
Scientific Spiritual Yoga Camp : इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर साइंटिफिक स्पिरिचुअलिज्म, मेरठ के तत्वावधान में कांकरोली के अणुविभा परिसर में आयोजित सात दिवसीय मानस योग साधना शिविर के चौथे दिन साधकों को स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता के गहरे सूत्रों से जोड़ा गया। इस शिविर का उद्देश्य प्राचीन शास्त्रों में वर्णित जीवनशैली को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनाकर शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है। शिविर के विभिन्न सत्रों में योग, आसन, तप, सेवा और सुमिरन जैसे विषयों पर गहन चर्चा और प्रशिक्षण हुआ।
प्रथम सत्र: सूक्ष्म व्यायाम और योग प्रशिक्षण
Manas Yog Sadhna Shivir Kankroli : शिविर के चौथे दिन के प्रथम सत्र की शुरुआत डॉ. गोपाल शास्त्री के मार्गदर्शन में हुई। उन्होंने साधकों को सूक्ष्म व्यायाम, योग और विभिन्न आसनों का प्रशिक्षण दिया। इस सत्र में विशेष रूप से कमर दर्द और पैरों के दर्द से राहत पाने के लिए उपयोगी आसनों पर ध्यान केंद्रित किया गया। डॉ. शास्त्री ने बताया कि नियमित रूप से इन आसनों का अभ्यास करने से शरीर में लचीलापन बढ़ता है और दर्द से स्थायी राहत मिल सकती है। साधकों ने इन व्यायामों को उत्साहपूर्वक सीखा और अपने दैनिक जीवन में शामिल करने का संकल्प लिया।
द्वितीय सत्र: तप, सेवा और सुमिरन की व्याख्या

दूसरे सत्र में संस्था की आध्यात्मिक प्रमुख डॉ. श्यामा दीदी और राधा दीदी ने साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया। सत्र की शुरुआत में मानस सेवा साधना परिवार, कांकरोली के पदाधिकारियों ने दोनों दीदियों का तिलक लगाकर और उपरना ओढ़ाकर हार्दिक स्वागत किया। कमल किशोर व्यास और अन्य सहयोगियों ने मधुर स्वागत गीत प्रस्तुत कर सत्र को और भी प्रेरणादायी बनाया।
तप, सेवा और सुमिरन का महत्व
Anuvibha Kendra Kankroli spiritual event : डॉ. श्यामा दीदी ने रामचरितमानस में वर्णित तप, सेवा और सुमिरन की गहन व्याख्या की। उन्होंने बताया कि ये तीनों तत्व न केवल हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ये हमारे शरीर, मन और बुद्धि को स्वस्थ रखने में भी मदद करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि तप, सेवा और सुमिरन कोई जटिल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि शास्त्रों में वर्णित जीवन जीने की सहज और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पद्धति है।
डॉ. श्यामा दीदी ने कहा:
हमारी संस्था प्राचीन शास्त्रों में वर्णित जीवन जीने के तरीकों को पहले वैज्ञानिक कसौटी पर परखती है और फिर इन्हें समाज के सामने प्रस्तुत करती है। तप, सेवा और सुमिरन के माध्यम से हम अपने जीवन को संतुलित और सुखमय बना सकते हैं।
सेवा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार

Healthy lifestyle with spiritual practices : सेवा के विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए, डॉ. श्यामा दीदी ने वेदों के रचयिता व्यास जी का उल्लेख किया। जब उनसे पूछा गया कि चार वेदों और छह शास्त्रों का सार क्या है, तो उन्होंने कहा:
सुख देने से सुख मिलता है, और दुख देने से दुख मिलता है।
इस सिद्धांत को और स्पष्ट करने के लिए उन्होंने न्यूटन के तीसरे नियम का उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इसका अर्थ है कि हम जो कुछ भी दूसरों को देते हैं, वही हमें किसी न किसी रूप में वापस मिलता है। यदि हम सुख और सेवा बांटते हैं, तो हमें सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। उन्होंने साधकों को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें परमात्मा से प्राप्त संसाधनों को दूसरों के साथ बांटना चाहिए। जैसे भोजन को भगवान को अर्पित करने के बाद वह प्रसाद बन जाता है, और उसे बांटने से आनंद की अनुभूति होती है। ठीक उसी तरह, जब हम सेवा और दान खुले मन से करते हैं, तो वह हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है।
डॉ. श्यामा दीदी ने यह भी जोर दिया कि दान और सेवा करते समय मन में अहंकार या दया का भाव नहीं होना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि सब कुछ परमात्मा का है, और हम उनकी कृपा से यह कार्य कर रहे हैं। इस भावना के साथ की गई सेवा न केवल हमारे स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, बल्कि हमारे मन को भी शांति प्रदान करती है।

तप और आहार का महत्व
Importance of Tap Seva and Sumiran : डॉ. गोपाल शास्त्री ने तप के विषय पर प्रकाश डालते हुए आहार की शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने साधकों को सलाह दी कि वे हमेशा शुद्ध (Pure), क्षेत्रीय (Regional), और ऋतु अनुसार (Seasonal) खाद्य पदार्थों का सेवन करें। उन्होंने कहा:
शुद्ध और संतुलित आहार न केवल हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि मन और बुद्धि को भी पवित्र करता है। हमें अल्पाहारी बनने का प्रयास करना चाहिए, ताकि हमारा शरीर अनावश्यक बोझ से मुक्त रहे।
उन्होंने साधकों को कम मात्रा में भोजन करने और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया।
अपक्व अल्पाहार: स्वास्थ्यवर्धक भोजन
दोपहर के सत्र में साधकों को अपक्व अल्पाहार के रूप में नाशपाती, पालक की पत्तियां, और अंकुरित चने परोसे गए। यह भोजन न केवल पौष्टिक था, बल्कि यह तप और संयम के सिद्धांतों के अनुरूप भी था। साधकों ने इस भोजन को ग्रहण करते हुए स्वस्थ आहार की महत्ता को समझा।
तुलादान: सेवा और स्वास्थ्य का अनूठा संगम

शिविर के एक विशेष सत्र में साधकों ने तुलादान का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपने वजन के बराबर अन्न दान किया। तुलादान का यह कार्य न केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। इस आयोजन में एकत्रित अन्न को श्री द्वारकेश अक्षम सेवा संस्थान, राजसमंद के मूक-बधिर विद्यालय को समर्पित किया गया। इस सेवा कार्य ने साधकों के मन में संतुष्टि और आनंद की भावना जागृत की।



