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Haldighati Memorial देखने दुनियाभर से आ रहे पर्यटक, हल्दीघाटी स्मारक के शर्मनाक हाल | Maharana Pratap

Laxman Singh Rathor May 8, 2025 1 minute read

Haldighati Memorial : देश के गौरव का प्रतीक महाराणा प्रताप की रणस्थली से सरकार ने क्रूर मजाक किया है। तभी तो करोड़ों की लागत से हल्दीघाटी में राष्ट्रीय स्मारक का कोई धणी धोरी नहीं है। देशभक्ति और शौर्य की प्रतीक हल्दीघाटी की ऐतिहासिक धरोहर प्रशासनिक उपेक्षा के चलते चलते खुदबुर्द हो रही है। यहां पर गाइड तक की कोई सुविधा ही नहीं है। इसके अलावा हल्दीघाटी दर्रा, खोड़ी इमली, शाहीबाग, रक्ततलाई, चेतक समाधि स्थल के बारे में भी बताने वाला कोई नहीं है। मातृभूमि की रक्षा एवं स्वाभिमान के लिए दुनियाभर में मशहूर यह स्थल पर्यटकों को आकर्षित नहीं कर सका। पर्यटन विभाग ने न तो अपनी वेबसाइट, ब्रोशर और प्रचार सामग्री में राष्ट्रीय स्मारक को तवज्जो दी और न ही यहां कोई टूरिस्ट गाइड तैनात किया।

Maharana Pratap : हल्दीघाटी राष्ट्रीय स्मारक का शिलान्यास 21 जून, 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत, तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री एस.आर. बोम्मई के आतिथ्य में हुआ। केन्द्र व राज्य में सरकारें बदलने से मेवाड़ कॉम्प्लेक्स योजना का काम अटकता रहा। केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के साझे में सितम्बर 2008 में निर्माण पूरा हो सका। दो एप्रोच रोड, ओपन थियेटर, गार्डन, पार्किंग, बाथरूम-टॉयलेट, परिधि की दीवार, फाउंडेशन, फव्वारा, स्टेच्यू आदि बनाए गए। निर्माण पर उस वक्त 2 करोड़ 4 लाख रुपए तथा प्रतिमा निर्माण पर 11 लाख रुपए व्यय हुए। 21 जून, 2009 को केन्द्रीय मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी के मुख्य आतिथ्य में इसका उद्घाटन हुआ। संचालन का जिम्मा जून 2011 को प्रशासन ने आनन फानन में प्रताप स्मृति संस्थान को सौंप दिया। निष्क्रीय समिति को कार्य साैंपने से अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं हो पाए। तब से यह ऐतिहासिक स्थल अब सिर्फ चौकीदार के भरोसे ही चल रहा है। भौतिक रूप से रक्ततलाई, शाहीबाग, हल्दीघाटी दर्रा, चेतक समाधी व स्मारक पर पर्यटक जाते भी है, तो वहां कोई सुविधा नहीं और न ही पर्यटकों को आकर्षित करने के कोई प्रबंध है।

टूटी दीवार, उद्यान पर ताले

haldighati battle : अब जगह जगह से स्मारक की दीवार क्षतिग्रस्त हो रही है, तो स्मारक पर बने उद्यान पर भी ताले जड़े हुए हैं। स्मारक स्थल रख रखाव के अभाव में न तो फव्वारा सेट रहा और न ही लाइटिंग ही सुरक्षित है। लाइटें खुर्दबुर्द हो रही है, तो फव्वारा भी खराब पड़ा है। असामाजिक तत्व लाइटें भी तोड़कर ले गए, जिससे शाम ढलते ही यहां कोई नहीं जा सकता है। सड़क क्षतिग्रस्त हो गई है, तो सुरक्षा दीवार भी जगह जगह से क्षतिग्रस्त हो गई है।

