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Mahatma Bhuri Bai : महात्मा भूरी बाई अलख मेवाड़ की एक और मीरा, ओशो भी थे प्रभावित

Jaivardhan News July 19, 2024 1 minute read

Mahatma Bhuri Bai : श्री विश्वकर्मा सुधार वंश के गौरव और महान संत महात्मा भूरी बाई सुथार अलख उपाधि से जाना जाता है। “महात्मा भूरी बाई अलख” का जन्म राजसमन्द जिले के लावा सरदारगढ़ गाँव में संवत् 1949 में आषाढ़ शुक्ला 14 को एक सुथार परिवार में हुआ। माता का नाम केसर बाई और पिता का नाम रूपा जी सुथार है। माता-पिता दोनों बहुत धर्मप्राण और नीति-धर्म पर चलने वाले दंपति थे। तेरह वर्ष की अल्पायु में रीति-रिवाज के अनुसार भूरी बाई का विवाह नाथद्वारा के चित्रकार फतहलाल जी सुथार के साथ कर दिया गया। कालान्तर में पति का बीमारी से देहान्त हो गया तो भूरीबाई के गृहस्थ जीवन खण्डित हो गया और उनके जीवन में एक भूचाल आ गया, तब उनका मन धीरे-धीरे संसार से विरक्त हो कर प्रभु भक्ति की ओर अग्रसर हो गया। साधना और भक्ति के क्षेत्र में उनमें एक ऐसी ही तीव्र लगन उत्पन्न हो गई कि कई धर्मपरायण लोग उनसे प्रभावित हुए तथा उनके पास सत्संग करने आने लगे।

Meera of Mewar : महात्मा भूरीबाई के नाम से हुई विख्यात

Meera of Mewar : गृहस्थ जीवन में रह कर सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए भी दार्शनिक विचारों व भक्ति भावना के कारण वे महात्मा भूरीबाई के नाम से विख्यात हो गई। महात्मा भूरीबाई विचारों से अद्वैत की परम समर्थक थी । परमहंस की महानुभूति में रमी हुई श्री भूरीबाई दार्शनिक चर्चा में ज्यादा विश्वास नहीं करती थीं। उनका अपनी भक्त मंडली में एक ही निर्देश था- “चुप” । बस चुप रहो और मन ही मन उसे भजो, उसमें रमो। बोलो मत। ‘चुप’ शब्द समस्त विधियों का निषेध है। बोलने – कहने से विभ्रम पैदा होता है, बात उलझती है और अधूरी रह जाती है। अध्यात्म जगत में भूरीबाई के नाम, उनकी भक्ति और ज्ञान की प्रसिद्धि पाकर ओशो रजनीश जैसे विश्व प्रसिद्ध चिंतक व दार्शनिक भी उनसे मिलने आए थे और भूरीबाई की भक्ति व दर्शन की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी। Rajsamand news today

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Bhuri Bai Suthar : भगवदप्राप्ति के लिए सन्यास आवश्यक नही

Bhuri Bai Suthar : विख्यात सन्त सनातन देव जी और अनेक दार्शनिक, ज्ञानी, भक्त, महात्मा, कई रियासतों के ठाकुर, अन्य खास व आम लोग बिना बुलाए इस साधारण सी अल्पशिक्षित विधवा से बार-बार सान्निध्य पाकर मार्गदर्शन हेतु आते रहते थे। भूरी बाई ने अपनी गृहस्थी का मोर्चा नहीं छोड़ा और अंतिम समय तक प्राण रहते घर-गृहस्थी के सारे काम और अतिथि सत्कार अनवरत करती रहीं। स्त्री-शरीर में होने से बाई ने किसी महात्मा के प्रेरित करने पर भी संन्यास लेना उचित नहीं समझा। वे महाराज जनक की तरह अपने घर में ही देह पाकर भी ‘विदेह’ बनीं रहीं और इस बात को झुठला दिया कि भगवद्प्राप्ति के लिए गृहत्याग और संन्यास आवश्यक है।

नामभूरीबाई
जन्म स्थललावासरदारगढ़, आमेट, जिला राजसमंद
जन्म दिनसंवत् 1949 में आषाढ़ शुक्ला 14 (चतुदर्शी)
माता- पिता का नामकेसर बाई और रूपा सुथार
पति का नामफतहलाल सुथार
ससुरालनाथद्वारा
विशेष विवरणपति के निधन के बाद महात्मा भूरी बाई
सीख व भक्तिचुप

