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Rana Sanga History : बाबर की तोपों के सामने तलवार लेकर लड़े थे राणा सांगा, 80 घाव सहकर भी डटे रहे

Parmeshwar Singh Chundwat April 12, 2025 1 minute read

Rana Sanga History : आज 12 अप्रैल है — वीरता, आत्मबलिदान और मातृभूमि के लिए लड़ने वाले महान योद्धा राणा सांगा की जयंती। मेवाड़ के इस गौरवशाली राजा की बहादुरी के किस्से आज भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हैं। बीते कुछ समय में राणा सांगा का नाम एक विवादित बयान के कारण सुर्खियों में रहा, जिसमें दावा किया गया था कि राणा सांगा ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन इतिहासकार इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं। भरतपुर की प्रख्यात इतिहासकार डॉ. सुधा सिंह कहती हैं — “यह दावा सरासर झूठा और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। राणा सांगा ने कभी भी बाबर को भारत आने का invitation नहीं दिया, बल्कि उसके प्रस्ताव को सख्ती से ठुकरा दिया था। इसके उलट, उन्होंने बाबर की सेना से भरतपुर के पास स्थित खानवा के battlefield में डटकर मुकाबला किया। यही वह युद्ध था, जिसमें भारत में पहली बार आक्रमणकारी ने barood और canon का उपयोग किया। लेकिन राणा सांगा की राजपूती सेना फिर भी तलवारों और पारंपरिक हथियारों के साथ लड़ी।”

Rana Sanga vs Babur : बारूद की पहली गर्जना, और सामने खड़ा था राणा सांगा

Rana Sanga vs Babur : भारत के गौरवशाली इतिहास में वर्ष 1526 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। मध्य एशिया की फरगना घाटी (जो आज के उज्बेकिस्तान में स्थित है) से चलकर एक महत्वाकांक्षी योद्धा बाबर, काबुल होते हुए भारत की ओर बढ़ा। बाबर ने इस अभियान की शुरुआत केवल एक सीमित लक्ष्य के साथ की थी— दिल्ली की सल्तनत को जीतकर हिंदुस्तान में अपनी सत्ता स्थापित करना। उस समय दिल्ली और आगरा की गद्दी पर इब्राहिम लोदी का शासन था। बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाएं 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में आमने-सामने हुईं। इस युद्ध में बाबर ने पहली बार भारत की धरती पर आधुनिक युद्ध तकनीकों का उपयोग किया— जिनमें तोपखाने, बारूद और मंगोल शैली की युद्ध संरचना प्रमुख थी। इस रणनीतिक बढ़त ने बाबर को निर्णायक जीत दिलाई और इब्राहिम लोदी को युद्धभूमि पर मौत मिली। इसके साथ ही बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया, और भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रख दी। लेकिन उसकी विजय यात्रा यहीं नहीं थमी। बाबर जानता था कि हिंदुस्तान पर स्थायी रूप से शासन तभी संभव होगा जब वह राजपूताना के सबसे शक्तिशाली और निडर योद्धा, महाराणा सांगा को परास्त कर सके। राणा सांगा उस समय केवल एक क्षेत्रीय शासक नहीं थे, बल्कि उन्हें समूचे उत्तर-पश्चिम भारत में हिंदवी स्वराज्य का प्रतीक माना जाता था। वे पहले ही इब्राहिम लोदी को दो बार पराजित कर चुके थे— और उनकी वीरता ने बाबर को बेचैन कर दिया था। बाबर के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती, सबसे बड़ा शत्रु और सबसे खतरनाक अवरोधक बन चुके थे राणा सांगा। इस टकराव का मंच बना भरतपुर के समीप स्थित खानवा का युद्ध मैदान, जहाँ 1527 में दोनों महाशक्तियों की सेनाएं भिड़ीं। यहीं पर भारत में पहली बार battlefield पर बारूद और तोपों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया गया। बाबर की सेना जहाँ तकनीकी दृष्टि से अत्याधुनिक थी, वहीं राणा सांगा की सेना राजपूती पराक्रम, बलिदान, और धर्म रक्षक भावना से ओतप्रोत थी।

Ibrahim Lodi and Rana Sanga war : इब्राहिम लोदी को दो बार हरा चुके थे सांगा, इसलिए बाबर चाहता था मदद

Ibrahim Lodi and Rana Sanga war : इतिहासकार डॉ. सुधा सिंह के अनुसार, राणा सांगा और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच दुश्मनी बेहद तीव्र थी। दोनों ही अपने-अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे और यही टकराव की वजह बना। वर्ष 1517 में कोटा के पास खतौली में दोनों सेनाओं के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ, जिसमें राणा सांगा ने लोदी की सेना को करारी शिकस्त दी। इसके एक साल बाद 1518 में धौलपुर के पास बाड़ी में फिर से युद्ध हुआ, और इस बार भी जीत राणा सांगा की हुई।

ये दोनों युद्ध मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से करीब 450 किलोमीटर दूर दिल्ली के काफी नजदीक लड़े गए थे, जिससे यह साबित होता है कि सांगा न सिर्फ सामरिक रूप से शक्तिशाली थे, बल्कि उनका प्रभाव दिल्ली सल्तनत तक पहुंच चुका था। राणा सांगा की वीरता और रणकौशल से बाबर भी प्रभावित था। बाबरनामा में इसका जिक्र है, जहां बाबर ने राणा सांगा को भारत का सबसे ताकतवर और प्रभावशाली राजा बताया है। खतौली और बाड़ी की लड़ाइयों का उल्लेख बाबर ने अपनी आत्मकथा में करते हुए स्वीकार किया कि सांगा के खिलाफ अकेले जीतना आसान नहीं होगा।

Rana Sanga’s battles : राणा रायमल के पुत्र, जिन्होंने मेवाड़ की कमान संभाली

Rana Sanga’s battles : डॉ. सुधा सिंह बताती हैं कि राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को हुआ था। वे मेवाड़ के राजा राणा रायमल के तीसरे पुत्र थे। महज 27 वर्ष की आयु में वर्ष 1509 में उन्होंने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली। इसके बाद उन्होंने राजपूताना को एक सूत्र में बांधने के लिए कई वीरता पूर्ण युद्ध लड़े। इन्हीं युद्धों में उनके शरीर पर 80 गंभीर घाव आए।

इब्राहिम लोदी को हराने के लिए उसके ही रिश्तेदारों ने बाबर को भेजा था निमंत्रण

इतिहासकार डॉ. सुधा सिंह बताती हैं कि इब्राहिम लोदी की सुल्तानत के भीतर ही उसके कई रिश्तेदार उससे असंतुष्ट थे और सत्ता की लालसा रखते थे। इन्हीं दुश्मन संबंधियों—जैसे अलाउद्दीन लोदी, पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और आलम खान लोदी—ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया था। उन्होंने बाबर को आश्वासन दिया कि राणा सांगा की मदद से वे आगरा की दिशा से हमला करेंगे, जबकि बाबर दिल्ली की ओर से आगे बढ़े। इस तरह वे इब्राहिम लोदी को दोनों ओर से घेरने की रणनीति बना रहे थे। हालांकि, राणा सांगा ने इस योजना में भागीदारी से इंकार कर दिया। उन्होंने बाबर का साथ देने से इनकार किया, जिससे बाबर को यह स्पष्ट हो गया कि सांगा उसके लिए भविष्य में एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। पानीपत की लड़ाई (1526) में भले ही बाबर ने इब्राहिम लोदी को हरा दिया और दिल्ली-आगरा पर कब्जा कर लिया, लेकिन उसकी नजर में सबसे बड़ा खतरा अब राणा सांगा ही था। इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि बाबर और सांगा के बीच एक अस्थायी समझौता हुआ था, जिसके तहत बाबर ने यह वादा किया था कि दिल्ली जीतने के बाद वह काल्पी, बयाना और धौलपुर पर अधिकार नहीं करेगा। लेकिन विजय के बाद बाबर ने अपना यह वादा तोड़ दिया और इन क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया, जिससे राणा सांगा के साथ टकराव की जमीन पूरी तरह तैयार हो गई।

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Rana Sanga Jayanti : बयाना में बाबर की हार और कुछ ही दिनों बाद खानवा में हुआ निर्णायक युद्ध

Rana Sanga Jayanti : इतिहासकार डॉ. सुधा सिंह बताती हैं कि 21 फरवरी 1527 को बयाना के पास बाबर और राणा सांगा की सेनाओं के बीच पहली सीधी भिड़ंत हुई। इस युद्ध में बाबर की सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा और राणा सांगा की विजय हुई। इस हार ने बाबर को अंदर तक झकझोर दिया। उसे समझ आ गया कि राणा सांगा जैसी शक्तिशाली राजपूत सेना को हराने के लिए केवल हथियार ही नहीं, बल्कि मनोबल और अनुशासन भी बेहद ज़रूरी है। बयाना की हार के बाद बाबर ने अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए कई अहम कदम उठाए। उसने शराब और अफीम जैसी नशिली चीजों पर पूरी तरह रोक लगा दी और इस युद्ध को ‘जिहाद’ की शक्ल दी, जिससे उसके सैनिकों को धार्मिक भावना से प्रेरणा मिले। इसके कुछ ही दिन बाद, 16 मार्च 1527 को भरतपुर के पास स्थित खानवा के मैदान में राणा सांगा और बाबर की सेनाएं आमने-सामने हुईं। यह युद्ध भारत के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। बाबर की रणनीतियों और आधुनिक हथियारों, खासकर तोपों और बंदूकों के इस्तेमाल ने युद्ध की दिशा बदल दी और राणा सांगा की वीरता के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस भीषण युद्ध में सांगा बुरी तरह घायल हुए। कहा जाता है कि युद्ध में घायल होने के बाद राणा सांगा अपने राज्य मेवाड़ लौटने लगे। रास्ते में वे दौसा ज़िले के बसवा नामक स्थान पर रुके, जहां उन्होंने अपने घावों का इलाज करवाया। आज भी उस स्थान को ‘सांगा का चबूतरा’ कहा जाता है, जो उनकी वीरता और संघर्ष की गवाही देता है। खानवा युद्ध के करीब 11 महीने बाद, 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा का निधन हो गया। उनकी समाधि आज भी राजस्थान के मांडलगढ़ में स्थित है। राणा सांगा की सेना में उस समय अनेक शक्तिशाली राजा और संगठन शामिल थे—जैसे मारवाड़, आमेर, अजमेर, ग्वालियर, हसन खां मेवाती, चंदेरी के राजा, इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी, राजा मेदनी राय और किसान जाट संगठन। यह गठबंधन राजपूत वीरता और एकता का प्रतीक माना जाता है।

