
Rajasthan HC pension order 2025 : जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच ने एक ऐतिहासिक और दिल जीतने वाले फैसले में उन हजारों संविदा-अस्थायी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है, जिन्होंने दशकों तक मेहनत की, लेकिन रिटायरमेंट के समय सरकार ने उन्हें “अस्थायी” कहकर दरकिनार कर दिया। जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा – “लगातार 40 साल तक दी गई निष्ठापूर्ण सेवा को महज ‘अस्थायी’ का ठप्पा लगाकर कर्मचारी को उसके मूल अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”
मुख्य याचिकाकर्ता सत्यनारायण शर्मा की 44 साल पुरानी कहानी
Satyanarayan Sharma vs Rajasthan government pension case : भीलवाड़ा निवासी सत्यनारायण शर्मा को 5 अगस्त 1981 को पंचायत समिति लूणकरणसर (बीकानेर) में गेट कीपर के पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्त किया गया था। 1992 में उन्हें चुंगी नाका रक्षक बनाया गया। राजस्थान में 1990 के दशक में ऑक्ट्रॉय (चुंगी) व्यवस्था खत्म होने के बाद ये सारे कर्मचारी “सरप्लस” घोषित हो गए।
लेकिन 6 अगस्त 1998 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मानवीय आधार पर बड़ा फैसला लिया था – “ऑक्ट्रॉय कर्मचारियों की छंटनी नहीं होगी।” इसी आदेश के बल पर सत्यनारायण शर्मा समेत सैकड़ों कर्मचारी अलग-अलग ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों में काम करते रहे। सत्यनारायण ने 14 अगस्त 1981 से लगातार 2021 तक यानी पूरे 40 साल से ज्यादा समय तक एक ही विभाग में सेवा दी।

सरकार ने भी माना था – न्यूनतम वेतन तो देंगे, लेकिन…
Rajasthan temporary worker retirement benefits : 23 नवंबर 2007 को जिला परिषद बीकानेर ने सभी सरप्लस कर्मचारियों की लिस्ट बनाकर समायोजन के लिए भेजी। 27 नवंबर 2016 को ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग ने आदेश जारी किया कि ऐसे सभी कर्मचारियों को चतुर्थ श्रेणी का न्यूनतम वेतनमान दिया जाए। फिर भी सत्यनारायण शर्मा और कई अन्य कर्मचारियों का नाम इस लिस्ट से गायब रहा। रिटायरमेंट के बाद जब पेंशन और ग्रेच्युटी की बारी आई तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए – “नियुक्ति तो अस्थायी थी न!”
हाईकोर्ट ने सरकार के तर्क को पूरी तरह खारिज किया
High Court latest judgment on pension : सरकारी वकीलों और अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि
- नियुक्ति नियमित भर्ती प्रक्रिया से नहीं हुई थी
- मानवीय आधार पर सेवा दी गई, इसलिए पेंशन का हक नहीं बनता
जस्टिस रेखा बोराणा ने इन तर्कों को सिरे से नकारते हुए कहा – “यह निर्विवाद तथ्य है कि याचिकाकर्ता ने बिना एक दिन का गैप लिए 40 साल से ज्यादा समय तक राज्य सरकार को सेवा दी है। इतनी लंबी अवधि की सेवा को अस्थायी नहीं कहा जा सकता।”
कोर्ट ने अपने फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट के ही पुराने ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया:
- कन्हैयालाल नाई बनाम राज्य सरकार
- लालाराम सैनी एवं अन्य बनाम राज्य सरकार
इन फैसलों में साफ कहा गया था कि दशकों की निरंतर सेवा अपने आप में “नियमित सेवा” का दर्जा रखती है।
कोर्ट के प्रमुख आदेश
- याचिकाकर्ताओं को उनकी मूल नियुक्ति तिथि (1981 से) ही चतुर्थ श्रेणी का नियमित कर्मचारी मानते हुए पेंशन और सभी रिटायरमेंट बेनिफिट्स (ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट आदि) दिए जाएं।
- पेंशन की गणना नियमानुसार की जाए।
- हालांकि कोर्ट ने साफ कर दिया कि Pay Fixation के आधार पर पुराना एरियर (बकाया वेतन) नहीं दिया जाएगा, ताकि राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
इन 11 कर्मचारियों को तुरंत मिलेगा फायदा
Regularisation of long-term temporary employees : इस एक फैसले से कुल 11 कर्मचारियों को सीधा लाभ मिलेगा:
- मुख्य याचिकाकर्ता: सत्यनारायण शर्मा (लूणकरणसर, बीकानेर)
- पाली जिले (सोजत रोड क्षेत्र) के 7 कर्मचारी: परमानंद शर्मा, सोहन सिंह चौहान, कल्याण सिंह, शांतिलाल सेन, महेंद्र कुमार, सुंदर देवी, ढगलाराम प्रजापत
- भीलवाड़ा जिले (मांडल एवं कोटड़ी) के 3 कर्मचारी: रमेश चंद्र भट्ट, छोटूसिंह राजपूत, ललितशंकर भट्ट
पूरे राजस्थान के लिए मिसाल बनेगा यह फैसला
राजस्थान में अभी भी हजारों की संख्या में ऐसे संविदा, दैनिक वेतनभोगी, वर्कचार्ज, सरप्लस और अस्थायी कर्मचारी हैं, जिन्होंने 20-25-30-40 साल तक सेवा दी है। यह फैसला उनके लिए उम्मीद की बड़ी किरण है। वकीलों का कहना है कि अब इसी फैसले का हवाला देकर सैकड़ों याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल हो सकती हैं।
अगर आप भी या आपके परिवार में कोई ऐसा कर्मचारी है जिसने दशकों तक अस्थायी/संविदा के नाम पर सेवा दी और रिटायरमेंट के बाद पेंशन से वंचित है – तो यह फैसला आपके लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। क्योंकि कोर्ट ने साफ कह दिया है – “मेहनत का सम्मान कोई ठप्पा नहीं मिटा सकता।”



