
India Rice Production Decline : भारत में इस साल चावल की पैदावार में बड़ी गिरावट आने का अनुमान है। पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 1 करोड़ टन कम चावल उत्पादन होने की संभावना जताई जा रही है। अनुमान के मुताबिक यह पिछले 17 वर्षों में सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है। इससे पहले 2009 में चावल का उत्पादन 10.1 फीसदी घटा था और उस दौरान कीमतों में करीब 20 फीसदी तक बढ़ोतरी देखने को मिली थी।
इस बार उत्पादन में कमी की वजह कम बारिश, धान के रकबे में गिरावट और फसल पकने के दौरान सूखे जैसे हालात को माना जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि चावल की कीमतों पर इसका कितना असर पड़ेगा, देश की घरेलू जरूरत पूरी हो पाएगी या नहीं और हालात कब तक सामान्य हो सकते हैं। इस साल देश में करीब 14.4 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान है। यह पिछले साल के 15.4 करोड़ टन उत्पादन की तुलना में करीब 6.5 फीसदी कम है। खास बात यह है कि करीब एक दशक बाद पहली बार चावल के उत्पादन में कमी आने का अनुमान है। हालांकि अभी धान की कटाई जारी है। ऐसे में मौजूदा आंकड़े अंतिम नहीं हैं और फसल की कटाई पूरी होने के बाद उत्पादन की वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। धान की फसल के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। इस बार मानसून की स्थिति ने चावल उत्पादन को प्रभावित किया है। जून से सितंबर के बीच देश में सामान्य से करीब 12 फीसदी कम बारिश हुई। चावल उत्पादन वाले कई प्रमुख राज्यों में बारिश की कमी और ज्यादा रही। पंजाब, बिहार, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों में बारिश की कमी करीब 40 फीसदी तक बताई जा रही है। इन सात राज्यों की देश के कुल चावल उत्पादन में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी है। ऐसे में इन क्षेत्रों में बारिश की कमी का सीधा असर धान की फसल पर पड़ा है। मध्य प्रशांत महासागर में जुलाई तक अल-नीनो जैसी स्थिति बनने से भी मानसून प्रभावित होने की बात सामने आई है। इसका असर धान की खेती के लिए जरूरी पानी की उपलब्धता पर पड़ा।
धान की बुवाई का रकबा भी हुआ कम
Rice Price Hike : चावल उत्पादन में गिरावट की दूसरी बड़ी वजह धान की बुवाई का क्षेत्र कम होना है। देश में कुल चावल उत्पादन का करीब 80 फीसदी हिस्सा खरीफ सीजन से आता है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर 2026 तक खरीफ धान का रकबा 4.31 करोड़ हेक्टेयर रहा। पिछले साल यह क्षेत्र करीब 4.47 करोड़ हेक्टेयर था। यानी इस साल धान की बुवाई का क्षेत्र करीब 3.6 फीसदी घट गया है। रकबा कम होने के साथ अगर प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी प्रभावित होता है तो कुल पैदावार में गिरावट और ज्यादा हो सकती है।
फसल पकने के दौरान भी कम हुई बारिश
Rice Shortage India 2026 : धान की फसल के पकने के समय भी कई इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही। लंबे समय तक सूखे जैसे हालात रहने से फसल की उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका है। राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्णा राव के मुताबिक, हाल के सप्ताहों में दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में लंबे सूखे के दौर ने धान की पैदावार की संभावना को प्रभावित किया है। यानी परेशानी सिर्फ धान के रकबे तक सीमित नहीं है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम रहने की स्थिति में कुल चावल उत्पादन पर इसका दोहरा असर पड़ सकता है।
जलाशयों में कम पानी, रबी की फसल पर भी असर की आशंका
चावल उत्पादन को लेकर चिंता सिर्फ खरीफ सीजन तक सीमित नहीं है। सर्दियों में होने वाली रबी धान की बुवाई और उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है। कृषि कारोबार से जुड़ी कंपनी ओलाम एग्री इंडिया के डिप्टी कंट्री हेड नितिन गुप्ता के मुताबिक, जलाशयों में पानी की स्थिति सामान्य से कम रहने के कारण रबी धान का रकबा और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 24 सितंबर को देश के 178 प्रमुख जलाशय करीब 70.8 फीसदी भरे थे, जबकि पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों में करीब 89.7 फीसदी पानी था।
उत्पादन घटने की आशंका से अभी से बढ़ने लगे चावल के दाम
India Rice Stock 2026 : फिलहाल बाजार में चावल की सप्लाई पर्याप्त बनी हुई है, लेकिन आने वाले समय में उत्पादन कम रहने की आशंका के चलते कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, पिछले साल की तुलना में चावल के औसत दाम करीब 7 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। 27 सितंबर को चावल की औसत कीमत 45.77 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई। गैर-बासमती प्रीमियम चावल की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय सोना मसूरी चावल के दाम करीब 25 फीसदी बढ़कर 58 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। वहीं पूर्वी भारत में इस्तेमाल होने वाले स्वर्ण चावल की कीमत करीब 10 फीसदी बढ़कर 35 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।

बासमती धान के दाम भी पिछले साल से ज्यादा
FCI Rice Stock 2026 : बासमती धान की मंडियों में आवक शुरू हो चुकी है। फिलहाल बासमती धान का भाव पिछले साल की तुलना में करीब 30 फीसदी अधिक बताया जा रहा है। इसकी कीमत करीब 4,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। वैश्विक चावल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी और वैश्विक निर्यात में करीब 45 फीसदी है। भारत के बाद थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख निर्यातक देशों में भी चावल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। ऐसे में भारत में उत्पादन घटने और घरेलू कीमतें बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है। इससे वैश्विक चावल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
देश में चावल की भारी कमी की आशंका फिलहाल नहीं
उत्पादन घटने का मतलब यह नहीं है कि देश में तत्काल चावल की भारी कमी हो जाएगी। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी भंडार में मौजूद बड़ा स्टॉक है। सरकार हर साल किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर धान खरीदती है। 2026-27 के लिए धान की MSP 2,441 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है। खरीदा गया अनाज भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के गोदामों में रखा जाता है। सरकारी स्टॉक का इस्तेमाल घरेलू जरूरत, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, विभिन्न सरकारी योजनाओं, एथेनॉल उत्पादन और अन्य आवश्यकताओं के लिए किया जाता है। सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 तक करीब 1.03 करोड़ टन स्टॉक रखने का लक्ष्य तय किया था। वहीं 1 सितंबर 2026 तक करीब 5.96 करोड़ टन धान का स्टॉक मौजूद था। यानी निर्धारित जरूरत की तुलना में सरकारी भंडार काफी अधिक है।
सरकारी स्टॉक बढ़ने की एक बड़ी वजह जुलाई 2023 से अक्टूबर 2024 के बीच बासमती को छोड़कर अन्य चावल के निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध भी रहा। उस समय घरेलू बाजार में चावल की कीमतें बढ़ने के बाद सरकार ने घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए निर्यात पर रोक लगाई थी।
सरकारी स्टॉक ज्यादा, फिर भी क्यों बनी हुई है चिंता?
