
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए अपनी शताब्दी वर्ष में दृढ़ संकल्प दोहराया है। संघ का मानना है कि यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो समाज में कोई भी पाप नहीं है। यह विचार सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में संघ की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आधुनिक भारत में भेदभावमुक्त समाज की स्थापना समाज सुधारकों का प्रमुख लक्ष्य रहा है। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, वीर सावरकर और डॉ. बालकृष्ण मुंजे जैसे समाज सुधारकों ने इस दिशा में अथक प्रयास किए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से इसे कानूनी आधार प्रदान किया। लेकिन संघ का मानना है कि किसी भी कानून की सफलता केवल दंड के भय पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करती है। छुआछूत और अन्य सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए संघ के सामाजिक प्रयासों ने डॉ. आंबेडकर के स्वप्न को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य हिंदू समाज में एकता स्थापित करना और राष्ट्रवादी भावना को प्रोत्साहित करना था। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने शाखा प्रणाली विकसित की, जिसमें जातिगत भेदभाव को कोई स्थान नहीं था। इसकी झलक उस समय दिखी जब महात्मा गांधी (वर्धा, 1934) और डॉ. आंबेडकर (पुणे, 1939) ने संघ के शिविरों में स्वयंसेवकों को बिना जातिगत भेद के एक साथ कार्य करते और भोजन करते देखा। दोनों ने इस एकता पर आश्चर्य और प्रसन्नता व्यक्त की थी। आज, अपनी शताब्दी मना रहे संघ ने सामाजिक समरसता को अपने पंच परिवर्तन के एक प्रमुख अंग के रूप में स्वीकार किया है।
संघ का लक्ष्य
कई लोग संघ की सदी लंबी यात्रा को केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विस्तार के संदर्भ में देखते हैं, लेकिन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में इसके योगदान को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। सामाजिक समरसता की स्थापना संघ की कार्यप्रणाली का अभिन्न हिस्सा है और इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। आज समाज में छुआछूत और भेदभाव की घटनाएं न्यूनतम रह गई हैं, जिसका श्रेय संविधान के साथ-साथ संघ जैसे संगठनों को भी जाता है। संघ “सामाजिक समरसता” की अवधारणा को बढ़ावा देता है, जिसे दत्तोपंत ठेंगड़ी ने लोकप्रिय किया। यह अवधारणा केवल जातिगत भेदभाव को ही नहीं, बल्कि भाषा, नस्ल, और लिंग जैसे सभी सामाजिक विभेदों को समाप्त करने पर जोर देती है। इसके विपरीत, तथाकथित प्रगतिशील समूह “समतामूलक समाज” की बात करते हैं, जो वर्ग भेद को स्वीकार कर केवल जातिगत भेदभाव को समाप्त करने पर ध्यान देता है। संघ का मानना है कि भेदभाव ऐतिहासिक सामाजिक बुराइयां हैं, जिन्हें हिंदू आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए आत्मिक और सतत प्रयासों से समाप्त किया जा सकता है।

संघ की संस्थागत पहल
संघ ने सामाजिक समरसता के लिए कई संस्थागत पहल की हैं। 1950 के दशक में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना के माध्यम से जनजातीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, और स्वावलंबन को बढ़ावा दिया गया। आज यह संगठन जनजातीय क्षेत्र में सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है। 1964 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम थी। 1969 में उडुपी में आयोजित एक सम्मेलन में सभी शंकराचार्यों ने घोषणा की कि हिंदू धर्म अस्पृश्यता को स्वीकार नहीं करता। इस सम्मेलन की अध्यक्षता एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति, भरनेया ने की थी। इस अवसर पर तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर जी ने खुशी से नाचते हुए इसकी महत्ता को रेखांकित किया। 1974 में पुणे में आयोजित वसंत व्याख्यानमाला में सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने जन्म-आधारित भेदभाव को शास्त्रविरुद्ध बताते हुए कहा, “यदि अस्पृश्यता अपराध नहीं है, तो समाज में कोई अपराध नहीं है।” इस उद्घोष ने हिंदू समाज पर गहरा प्रभाव डाला। 1989 में अयोध्या में श्रीराम मंदिर की नींव रखने वाली पहली ईंट अनुसूचित जाति के कामेश्वर चौपाल ने रखी थी। हाल ही में राम जन्मभूमि ट्रस्ट में कृष्णमोहन को सदस्य बनाया गया, जो इस समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
सेवा भारती से समरस समाज की ओर संघ की पहल
1982 में स्थापित सेवा भारती वंचित समुदायों में शिक्षा, स्वरोजगार, और संस्कारों को बढ़ावा दे रही है। इसके राम-जानकी सामूहिक विवाह जैसे आयोजन सभी समुदायों को एक मंच पर लाते हैं। 1990 में संघ के सेवा विभाग की स्थापना हुई, जिसने पिछले एक वर्ष में 89,000 से अधिक सेवा कार्य पूरे किए। इन प्रयासों और शाखाओं के प्रशिक्षणों ने समाज में समरसता के प्रति दृष्टिकोण को व्यापक रूप से बदला है। इसका परिणाम है कि सामाजिक भेदभाव की घटनाएं अब नगण्य हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से भी, आज देश में अनुसूचित जाति के सबसे अधिक विधायक और सांसद भाजपा से हैं। संघ के स्वयंसेवक सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के “एक मंदिर, एक कुआं, एक शमशान” के लक्ष्य के करीब हैं, जो शताब्दी वर्ष में उनके लिए गर्व का विषय है।
लेखक:
डॉ. बालू दान बारहठ
व्याख्याता, राजनीति विज्ञान विभाग,
सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर
