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Gangaur Festival : गणगौर का ये पावन पर्व जानिए क्यों मनाया जाता है और क्या है इसकी पौराणिक कथा

Parmeshwar Singh Chundwat March 30, 2025 1 minute read

Gangaur Festival : गणगौर का पावन पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से नव विवाहित महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। होली के दूसरे दिन से इस पूजा की शुरुआत होती है और चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन इसका समापन होता है। महिलाएं गणगौर माता की पूजा करती हैं और उनकी मूर्तियों को पानी पिलाने की परंपरा निभाती हैं। इसके अगले दिन शाम को इन मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंवारी कन्याओं को योग्य पति की प्राप्ति होती है, वहीं सुहागिन स्त्रियों का सौभाग्य अखंड रहता है।

गणगौर क्यों मनाया जाता है? (Why Gangaur Is Celebrated)

गणगौर का पर्व चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को बड़े श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से माता पार्वती और भगवान शिव के पवित्र मिलन की स्मृति में मनाया जाता है। माता पार्वती को गणगौर में “गौर” के रूप में पूजा जाता है, जबकि भगवान शिव को “ईशर” कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्व रखता है, क्योंकि इस अवसर पर वे अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की खुशहाली की कामना करती हैं। इस पर्व की पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कई वर्षों तक उपवास रखा, कठिन साधनाएं कीं और अत्यंत समर्पण के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या को देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और माता पार्वती के समक्ष प्रकट होकर कहा, “हे पार्वती! तुम अपनी भक्ति और समर्पण से मुझे प्रसन्न कर चुकी हो। तुम जो भी वरदान मांगना चाहो, मैं उसे पूर्ण करूंगा।”

माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे महादेव! मेरी केवल एक ही इच्छा है कि मैं सदा के लिए आपकी अर्धांगिनी बनूं और आपका साथ प्राप्त करूं।” भगवान शिव ने उनकी मनोकामना को पूर्ण किया और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी पावन मिलन की स्मृति में गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। गणगौर व्रत विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं और विवाहित महिलाएं रखती हैं। कुंवारी कन्याएं इस व्रत को इसलिए करती हैं ताकि उन्हें अपने मनचाहे और योग्य वर की प्राप्ति हो। वहीं, विवाहित महिलाएं अपने पति के दीर्घायु और सुखमय जीवन के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। इस दौरान महिलाएं गणगौर माता की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाती हैं और भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र प्रेम का प्रतीक मानते हुए उनकी पूजा करती हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज में वैवाहिक जीवन की महत्ता और स्त्री के समर्पण को भी दर्शाता है। गणगौर उत्सव में भक्ति, सौंदर्य और सांस्कृतिक परंपराओं का संगम देखने को मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाता है।

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गणगौर कैसे मनाया जाता है? (How Gangaur Celebrated)

गणगौर का पर्व 16 दिनों तक बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दौरान महिलाएं और कन्याएं प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। वे बगीचे या खेतों में जाकर ताजा दूब और रंग-बिरंगे फूल चुनती हैं। इन फूलों और दूब को जल में भिगोकर गणगौर माता पर दूध के छींटे देते हुए पूजा करती हैं। इस पूजा में दही, सुपारी, चांदी का छल्ला और कुमकुम सहित विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।

आठवें दिन का विशेष महत्व: गणगौर पूजा के आठवें दिन को बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव (ईशर) माता पार्वती (गणगौर) को लेने के लिए उनके मायके आते हैं। इस परंपरा को प्रतीकात्मक रूप में निभाया जाता है। सभी अविवाहित लड़कियां और सुहागिन महिलाएं कुम्हार के घर जाती हैं और वहां से मिट्टी लाकर गणगौर और ईशर की मूर्तियां बनाती हैं। इन मूर्तियों के साथ मालिन, दासी और अन्य पौराणिक पात्रों की भी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पूजा का स्थान गणगौर माता का मायका माना जाता है, जबकि जहां मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है, उसे उनका ससुराल कहा जाता है।

