
Rajsamand Nata Pratha Case : राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि बिना कानूनी तलाक लिए ‘नाता प्रथा’ के जरिए दूसरी शादी करना कानूनन मान्य नहीं है। अदालत ने ऐसे मामले में तलाक की मांग करने वाले पति की अपील को खारिज करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी ही गलती का फायदा उठाकर अदालत से राहत नहीं मांग सकता। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने राजसमंद फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी पूरी तरह शून्य मानी जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि समाज में वर्षों से चली आ रही कुछ परंपराएं अगर महिलाओं के अधिकारों और कानून के खिलाफ हैं, तो उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामला राजसमंद जिले के आमेट क्षेत्र का है। यहां रहने वाले एक सरकारी शिक्षक की शादी वर्ष 1992 में भीलवाड़ा निवासी महिला से हुई थी। शादी के बाद दोनों पति-पत्नी सरकारी नौकरी में थे और कुछ समय तक साथ रहे। बाद में वर्ष 1997 में दोनों की पोस्टिंग अलग-अलग स्थानों पर हो गई। पत्नी बच्चों के साथ दूसरे शहर में रहने लगी, जबकि पति ने इसी दौरान बिना कानूनी तलाक लिए दूसरी महिला के साथ ‘नाता’ कर लिया। इतना ही नहीं, उसने दूसरी महिला को पत्नी की तरह अपने साथ रखा और उससे तीन बच्चे भी हुए। अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि पति ने आधार कार्ड समेत अन्य दस्तावेजों में दूसरी महिला का नाम पत्नी के रूप में दर्ज करवा रखा था। यानी उसने खुले तौर पर दूसरी महिला के साथ वैवाहिक संबंध स्वीकार किए थे।

फिर पहली पत्नी पर ही लगाया परित्याग का आरोप
Rajasthan Family Court Case : चौंकाने वाली बात यह रही कि दूसरी शादी करने के बावजूद पति ने फैमिली कोर्ट में पहली पत्नी के खिलाफ तलाक की अर्जी लगा दी। उसने दावा किया कि पत्नी बिना वजह उसे छोड़कर चली गई और लंबे समय तक अलग रहकर उसके साथ क्रूरता की। हालांकि फैमिली कोर्ट ने 24 मई 2023 को पति की इस अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पति खुद खुलेआम दूसरी महिला के साथ पति-पत्नी की तरह रह रहा है, फिर वह पहली पत्नी से तलाक मांगकर अपनी गलती पर कानूनी मुहर लगवाना चाहता है। अदालत ने कहा कि कानून ऐसे मामलों में किसी भी तरह की राहत नहीं दे सकता। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्याय मांगने वाले व्यक्ति के “हाथ साफ” होने चाहिए। अगर कोई व्यक्ति खुद कानून का उल्लंघन कर रहा है, तो वह अदालत से सहानुभूति की उम्मीद नहीं कर सकता।
पत्नी का अलग रहना ‘क्रूरता’ नहीं
Rajsamand Second Marriage Without Divorce : पति की ओर से यह भी दलील दी गई कि पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था, जिससे उसे मानसिक प्रताड़ना हुई। हालांकि अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब पति ने दूसरी महिला के साथ संबंध बना लिए और पहली पत्नी को मानसिक रूप से आहत किया, तो पत्नी का अलग रहना पूरी तरह जायज था। ऐसी स्थिति में पत्नी द्वारा पुलिस में शिकायत करना या पति के साथ रहने से इनकार करना ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि केवल पुलिस द्वारा एफआर लगाने से किसी शिकायत को झूठा नहीं माना जा सकता।
‘कंस्ट्रक्टिव डेजर्शन’ का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘कंस्ट्रक्टिव डेजर्शन’ यानी परिस्थितियों के कारण मजबूरी में अलग रहने के सिद्धांत को भी विस्तार से समझाया। अदालत ने कहा कि यदि पति की गलत हरकतों की वजह से पत्नी को घर छोड़ना पड़े, तो कानूनी रूप से परित्याग का दोष पति पर ही माना जाएगा। सिर्फ सरकारी नौकरी के कारण पति-पत्नी का अलग-अलग शहरों में रहना भी कानूनन परित्याग नहीं माना जा सकता।
‘नाता प्रथा’ पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
फैसले के दौरान अदालत ने राजस्थान के कुछ इलाकों में प्रचलित ‘नाता प्रथा’ पर भी गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि कोई भी परंपरा संविधान और महिलाओं के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि समाज की परंपराएं तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक वे न्याय, समानता और मानव गरिमा के सिद्धांतों के अनुरूप हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना कानूनी विवाह के ‘नाता पत्नी’ को संपत्ति, भरण-पोषण या अन्य वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाते, जिससे महिलाओं की स्थिति और कमजोर हो जाती है।
महिलाओं के अधिकारों का हवाला
High Court on Illegal Marriage : हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 39 का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को समानता, सम्मान और सुरक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। अदालत ने साफ किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) और धारा 11 के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी अमान्य है। वहीं धारा 29(2) केवल प्रथागत तलाक को मान्यता देती है, न कि बिना तलाक दूसरी शादी को।
सामाजिक सोच बदलने की जरूरत
इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक कानूनों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। अदालत का संदेश साफ है कि सामाजिक परंपराओं के नाम पर महिलाओं के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता। ग्रामीण इलाकों में आज भी कई महिलाएं ऐसी प्रथाओं का शिकार होती हैं, जहां बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए पुरुष दूसरी शादी कर लेते हैं। ऐसे मामलों में महिलाओं को न केवल सामाजिक अपमान झेलना पड़ता है, बल्कि आर्थिक और कानूनी असुरक्षा का सामना भी करना पड़ता है। हाईकोर्ट के इस फैसले को महिलाओं की गरिमा और वैवाहिक अधिकारों की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।



