
History of Shrinathji Temple Nathdwara : राजस्थान का राजसमंद जिला केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के सबसे बड़े केंद्रों में से एक नाथद्वारा धाम के लिए भी जाना जाता है। अरावली पर्वतमाला की गोद और बनास नदी के किनारे बसा नाथद्वारा शहर भगवान श्रीनाथजी की नगरी के रूप में विख्यात है।
यहां स्थित विश्वप्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर वैष्णव संप्रदाय, विशेषकर पुष्टिमार्गीय परंपरा का प्रमुख पीठ माना जाता है। भगवान श्रीनाथजी को भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप माना जाता है। मंदिर में वे उसी दिव्य मुद्रा में विराजमान हैं, जिस रूप में उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा की थी। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर वर्ष नाथद्वारा पहुंचते हैं। यहां की गलियां, भक्ति संगीत, मंदिर की परंपराएं और दिव्यता श्रद्धालुओं को वृंदावन और मथुरा जैसा आध्यात्मिक अनुभव कराती हैं।
कौन हैं भगवान श्रीनाथजी?

भगवान श्रीनाथजी को भगवान श्रीकृष्ण का सात वर्षीय बाल स्वरूप माना जाता है। वैष्णव संप्रदाय में उन्हें विशेष रूप से पुष्टिमार्ग या वल्लभ संप्रदाय का केंद्रीय देवता माना जाता है। पुष्टिमार्ग की स्थापना महान संत वल्लभाचार्य ने की थी। बाद में उनके पुत्र विट्ठलनाथजी ने नाथद्वारा में श्रीनाथजी की पूजा व्यवस्था और सेवा परंपराओं को व्यवस्थित रूप दिया। इसी कारण नाथद्वारा को कई लोग “श्रीनाथजी” और “बावा नगरी” के नाम से भी जानते हैं।

पहले “देवदमन” फिर बने श्रीनाथजी
प्रारंभिक समय में भगवान को “देवदमन” कहा जाता था। इसका अर्थ है “देवताओं पर विजय प्राप्त करने वाला।” यह नाम भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र के अभिमान को तोड़ने और गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना से जुड़ा माना जाता है। बाद में वल्लभाचार्य ने उन्हें “गोपाल” नाम दिया और उनके पूजा स्थल को “गोपालपुर” कहा। इसके बाद विट्ठलनाथजी ने भगवान का नाम “श्रीनाथजी” रखा।
गोवर्धन पर्वत से प्रकट हुई थी प्रतिमा
किंवदंतियों के अनुसार श्रीनाथजी की प्रतिमा स्वयंभू रूप में गोवर्धन पर्वत से प्रकट हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार सबसे पहले इस प्रतिमा की पूजा मथुरा के निकट गोवर्धन पर्वत पर की जाती थी। प्रतिमा काले संगमरमर के एक अखंड पत्थर पर उकेरी गई है। इसमें भगवान का बायां हाथ ऊपर उठा हुआ है, जबकि दाहिना हाथ कमर पर टिका हुआ है। यह वही मुद्रा मानी जाती है जिसमें भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था। प्रतिमा के साथ दो गाय, शेर, मोर, तोता, सर्प और ऋषियों की आकृतियां भी बनी हुई हैं।
औरंगजेब से बचाने के लिए निकाली गई प्रतिमा

Shrinathji and Aurangzeb story : मुगल शासक औरंगजेब मूर्ति पूजा का विरोधी माना जाता था। उसके शासनकाल में कई मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया। जब मथुरा स्थित श्रीनाथजी मंदिर को भी खतरा बढ़ा, तब वल्लभ संप्रदाय के पुजारी दामोदर दास बैरागी ने प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया। कहा जाता है कि प्रतिमा को सबसे पहले मथुरा से आगरा लाया गया और लगभग छह महीने तक वहां सुरक्षित रखा गया। बाद में बैलगाड़ी में रखकर इसे दक्षिण भारत की ओर ले जाने का प्रयास किया गया। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उस समय अधिकांश राजा औरंगजेब के भय से प्रतिमा को अपने राज्य में स्थापित करने के लिए तैयार नहीं हुए। अंत में मेवाड़ के महाराणा राज सिंह ने यह चुनौती स्वीकार की। उन्होंने घोषणा की कि जब तक मेवाड़ के राजपूत जीवित हैं, कोई भी श्रीनाथजी की प्रतिमा को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। यह वही महाराणा राज सिंह थे जिन्होंने पहले भी औरंगजेब को खुली चुनौती दी थी।
जहां रुक गई बैलगाड़ी, वहीं बन गया नाथद्वारा
किंवदंती के अनुसार जब प्रतिमा लेकर जा रही बैलगाड़ी मेवाड़ के सिहाड़ गांव पहुंची तो उसके पहिए कीचड़ में धंस गए। काफी प्रयासों के बावजूद गाड़ी आगे नहीं बढ़ी। पुजारियों और भक्तों ने इसे भगवान की इच्छा माना और वहीं मंदिर निर्माण का निर्णय लिया गया। दिसंबर 1671 में महाराणा राज सिंह स्वयं सिहाड़ पहुंचे और फरवरी 1672 में मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा विधिवत स्थापित की गई। आज यही सिहाड़ गांव नाथद्वारा के नाम से प्रसिद्ध है।
नाथद्वारा मंदिर को क्यों कहा जाता है “हवेली”?

नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर को आम मंदिरों की तरह नहीं बल्कि “हवेली” कहा जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि यहां भगवान को किसी राजा की तरह नहीं, बल्कि नंद बाबा के घर में रहने वाले बालक कृष्ण के रूप में सेवा दी जाती है। इस हवेली में दूधघर, पानघर, फूलघर, रसोईघर, गहना घर, खर्चा भंडार, बैठक, अस्तबल और चक्की जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। मंदिर का पूरा वातावरण ऐसा बनाया गया है मानो भगवान वास्तव में एक जीवंत बालक के रूप में यहां निवास कर रहे हों।

दिन में 8 बार होते हैं दर्शन
नाथद्वारा मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा है भगवान के दिन में आठ बार होने वाले दर्शन। पुष्टिमार्ग की मान्यता के अनुसार भगवान को बालक की तरह रखा जाता है। उन्हें जगाया जाता है, स्नान कराया जाता है, भोजन कराया जाता है और विश्राम भी करवाया जाता है।
8 दर्शनों के नाम और महत्व
1. मंगला दर्शन
भोर में भगवान के जागने के बाद पहला दर्शन होता है। इसे सबसे शुभ माना जाता है।
2. श्रृंगार दर्शन
इस समय भगवान को स्नान कराकर विशेष वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं।
3. ग्वाल दर्शन
भगवान को गाय चराने जाने वाले बालक के रूप में दर्शाया जाता है।
4. राजभोग दर्शन
दोपहर में भगवान को विशेष भोग लगाया जाता है। यह सबसे भव्य दर्शनों में से एक माना जाता है।
5. उत्थापन दर्शन
दोपहर विश्राम के बाद भगवान के जागने का दर्शन।
6. भोग दर्शन
सांध्यकाल से पहले हल्का भोग लगाया जाता है।
7. संध्या आरती
शाम को भगवान के लौटने पर आरती होती है।
8. शयन दर्शन
रात्रि विश्राम से पहले अंतिम दर्शन।
जन्माष्टमी पर 21 तोपों की सलामी

नाथद्वारा में कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव बेहद भव्य तरीके से मनाया जाता है। रात 12 बजे जैसे ही मंदिर के पट खुलते हैं, पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठता है। उसी समय भगवान को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। ढोल, नगाड़े, शहनाई और बिगुल की ध्वनि से पूरा नाथद्वारा भक्तिमय माहौल में डूब जाता है।
भगवान को पहनाए जाते हैं विशेष वस्त्र
भगवान श्रीनाथजी को प्रतिदिन अलग-अलग प्रकार के शनील, रेशम और जरी-कढ़ाई वाले वस्त्र पहनाए जाते हैं। त्योहारों पर भगवान को हीरे-जवाहरात और सोने के धागों से बने विशेष परिधान पहनाए जाते हैं। एक बार उपयोग किए गए वस्त्र दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जाते, बल्कि उन्हें भक्तों को प्रसाद रूप में दिया जाता है।
रोज लगता है 56 प्रकार का भोग
मंदिर में प्रतिदिन भगवान को 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। कहा जाता है कि यहां प्रतिदिन बड़ी मात्रा में चावल और प्रसाद तैयार होता है। भोग में इस्तेमाल होने वाली कस्तूरी को सोने की चक्की से पीसा जाता है।
पिछवाई कला का विश्वप्रसिद्ध केंद्र
नाथद्वारा केवल धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि कला और संस्कृति का भी बड़ा केंद्र है। यहां की प्रसिद्ध “पिछवाई पेंटिंग” पूरी दुनिया में जानी जाती है। कपड़े, दीवारों और कागज पर बनाई जाने वाली इन चित्रकलाओं में भगवान श्रीनाथजी की विभिन्न लीलाओं का चित्रण किया जाता है।
औरंगजेब की आंखों की रोशनी लौटने की कथा
Shreenathji diamond story : लोकश्रुति के अनुसार एक बार औरंगजेब मंदिर को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से नाथद्वारा पहुंचा था। बताया जाता है कि मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय उसकी आंखों की रोशनी कमजोर पड़ गई। भयभीत होकर उसने भगवान से क्षमा मांगी, जिसके बाद उसकी दृष्टि वापस लौट आई। बताया जाता है उसके बाद औरंगजेब ने अपनी दाढ़ी से मंदिर की सीढ़िया साफ की थी। इसके बाद वह बिना मंदिर को नुकसान पहुंचाए लौट गया। बाद में उसकी मां ने भगवान की ठोढ़ी के लिए हीरा भेंट किया, जो आज भी भगवान के श्रृंगार का हिस्सा माना जाता है। Shrinathji Temple photos
कोटा में श्रीनाथजी की चरण पादुकाएं
How Shrinathji came to Nathdwara : जब मुगल शासक औरंगजेब के भय से भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा को सुरक्षित स्थान की तलाश में बैलगाड़ी के माध्यम से ले जाया जा रहा था, तब यह यात्रा कई महत्वपूर्ण स्थानों से होकर गुजरी। उस दौरान श्रीनाथजी की प्रतिमा कुछ समय के लिए जोधपुर के पास स्थित चौपासनी गांव में भी रही। बताया जाता है कि कई महीनों तक बैलगाड़ी में ही भगवान की पूजा-अर्चना होती रही। आज चौपासनी गांव जोधपुर शहर का हिस्सा बन चुका है और जिस स्थान पर वह बैलगाड़ी रुकी थी, वहां श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीनाथजी का मंदिर बनवा दिया है। इसी यात्रा से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण आस्था कोटा से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित “चरण चौकी” से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि यहां आज भी भगवान Shrinathji Temple photos श्रीनाथजी की पावन चरण पादुकाएं विराजमान हैं। श्रद्धालु इस स्थान को अत्यंत पवित्र मानते हैं और बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।बाद में चौपासनी से भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा को मेवाड़ क्षेत्र के सिहाड़ गांव लाया गया। दिसंबर 1671 में मेवाड़ के वीर शासक महाराणा राज सिंह स्वयं सिहाड़ गांव पहुंचे और भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा का भव्य स्वागत किया। उस समय सिहाड़ गांव उदयपुर से लगभग 30 मील और जोधपुर से करीब 140 मील की दूरी पर स्थित था। आगे चलकर यही स्थान नाथद्वारा के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। फरवरी 1672 में मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने के बाद भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा को विधिवत मंदिर में स्थापित कर दिया गया।
भक्त भगवान के लिए लाते हैं खिलौने
Shrinathji miracles : चूंकि भगवान को बाल स्वरूप में पूजा जाता है, इसलिए कई श्रद्धालु उनके लिए खिलौने, चांदी की गायें, छोटी लाठियां और बच्चों के उपयोग की वस्तुएं भेंट करते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर देश के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर तिरुपति बालाजी, शिर्डी साईं बाबा और सिद्धिविनायक जैसे प्रसिद्ध मंदिरों की श्रेणी में माना जाता है।
Shrinathji Nathdwara darshan time : श्रीनाथजी दर्शन समय
| दर्शन का नाम | समय |
|---|---|
| मंगला दर्शन | सुबह 5:30 बजे |
| श्रृंगार दर्शन | सुबह 7:15 बजे |
| ग्वाल दर्शन | सुबह 10:30 बजे |
| राजभोग दर्शन | सुबह 11:30 बजे |
| उत्थापन दर्शन | शाम 4:00 बजे |
| भोग दर्शन | शाम 5:45 बजे |
| संध्या आरती | शाम 6:30 बजे |
| शयन दर्शन | रात 8:45 बजे |
नाथद्वारा: जहां भक्ति, इतिहास और संस्कृति का संगम
नाथद्वारा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, कला, संस्कृति, इतिहास और परंपराओं का जीवंत संगम है। यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु खुद को भगवान कृष्ण की भक्ति और दिव्यता में डूबा हुआ महसूस करता है।