बाबरनामा में दर्ज है—“सांगा ने मुझे धोखा दिया”

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. गोपीनाथ शर्मा की किताब ‘मेवाड़ एंड मुग़ल एम्परर्स (1526–1707)’ के अनुसार, राणा सांगा ने बाबर से कभी कोई औपचारिक संपर्क या सैन्य सहयोग की पेशकश नहीं की थी। पुस्तक के अनुसार, वास्तव में तो बाबर ही था जिसने सांगा से संपर्क करने की कोशिश की थी। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को और भी पुख्ता बनाते हैं मेवाड़ राजघराने के पुरोहितों द्वारा प्रतिदिन लिखे गए बुलेटिन, जिन्हें उस काल का एक अत्यंत विश्वसनीय और प्रामाणिक राजपूत संस्करण माना जाता है। इन बुलेटिनों में भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता कि सांगा ने बाबर को भारत आने या इब्राहिम लोदी के खिलाफ हमला करने के लिए आमंत्रित किया था। वहीं दूसरी ओर, बाबर की आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में इस पूरे प्रसंग को एक अलग नजरिए से बताया गया है। बाबरनामा में दर्ज है कि राणा सांगा के दूत बाबर के पास आए थे और उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि बाबर दिल्ली की ओर से इब्राहिम लोदी पर आक्रमण करे, जबकि राणा सांगा आगरा की ओर से चढ़ाई करेंगे। लेकिन बाबर के अनुसार, युद्ध के वक्त सांगा ने उस समझौते को निभाया नहीं और सहायता करने से पीछे हट गया। बाबर ने इसे “धोखा” करार दिया और इसी वजह से वह सांगा को एक विश्वासघाती और शक्तिशाली प्रतिद्वंदी मानता था। इस तरह इतिहास में एक ही घटना को दो अलग-अलग नजरियों से देखा गया है—एक राजपूत दृष्टिकोण जो सांगा को रणनीतिक और स्वाभिमानी योद्धा के रूप में प्रस्तुत करता है, और दूसरा बाबर का दृष्टिकोण, जो उसे अपने मिशन में रुकावट डालने वाला एक धोखेबाज सहयोगी मानता है।

बाबर की तोपें बनाम सांगा की तलवारें : खानवा का युद्ध

भारत के इतिहास में पहली बार जब किसी युद्ध में barood और cannons का इस्तेमाल हुआ, तो वह युद्ध था खानवा का युद्ध। बाब मध्य एशिया की फरगना घाटी (अब उज्बेकिस्तान) से होता हुआ भारत आया। 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में उसने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसका सबसे बड़ा शत्रु बना — राणा सांगा।


राणा सांगा की वीरता से कांपा था बाबर

राणा सांगा पहले ही दो बार इब्राहिम लोदी को हरा चुके थे — 1517 में खतौली और 1518 में बाड़ी में। इन युद्धों ने उनकी शक्ति और नेतृत्व क्षमता को स्थापित कर दिया था। बाबरनामा में भी लिखा है कि बाबर, सांगा को भारत का सबसे शक्तिशाली राजा मानता था। बाबर ने सांगा को प्रस्ताव भेजा था कि वे मिलकर लोदी पर हमला करें — बाबर दिल्ली की ओर से और सांगा आगरा की ओर से। लेकिन सांगा ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। इस धोखे से चिढ़कर बाबर ने सांगा को अपना दुश्मन मान लिया।

सांगा की सेना में कई रियासतों का था समर्थन

राणा सांगा की विशाल सेना में शामिल थे — मारवाड़, आमेर, ग्वालियर, अजमेर, हसन खां मेवाती, चंदेरी, महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी का भाई), किसान जाट संगठन, और राजा मेदनी राय।

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Parmeshwar Singh Chundwat

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