
INCOME TAX RENT TDS RULE : अगर आप किराए के मकान में रहते हैं और हर महीने अच्छा-खासा house rent चुकाते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। कई लोग किराया तो नियमित रूप से देते हैं, लेकिन उससे जुड़े Income Tax rules को नजरअंदाज कर देते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर भारी पड़ सकती है। खासकर ऐसे किरायेदार, जो हर महीने 50,000 रुपये या उससे ज्यादा किराया देते हैं, उन्हें TDS के इस नियम की जानकारी होना बहुत जरूरी है। नियम का पालन न करने पर Income Tax Department की ओर से notice आ सकता है, साथ ही interest, late fee और penalty भी चुकानी पड़ सकती है।
क्या है सेक्शन 194-IB का नियम
Income Tax Act 1961 के Section 194-IB के तहत यदि कोई individual या HUF (Hindu Undivided Family) हर महीने 50,000 रुपये से ज्यादा मकान किराया देता है, तो उसे उस rent पर TDS काटना जरूरी होता है। इस TDS को काटने की जिम्मेदारी मकान मालिक की नहीं, बल्कि tenant यानी किरायेदार की होती है। इसका मतलब है कि किरायेदार को पहले तय नियम के अनुसार टैक्स काटना होगा और उसके बाद बाकी रकम मकान मालिक को देनी होगी।
किरायेदार को कब काटना होता है TDS
RENT TDS RULE FOR TENANTS : टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक TDS हर महीने काटना जरूरी नहीं होता, बल्कि इसे आमतौर पर financial year के आखिरी महीने में या उस महीने काटा जाता है, जब किरायेदार मकान खाली करता है। यानी जिस समय rent credit होता है या tenancy खत्म होती है, उसी समय TDS deduction किया जाता है। इसके बाद जिस महीने TDS काटा गया है, उस महीने के खत्म होने के 30 दिन के भीतर इसे सरकार के पास जमा करना जरूरी होता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी किरायेदार ने मार्च 2026 में TDS काटा है, तो उसे 30 अप्रैल 2026 तक सरकार के खाते में जमा कराना होगा। यह deadline मिस होने पर financial consequences शुरू हो सकते हैं।
यह नियम क्यों लाया गया था
सरकार ने यह प्रावधान यूं ही लागू नहीं किया था। दरअसल, Income Tax Department ने देखा कि कई taxpayers अपने HRA claim में बड़े किराए का दावा करते हैं, लेकिन वही income मकान मालिक अपनी टैक्सेबल आय में नहीं दिखाते। इससे एक तरह का mismatch पैदा होता था। इसी गड़बड़ी को रोकने, rental transactions को formal बनाने और tax compliance बढ़ाने के लिए साल 2017 में Section 194-IB को लागू किया गया।
TDS का रेट कितना है
TDS ON RENT FOR INDIVIDUAL : इस नियम के तहत यदि कोई व्यक्ति या HUF हर महीने 50,000 रुपये से ज्यादा किराया देता है, तो उसे निर्धारित दर से TDS काटना होता है। पहले इस TDS की दर 5 फीसदी थी, लेकिन बाद में इसमें बदलाव किया गया। यदि मकान मालिक के पास PAN उपलब्ध है, तो तय दर से TDS काटा जाएगा। लेकिन अगर landlord के पास PAN नहीं है, तो TDS की दर बढ़कर 20 फीसदी तक हो सकती है।
हालांकि यहां एक राहत की बात भी है। कानून के अनुसार जो TDS काटा जाएगा, वह मकान के अंतिम महीने के किराए से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानी deduction की भी एक practical limit तय की गई है।
TDS रेट में कब हुआ बदलाव
TDS ON RENT FOR HUF : सरकार ने Union Budget 2024 में Section 194-IB के तहत TDS rate को घटाकर 5 फीसदी से 2 फीसदी कर दिया था। यह संशोधित दर 1 अक्टूबर 2024 से लागू हो गई। यानी अब पात्र किरायेदारों को पहले के मुकाबले कम दर से TDS deduct करना होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नियम का पालन हल्के में लिया जाए। दर कम हुई है, नियम खत्म नहीं हुआ।

नियम नहीं मानने पर क्या हो सकता है
अगर किरायेदार इस प्रावधान का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ कई तरह की कार्रवाई हो सकती है। सबसे पहले, TDS नहीं काटने पर interest देना पड़ सकता है। अगर TDS काटा ही नहीं गया, तो non-deduction वाले समय के लिए 1 फीसदी प्रतिमाह की दर से ब्याज लग सकता है। वहीं यदि TDS काट लिया गया लेकिन सरकार के पास समय पर जमा नहीं किया गया, तो 1.5 फीसदी प्रतिमाह की दर से interest देना पड़ सकता है।
इसके अलावा TDS return या संबंधित filing में देरी होने पर 200 रुपये प्रतिदिन की दर से late filing fee भी लग सकती है। यह देरी जितने दिन चलेगी, उतना शुल्क बढ़ता जाएगा।
1 लाख रुपये तक की पेनाल्टी कैसे लग सकती है
इस नियम का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यदि TDS return फाइल नहीं की जाती या नियमों का पालन नहीं किया जाता, तो Section 271H के तहत 1 लाख रुपये तक की penalty लग सकती है। यही कारण है कि इस खबर को हल्के में नहीं लेना चाहिए। कई बार लोगों को लगता है कि किराया देना एक private arrangement है, लेकिन जब रकम 50,000 रुपये प्रति माह से ऊपर जाती है, तो वह सीधे tax compliance के दायरे में आ जाती है।
इतना ही नहीं, किरायेदार को assessee in default भी घोषित किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जो टैक्स नहीं काटा गया, उसकी वसूली भी किरायेदार से की जा सकती है। यानी गलती का सीधा वित्तीय बोझ tenant पर आ सकता है।
किन लोगों को सबसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत
यह नियम खासतौर पर उन salaried employees, professionals, businesspersons और high-rent urban tenants के लिए बेहद अहम है, जो महानगरों या बड़े शहरों में ऊंचे किराए वाले मकानों में रहते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, गुरुग्राम, नोएडा और अन्य बड़े शहरों में 50,000 रुपये से ज्यादा monthly rent आम बात होती जा रही है। ऐसे में कई लोग अनजाने में इस नियम के दायरे में आ जाते हैं।
क्या ध्यान रखें किरायेदार
किरायेदार को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले यह जांच लें कि आपका monthly rent 50,000 रुपये से ज्यादा है या नहीं। यदि हां, तो landlord का PAN number जरूर लें। इसके बाद सही rate से TDS calculate करें, तय समय पर deduct करें और समयसीमा के भीतर सरकार के पास जमा करें। साथ ही संबंधित return और compliance formalities भी समय पर पूरी करें। थोड़ी सी लापरवाही बाद में बड़ा टैक्स विवाद बन सकती है।