सरकारी गोदामों में बड़ी मात्रा में स्टॉक होने के बावजूद इसे पूरा का पूरा बाजार में बेच पाना संभव नहीं है। इसके पीछे कई वजहें हैं। सरकारी भंडार में सिर्फ खाने योग्य तैयार चावल ही नहीं होता, बल्कि बड़ी मात्रा में धान भी शामिल रहता है। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2026 तक सरकारी स्टॉक में करीब 3.5 करोड़ टन धान था। इस धान को मिलों में कुटाई के बाद खाने योग्य चावल में बदला जाता है, जिसमें समय लगता है।
इसके अलावा सरकारी भंडार में बासमती, सामान्य सफेद चावल के साथ मोटा और टूटे हुए चावल की अलग-अलग मात्रा भी रहती है। रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल होने वाली चावल की सभी किस्मों की मांग एक जैसी नहीं होती।
एथेनॉल बनाने में भी इस्तेमाल हो रहा सरकारी चावल
सरकारी स्टॉक का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की प्रक्रिया के तहत FCI के स्टॉक वाले चावल का भी उपयोग किया जाता है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में FCI के स्टॉक वाले चावल की हिस्सेदारी 24.64 फीसदी है। 2024-25 में FCI ने करीब 50 लाख टन चावल एथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया था। वहीं 2025-26 में करीब 72 लाख टन चावल एथेनॉल के लिए रिजर्व किया गया। जून 2025 से जून 2026 के बीच FCI ने करीब 63.5 लाख टन चावल एथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरी कंपनियों को सप्लाई किया। इस वजह से सरकारी स्टॉक का एक हिस्सा खाद्य बाजार के लिए सीधे उपलब्ध नहीं रहता।
PDS और सरकारी योजनाओं के लिए भी रिजर्व रहता है अनाज
सरकारी गोदामों में रखा पूरा अनाज खुले बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं होता। स्टॉक का एक हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी PDS और मुफ्त अनाज वितरण जैसी योजनाओं के लिए सुरक्षित रखा जाता है। सरकार के नियमों के अनुसार, इन योजनाओं और आपातकालीन जरूरतों के लिए आवश्यक स्टॉक को अलग रखने के बाद ही बचा हुआ अनाज खुले बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इसलिए सरकारी भंडार में बड़ी मात्रा में अनाज मौजूद होने के बावजूद बाजार में उसकी पूरी मात्रा एक साथ नहीं आ सकती।
अगले साल तक रह सकता है उत्पादन पर असर
कम बारिश का असर केवल मौजूदा खरीफ फसल तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। जलाशयों में कम पानी होने के कारण रबी सीजन की बुवाई और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि इस साल उत्पादन में आई कमी की भरपाई के साथ अगले साल के लिए पर्याप्त सरकारी स्टॉक बनाए रखना भी चुनौती बन सकता है।
चावल से जुड़े दूसरे कारोबार भी होंगे प्रभावित
चावल के उत्पादन और कीमतों में बदलाव का असर इससे जुड़े दूसरे उद्योगों पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर पशु आहार और पोल्ट्री फीड उद्योग पर इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। भारत में मुर्गी पालन की लागत का बड़ा हिस्सा फीड पर खर्च होता है। पोल्ट्री फीड में टूटे हुए चावल का भी इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में चावल की उपलब्धता कम होने और कीमत बढ़ने पर पशु एवं पोल्ट्री आहार की लागत भी प्रभावित हो सकती है।
अक्टूबर में साफ हो सकती है तस्वीर
पंजाब के प्रमुख बासमती निर्यातक जॉसन ग्रेंस के CMD रणजीत सिंह जॉसन के मुताबिक, अक्टूबर के पहले सप्ताह तक उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की मंडियों में धान की आवक बढ़ने की उम्मीद है। इससे बासमती चावल की कीमतों में कुछ नरमी आने की संभावना जताई गई है। वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन धान की आवक बढ़ने और कटाई का काम आगे बढ़ने के बाद ही हो सकेगा। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह चावल की कीमतों और उपलब्धता के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।