स्मारक का नजारा खूब सुहाता

haldighati museum : यह ऐतिहासिक स्थल खमनोर क्षेत्र की सर्वोच्च चोटि पर स्थल है, जिससे चौतरफा अरावली की वादियों का नजारा भी लोगाें को खूब सुहाता है। यह स्मारक देखने के बाद पर्यटक सीधे नीचे उतरते हैं, तो रोड क्रॉस करते ही सामने चेतक समाधि स्थल बना हुआ है। यह स्थल भी पुरातत्व विभाग व पर्यटन महकमे के अधीन है। यहां पर प्राचीन शिव मंदिर है, जहां आज भी स्थानीय परिवारों द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। एक खूबसुरत उद्यान भी विकसित कर रखा है। घूमने व भ्रमण के लिए पाथवे भी बना रखा है। यह मंदिर अति प्राचीन है। चेतक समाधि स्थल पर उद्यान होने से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बना हुआ है। यहां पर्यटकों की सुविधा को लेकर शौचालय भी बना रखे है, मगर कभी ताले नहीं खुलते, जो बड़ी दु:खद बात है। पर्यटन विभाग द्वारा गाइड तक नहीं लगा रखे है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा चेतक समाधि स्थल पर इतिहास की शिला पटि्टका भी लगा रखी है, जो इतिहास से रूबरू कराती है। इस स्थल की वीडियोग्राफी के लिए शुल्क भी तय कर रखा है, मगर यहां न तो कोई शुल्क लेने वाला और न ही ऐतहासिक धरोहर पर असामाजिक तत्वों की हरकतों को रोकने व टोकने वाला कोई है।

हल्दीघाटी की मिट्‌टी को करते हैं नमन

यहां से सीधे खमनोर की तरफ आगे बढ़ते हैं तो हल्दीघाटी दर्रा आता है, जहां पर 18 जून 1576 महाराणा प्रताप व अकबर के बीच युद्ध हुआ था। इस दर्रे में हल्दीघाटी की मिट्‌टी पीले रंग की है। बलीचा से खमनोर मार्ग पर ही यह दर्रा है और इस पीली मिट्‌टी को खोदकर लोग अपने साथ ले जाते हैं। दर्रा फिलहाल घने जंगल से अट चुका है, जहां जंगली जानवरों व कंटीली झाड़ियों के चलते मूल दर्रे में जाना जोखिमभरा है।

हल्दीघाटी का इतिहास भी अनूठा

haldighati ka yuddh kab hua : हल्दीघाटी युद्ध का 18 जून 1576 में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध राणा प्रताप और अकबर के मध्य हल्दीघाटी नामक तंग दर्रे (राजसमंद) में लड़ा गया। हल्दीघाटी का युद्ध इतना घमासान था कि अबुल फजल ने इसे खमनौर का युद्ध, बदायूंनी ने गोगुन्दा का युद्ध और कर्नल टॉड ने इसे मेवाड़ की थर्मोपोली कहा है। हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की तरफ से सेना नायक मानसिंह और राणा प्रताप की तरफ से हाकीम खां सूर थे। इस युद्ध को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय सामने आती है। यह युद्ध महाराणा प्रताप ने जीता था। हालांकि कुछ इतिहासकार अनिर्णायक युद्ध बताते हैं तो कुछ अकबर को विजेता भी कहते हैं। इस युद्ध में अकबर के पास 80 हज़ार से ज्यादा सैनिक थे, जबकि राणा प्रताप के पास 20 हज़ार सैनिक थे।

युद्ध की भयावहता का वर्णन करते हुए अबुल फजल ने काव्यमय शैली में लिखा है-

“खून के दो समुद्रों ने एक दूसरे को टक्कर दी,
उनसे उठी उबलती लहरों ने पृथ्वी को रंग-बिरंगा कर दिया।
जान लेने और जान देने का बाजार खुल गया।”

उदयपुर के मीरा कन्या महाविद्यालय के प्रोफेसर और इतिहासकार डॉ. चन्द्र शेखर शर्मा ने अपनी रिसर्च में कहा है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने जीत हासिल की थी। डॉ. शर्मा ने अपने शोध में प्रताप की विजय को दर्शाते हुए ताम्र पत्रों से जुड़े प्रमाण पेश किए। उनके अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों के भूमि के पट्टों को ताम्र पत्र जारी किए। उस समय यह अधिकार केवल राजा के पास ही होता था। डॉ. शर्मा के मुताबिक यह दर्शाता है कि युद्ध के बाद हल्दीघाटी का क्षेत्र प्रताप के अधीन था। डॉ. शर्मा ने विजय को दर्शाने वाले प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए।

हल्दीघाटी क्यों प्रसिद्ध है?