शादी के बाद गणगौर का महत्व: नवविवाहित कन्या अपनी शादी के बाद पहली बार गणगौर का पर्व अपने मायके में ही मनाती है, जिसे विशेष शुभ माना जाता है। इसके बाद वह प्रतिवर्ष ससुराल में इस पर्व को उत्साहपूर्वक मनाती है। गणगौर का पूजन करते समय महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

गणगौर का उद्यापन: गणगौर व्रत का उद्यापन भी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जब महिलाएं वर्षों तक यह व्रत करती हैं और फिर इस व्रत को विधिपूर्वक समाप्त करने का निर्णय लेती हैं, तब वे गणगौर का उद्यापन करती हैं। उद्यापन के दौरान महिलाएं अपनी सास को बायना देती हैं, जिसमें कपड़े, श्रृंगार की सामग्री और सुहाग की वस्तुएं शामिल होती हैं। इसके अतिरिक्त, वे 16 सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराती हैं और उन्हें संपूर्ण श्रृंगार की सामग्री और दक्षिणा भेंट करती हैं। गणगौर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के आत्मीय प्रेम, समर्पण और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। इस पर्व के माध्यम से पारिवारिक रिश्ते और सांस्कृतिक परंपराएं और भी मजबूत होती हैं।

गणगौर कहाँ-कहाँ मनाई जाती है? (Where is Gangaur Celebrated?)

भारत में जहां भी मारवाड़ी समाज के लोग निवास करते हैं, वहां गणगौर का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के निमाड़, मालवा, बुंदेलखंड और ब्रज क्षेत्रों में यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। राजस्थान में गणगौर उत्सव की एक अलग ही भव्यता होती है। हर घर में गणगौर माता की पूजा होती है और विभिन्न स्थानों पर रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-धजी महिलाओं की टोलियां गीत गाते हुए शोभायात्रा निकालती हैं।

गणगौर मेला/उत्सव क्या है? (What is Gangaur Fair/Festival?)

गणगौर मेला राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। इस भव्य उत्सव के दौरान, महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्र और आभूषण धारण करती हैं। वे अपने सिर पर सुंदर सजी हुई लोटियां रखकर गणगौर माता के गीत गाती हुई शोभायात्रा में शामिल होती हैं। हजारों महिलाओं के मधुर स्वरों से पूरे शहर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

राजस्थान में गणगौर माता की सवारी विशेष महत्व रखती है। जगह-जगह पारंपरिक झांकियां, लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इस मेले की भव्यता को और बढ़ाती हैं। जोधपुर में आयोजित गणगौर उत्सव अपनी भव्यता और उत्साह के लिए प्रसिद्ध है, जहां पूरा बाजार उत्सव के रंग में रंग जाता है। महिलाओं का उल्लास और श्रद्धा यहां देखने लायक होती है। उदयपुर की गणगौर सवारी, जिसे धींगा गणगौर कहा जाता है, राजसी वैभव और परंपराओं का उत्कृष्ट उदाहरण है। पिछोला झील के किनारे से गुजरती यह सवारी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र होती है। इसी प्रकार बीकानेर की चांदमल गणगौर भी अत्यधिक प्रसिद्ध है, जहां पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं और कलाकार इस सांस्कृतिक आयोजन को भव्यता प्रदान करते हैं। गणगौर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। इस मेले के माध्यम से लोक परंपराएं, कला और समाज का समन्वय देखने को मिलता है, जो पीढ़ियों से इस समृद्ध परंपरा को जीवित रखे हुए है।

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Parmeshwar Singh Chundwat

Editor

Parmeshwar Singh Chundwat ने डिजिटल मीडिया में कॅरियर की शुरुआत Jaivardhan News के कुशल कंटेंट राइटर के रूप में की है। फोटोग्राफी और वीडियो एडिटिंग में उनकी गहरी रुचि और विशेषज्ञता है। चाहे वह घटना, दुर्घटना, राजनीतिक, सामाजिक या अपराध से जुड़ी खबरें हों, वे SEO आधारित प्रभावी न्यूज लिखने में माहिर हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, थ्रेड्स और यूट्यूब के लिए छोटे व बड़े वीडियो कंटेंट तैयार करने में निपुण हैं।

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