जब नीनवे (Nineveh) के लोगों ने अपने पापों के लिए पश्चाताप किया, तो उन्होंने अपने शरीर पर राख डालकर उपवास किया।

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ईसाई परंपरा में ऐश बुधवार पहली बार 6वीं शताब्दी में पोप ग्रेगोरी प्रथम (Pope Gregory I) के काल में एक व्यवस्थित रूप में आया। हालाँकि, 10वीं शताब्दी तक यह पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ था। 1091 ईस्वी में पोप अर्बन द्वितीय (Pope Urban II) ने इसे औपचारिक रूप से कैथोलिक चर्च में अनिवार्य किया, जिसके बाद यह पूरी दुनिया में ईसाइयों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान बन गया।

ऐश बुधवार को चर्च में एक विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की जाती है, जिसमें पुजारी श्रद्धालुओं के माथे पर राख से क्रॉस का निशान बनाते हैं। यह राख पिछले वर्ष के पाम संडे (Palm Sunday) की सूखी पत्तियों को जलाकर बनाई जाती है। यह प्रतीकात्मक रूप से इस बात का संकेत है कि मानव जीवन नश्वर है और सभी को एक दिन मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार, ऐश बुधवार की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है और आज भी इसे ईसाई समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में मनाया जाता है।

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About the Author

Laxman Singh Rathor

Administrator

Laxman Singh Rathor को पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक का लंबा अनुभव है। 2005 में Dainik Bhakar से कॅरियर की शुरुआत कर बतौर Sub Editor कार्य किया। वर्ष 2012 से 2019 तक Rajasthan Patrika में Sub Editor, Crime Reporter और Patrika TV में Reporter के रूप में कार्य किया। डिजिटल मीडिया www.patrika.com पर भी 2 वर्ष कार्य किया। वर्ष 2020 से 2 वर्ष Zee News में राजसमंद जिला संवाददाता रहा। आज ETV Bharat और Jaivardhan News वेब पोर्टल में अपने अनुभव और ज्ञान से आमजन के दिल में बसे हैं। लक्ष्मण सिंह राठौड़ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि खबरों की दुनिया में एक ब्रांड हैं। उनकी गहरी समझ, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग, पाठक व दर्शकों से जुड़ने की क्षमता ने उन्हें पत्रकारिता का चमकदार सितारा बना दिया है। jaivardhanpatrika@gmail.com

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