
crude oil price today : अमेरिका और ईरान के बीच लगातार तेज होती बयानबाजी ने ग्लोबल ऑयल मार्केट में फिर उथल-पुथल मचा दी है। तनाव बढ़ने के बीच कच्चे तेल की कीमतें फिर 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार कारोबार करता दिखा, जबकि कुछ रिपोर्टों में यह 111 डॉलर के आसपास भी पहुंचा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द नहीं थमा, तो तेल कीमतों में और तेज उछाल आ सकता है।
इस पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ा तनाव है। यह समुद्री रास्ता दुनिया की कुल तेल और गैस सप्लाई का करीब 20% संभालता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि ईरान की ओर से इस मार्ग पर पाबंदियों और क्षेत्रीय तनाव ने सप्लाई को झटका दिया है, जिससे तेल महंगा हुआ है। तेल कीमतों में हालिया उछाल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ हफ्तों के भीतर ही कई प्रमुख बेंचमार्क में बड़ी तेजी दर्ज की गई। पहले जहां भारतीय बास्केट, ओपेक बास्केट, ब्रेंट और WTI अपेक्षाकृत नीचे थे, वहीं अब सभी में तेज उछाल दिखाई दे रहा है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मार्च के दौरान ब्रेंट में लगभग 60% तक की तेजी देखी गई, जबकि सप्लाई रुकने की आशंका ने बाकी बेंचमार्क्स को भी ऊपर धकेल दिया।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता
Iran oil supply threat : भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। हालिया विश्लेषणों के मुताबिक देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 85% से 90% तेल बाहर से खरीदता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर उछाल का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत का सालाना आयात बिल करीब ₹16,000 करोड़ तक बढ़ सकता है।
तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका दबाव CNG-PNG, ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट, खाद, प्लास्टिक, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की कई चीजों पर दिखने लगता है। यानी कच्चा तेल महंगा होने पर उसका असर धीरे-धीरे आम आदमी की रसोई और जेब तक पहुंचता है। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे आयात और महंगा हो जाता है।

महंगाई पर भी पड़ सकता है सीधा असर
Strait of Hormuz crisis : विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल के दाम ऊंचे स्तर पर टिके रहे, तो भारत में खुदरा महंगाई भी ऊपर जा सकती है। कई बाजार विश्लेषणों में कहा गया है कि तेल की हर बड़ी बढ़ोतरी मुद्रास्फीति, चालू खाते के घाटे, GDP ग्रोथ और रुपये की मजबूती पर दबाव बढ़ाती है। यही वजह है कि कच्चे तेल की हर छलांग को भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चेतावनी की तरह देखा जा रहा है।
ट्रम्प का अल्टीमेटम, तनाव और गहराया
India crude oil import bill : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कहा है कि ईरान के साथ समझौते की समयसीमा अब अंतिम है और मंगलवार की डेडलाइन बढ़ाए जाने की संभावना बहुत कम है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि डील न होने की स्थिति में ईरानी इंफ्रास्ट्रक्चर पर व्यापक हमले हो सकते हैं। इससे पहले भी ट्रम्प की ओर से होर्मुज खुलवाने को लेकर लगातार कड़े बयान दिए गए थे।
ईरान का पलटवार, ग्लोबल ट्रेड रूट्स पर खतरे की चेतावनी
petrol diesel price hike : ट्रम्प के कड़े रुख के बाद ईरान की तरफ से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार, तेहरान ने संकेत दिए हैं कि यदि हमले और बढ़े, तो उसका जवाब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्ग भी प्रभावित हो सकते हैं। होर्मुज जैसे अहम रास्ते पहले से तनाव में हैं, और इससे दुनिया भर की सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है।
150 डॉलर तक जा सकता है तेल?
कई वैश्विक बाजार विशेषज्ञ और निवेश बैंक यह आशंका जता चुके हैं कि अगर होर्मुज के जरिए सप्लाई बाधित रही, तो कच्चे तेल का भाव 120-130 डॉलर से भी ऊपर जा सकता है और चरम स्थिति में 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का जोखिम बना रहेगा। कुछ ब्रोकरेज हाउस का मानना है कि तनाव कम भी हो जाए, तब भी कीमतें तुरंत पुराने स्तर पर लौटना मुश्किल हो सकती हैं।
OPEC+ ने बढ़ाया उत्पादन, लेकिन राहत सीमित
तेल बाजार को स्थिर रखने की कोशिश में सऊदी अरब और रूस सहित OPEC+ देशों ने मई 2026 के लिए उत्पादन कोटा बढ़ाने का फैसला लिया है। रिपोर्टों के मुताबिक यह बढ़ोतरी करीब 2.06 लाख बैरल प्रतिदिन की है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज संकट और युद्धजनित सप्लाई व्यवधान के बीच यह बढ़ोतरी फिलहाल कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम असरदार साबित हो सकती है।
भारत के लिए आगे क्या संकेत
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऊंचे तेल दाम लंबे समय तक टिके तो इसका असर सिर्फ आयात बिल पर नहीं, बल्कि महंगाई, रुपये, सब्सिडी बोझ, करंट अकाउंट डेफिसिट और आर्थिक विकास पर भी दिखेगा। यही वजह है कि सरकार और तेल कंपनियां सप्लाई बनाए रखने के लिए अलर्ट मोड में हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने स्थानीय मांग पूरी करने के लिए कुछ नियोजित मेंटेनेंस शटडाउन भी टाल दिए हैं।



