
Neglect of elderly : एक मार्मिक घटना ने सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर गहरे सवाल खड़े किए हैं। एक परिवार में माता-पिता के प्रति बेटों की उदासीनता और वृद्धाश्रम में छोड़े जाने की घटना ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या आधुनिकता के दौर में रिश्तों का महत्व खोता जा रहा है। पड़ोस में आयोजित एक श्राद्ध समारोह, जो दिखावे से भरा था, ने इस कहानी को और भी दुखद बना दिया।
Story : कहानी उन माता-पिता की है, जिन्होंने अपने जीवन में हर जरूरतमंद की मदद की। धन-संपत्ति होने के बावजूद, उन्होंने कभी घमंड नहीं किया और लोगों की परेशानियों को समझकर उनकी सहायता की। उनके दो बेटे थे—बड़ा बेटा लंदन में बसा था, जबकि छोटा बेटा उनके साथ रहता था। समय के साथ पोते-पोतियां हुईं, और परिवार अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गया। जैसे-जैसे माता-पिता की उम्र बढ़ी, उनकी शारीरिक क्षमता कम होती गई। एक दिन छोटी-सी बीमारी के बाद उन्होंने अपने बड़े बेटे को बुलाया। दोनों बेटों ने मिलकर पिता की संपत्ति को बराबर बांट लिया। बड़ा बेटा लंदन लौट गया, और ऐसा लगा जैसे उसका माता-पिता से कोई रिश्ता ही न रहा। छोटे बेटे ने भी एक दिन यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया कि वह अब अपने परिवार को संभालेगा और माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देगा।
old age homes stories : माता-पिता के लिए यह शब्द किसी तीर से कम नहीं थे। अपने ही घर में बेगाने से बनकर, उन्होंने रात आंसुओं और दुख में बिताई। सुबह होते ही वे अपने बनाए घर को आखिरी बार निहारते हुए वृद्धाश्रम के लिए रवाना हो गए। बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम के दरवाजे पर उतारा और बिना कोई स्नेह या संवेदना दिखाए चला गया। घर लौटकर उसने सामान्य जीवन शुरू कर दिया, जैसे कोई बड़ा बोझ उतारकर आया हो। आज उसी परिवार में उन माता-पिता का श्राद्ध समारोह आयोजित किया गया, जिसमें पड़ोसियों को भव्य भोज के लिए बुलाया गया।

Story of neglect of the elderly : यह आयोजन उस बेटे और बहू द्वारा किया गया, जिन्होंने कभी अपने माता-पिता के लिए दो रोटी तक का प्रबंध नहीं किया। पड़ोस की एक महिला, जो इस दुखद कहानी से वाकिफ थी, ने इस दिखावे पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “जिस बेटे के पास अपने देवता तुल्य माता-पिता के लिए दो रोटी नहीं थी, उस घर का पानी भी जहर के बराबर है।”यह घटना न केवल एक परिवार की कहानी है, बल्कि यह आधुनिक समाज में बढ़ती स्वार्थपरता और बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा को दर्शाती है।
यह हमें अपने पारिवारिक मूल्यों और जिम्मेदारियों पर विचार करने के लिए मजबूर करती है। क्या धन और व्यस्तता हमें इतना अंधा बना देती है कि हम अपने माता-पिता जैसे अनमोल रिश्तों को भूल जाते हैं? यह प्रश्न हर किसी के लिए आत्ममंथन का विषय है।