Battle of Haldighati : राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में स्थित और अपनी पीली मिट्टी (हल्दी की याद दिलाने वाली) के कारण प्रसिद्ध हल्दीघाटी इतिहास का एक अमिट हिस्सा है – 1576 में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और सम्राट अकबर की सेनाओं के बीच प्रसिद्ध युद्ध के स्थल के रूप में अमर है। यह युद्ध अनिर्णित रहा। महाराणा प्रताप के घोड़े का पांव कट गया था। प्रताप को पकड़ने में असफल रहे, जो अनिच्छा से अपने साथी कमांडरों के कहने पर पीछे हट गए। युद्ध में मौजूद अब्दुल कादिर बदायुनी कहते हैं कि दोनों पक्षों से 500 लोग मारे गए, जिनमें से 120 मुसलमान थे।

नाथद्वारा के पास हल्दी घाटी में स्थित, जहां महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच भीषण युद्ध लड़ा गया था, यह स्मारक उदयपुर आने पर देखने लायक है। उच्च तकनीक क्रांति, 3डी फिल्म शो और हल्दीघाटी के युद्ध को दर्शाती मूर्तियां (गुफाओं में) इसे और अधिक आकर्षक बनाती हैं।

आखिर हल्दीघाटी उपेक्षित क्यों?

भारत के गौरवशाली इतिहास में हल्दीघाटी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। महाराणा प्रताप की वीरता, स्वाभिमान और मातृभूमि के लिए उनका बलिदान आज भी जनमानस में प्रेरणा का स्रोत है। बावजूद इसके, यह ऐतिहासिक युद्धभूमि आज भी उपेक्षा का शिकार है। सवाल यह उठता है कि देश की आत्मा कहे जाने वाले ऐसे गौरवशाली स्थलों को सरकारें आखिर कब तक नजरअंदाज करती रहेंगी?

हल्दीघाटी केवल एक युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, आत्मबलिदान और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक है। लेकिन दुर्भाग्यवश, यहां न तो समुचित पर्यटन सुविधाएं हैं, न प्रचार-प्रसार की व्यवस्था और न ही पर्याप्त विकास कार्य। सरकारें ताजमहल और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने वाले स्थलों पर तो करोड़ों रुपये खर्च कर देती हैं, लेकिन महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रनायक की धरती पर मौन छा जाता है।

राजनीतिक लाभ के लिए नेताओं को अक्सर हल्दीघाटी याद आ जाती है, लेकिन चुनाव बीतते ही यह धरोहर फिर से उपेक्षा की धूल में दब जाती है। स्थानीय लोग और इतिहासप्रेमी वर्षों से इस स्थल के विकास की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। पर्यटन मंत्रालय और राज्य सरकारों को चाहिए कि हल्दीघाटी को एक प्रमुख राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करें, जहां आने वाली पीढ़ियाँ उस आत्मगौरव को महसूस कर सकें, जिसे महाराणा प्रताप ने अपने लहू से सींचा था।

इतिहास केवल किताबों में सीमित नहीं होना चाहिए, उसे जीवंत रूप में देखने और महसूस करने की आवश्यकता है। यदि हल्दीघाटी जैसे स्थलों की उपेक्षा यूं ही चलती रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने सच्चे नायकों को भूल जाएंगी और केवल “मनोरंजन पर्यटन” के नाम पर ही भारत को जानेंगी।

आमजन को भी जागना होगा। सोशल मीडिया से लेकर जनआंदोलनों तक आवाज उठानी होगी कि “राजाओं की धरती” को उसका उचित सम्मान मिले। सरकारों को जवाबदेह बनाना होगा और यह सवाल बार-बार पूछना होगा — “आखिर हल्दीघाटी उपेक्षित क्यों?”

Rajasthan History : राजस्थान के जिले, पर्यटन, संस्कृति व इतिहास के अनछुए पहलू | Introduction to Rajasthan
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Laxman Singh Rathor

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Laxman Singh Rathor को पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक का लंबा अनुभव है। 2005 में Dainik Bhakar से कॅरियर की शुरुआत कर बतौर Sub Editor कार्य किया। वर्ष 2012 से 2019 तक Rajasthan Patrika में Sub Editor, Crime Reporter और Patrika TV में Reporter के रूप में कार्य किया। डिजिटल मीडिया www.patrika.com पर भी 2 वर्ष कार्य किया। वर्ष 2020 से 2 वर्ष Zee News में राजसमंद जिला संवाददाता रहा। आज ETV Bharat और Jaivardhan News वेब पोर्टल में अपने अनुभव और ज्ञान से आमजन के दिल में बसे हैं। लक्ष्मण सिंह राठौड़ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि खबरों की दुनिया में एक ब्रांड हैं। उनकी गहरी समझ, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग, पाठक व दर्शकों से जुड़ने की क्षमता ने उन्हें पत्रकारिता का चमकदार सितारा बना दिया है। jaivardhanpatrika@gmail.com

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