Mahatma Bhuri Bai Alakh : महात्मा भूरी बाई भजन पर देती जोर

Mahatma Bhuri Bai Alakh : मेवाड़ के महान् तत्त्वज्ञानी सन्त बावजी चतुरसिंह जी भी भूरीबाई से चर्चा हेतु आया करते थे। महात्मा भूरीबाई भजन पर जोर देती थी तथा सांसारिक बातों से बचने की सलाह देतीं, लेकिन संसार के सभी कर्तव्यों को पूरा करने का भी आग्रह करती। उनकी चर्चा का माध्यम प्रायः मेवाड़ी बोली ही रहती थी। मेवाड़ी में ही सहज बातचीत करते हुए ही वे ऊंची से ऊंची तत्त्व ज्ञान की बात कह देती थी। इस विभूति का देहावसान 1979 ई., वैशाख शुक्ला 7 संवत् 2036 को हुआ । अध्यात्म जगत में वे आज भी लोकप्रिय है। उनके देहावसान के बाद भी नाथद्वारा स्थित उनके छोटे से आश्रम पर प्रति सप्ताह लोग सत्संग करने आया करते हैं। संत महात्मा भूरी बाई के जन्मोत्सव एवं गुरु पूर्णिमा पर सरदारगढ़ स्थित महात्मा भूरी बाई मंदिर पर आकर सत्संग करते हैं।

bhuri bai alakh : भूरीबाई के जीवन की कहानी

bhuri bai alakh : भूरीबाई की कहानी त्याग, समर्पण और गहन आध्यात्मिकता का प्रतीक है। उन्होंने अपने जीवन से “चुप रहो” की गूढ़ सीख दी, जो उनके व्यक्तित्व और दर्शन को समझने का एक मूलभूत पहलू है। भूरीबाई का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन सामान्य ग्रामीण जीवन में बीता, लेकिन उनके भीतर एक असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा बचपन से ही प्रकट होने लगी थी। सरल स्वभाव, विनम्रता और शांतचित्त उनके व्यक्तित्व के प्रमुख गुण थे।

नाथद्वारा, जिसे श्रीनाथजी की नगरी कहा जाता है, भूरीबाई के आध्यात्मिक जीवन का केंद्र बना। यहां उन्होंने साधना की और अपने भीतर की ऊर्जा को परमात्मा से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी साधना का मुख्य संदेश आत्मसंयम, ध्यान और मौन था। उन्होंने सिखाया कि मौन में अद्भुत शक्ति होती है, जो आत्मा को शांति और परम सत्य से जोड़ती है। भूरीबाई का जीवन आत्मसमर्पण और सादगी का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनकी कहानी हमें यह एहसास कराती है कि मौन और आत्म-संयम के द्वारा हम न केवल अपने भीतर की शांति पा सकते हैं, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

bhuri bai rajasthan : “चुप रहो” की शिक्षा

bhuri bai rajasthan : भूरीबाई ने अपने जीवन से “चुप रहो” का पाठ पढ़ाया। इसका मतलब केवल मौन रहना नहीं था, बल्कि यह आंतरिक और बाह्य रूप से शांति बनाए रखने का एक तरीका था। उनका कहना था कि अनावश्यक बोलने से हम अपनी ऊर्जा खोते हैं और ध्यान व आत्मा की गहराइयों तक नहीं पहुंच पाते। उनके अनुसार, मौन के माध्यम से व्यक्ति अपनी कमजोरियों को पहचान सकता है और आत्म-सुधार की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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भूरी बाई अलख : समाज सेवा और योगदान

भूरीबाई ने अपने साधारण और विनम्र जीवन के बावजूद समाज के लिए कई कार्य किए:

  1. आध्यात्मिक जागृति
    उन्होंने लोगों को अपने जीवन में आत्म-संयम, ध्यान और सेवा का महत्व समझाया। उनकी सादगी और साधना ने कई लोगों को प्रेरित किया।
  2. महिलाओं को सशक्त करना
    भूरीबाई ने ग्रामीण महिलाओं को उनकी शक्ति का एहसास कराया और उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी।
  3. नाथद्वारा में सांस्कृतिक योगदान
    नाथद्वारा में उनकी उपस्थिति ने भक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम दिया। उन्होंने लोगों को न केवल धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी प्रोत्साहित किया।

bhuri bai nathdwara : जीवन का दर्शन

bhuri bai nathdwara : भूरीबाई का जीवन यह सिखाता है कि शांति और समर्पण के माध्यम से हर समस्या का समाधान संभव है। “चुप रहो” का उनका संदेश हमें इस बात की याद दिलाता है कि अनावश्यक बोलने से बचकर, हम जीवन में संतुलन और स्पष्टता प्राप्त कर सकते हैं।

विरासत

भूरीबाई का जीवन उनके बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना। उनकी साधना और संदेश आज भी नाथद्वारा के साथ मेवाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश व देश में गूंजते हैं। वे हमें यह सिखाती हैं कि सादगी और मौन के माध्यम से आत्मज्ञान और शांति प्राप्त की जा सकती है।

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