
Sarpanch Election 2026 ; भीम नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी थमते ही अब भीम पंचायत समिति क्षेत्र के गांवों में गांव की सरकार को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। पंचायती राज चुनाव की आहट के साथ चौपालों से लेकर चाय थड़ों और कोटड़ियों तक एक ही सवाल तैर रहा है क्या इस बार मौजूदा सरपंच अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या गांव नए चेहरे के हाथों में सत्ता सौंपेगा? भीम की पंचायत राजनीति का पिछला रिकॉर्ड तस्वीर साफ करता है। यहां एक बार सरपंच बनने के बाद लगातार दूसरी बार उसी चेहरे पर मतदाताओं का भरोसा कायम रहना आसान नहीं रहा है। यही वजह है कि यहां सरपंच की कुर्सी बचाना किसी सियासी अग्निपरीक्षा से कम नहीं माना जाता।
पिछले पंचायती राज चुनाव 2020 में भीम पंचायत समिति की 30 से अधिक पंचायतों में मुकाबला हुआ था। इनमें महज पांच सरपंच ऐसे रहे, जिन्होंने दोबारा जीत दर्ज कर अपनी कुर्सी बरकरार रखी। इनमें दिवेर के भंवर सिंह, मण्डावर की प्यारी कुमारी, बरार की पंकज कंवर, बार के लक्ष्मण सिंह और बोरवा की सलमा काठात शामिल है। इन पांच में दो पुरुष और तीन महिला सरपंच है, जिन्होंने अपने काम और स्थानीय पकड़ के दम पर दोबारा मतदाताओं का भरोसा हासिल किया यानी 2020 का चुनाव यह संकेत दे गया कि भीम की पंचायत सियासत में सत्ता बनाए रखना, सत्ता हासिल करने से कहीं बड़ी चुनौती है।
कहीं पति के बाद पत्नी, कहीं परिवार कायम
Panchayat Election 2026 : भीम की पंचायत राजनीति में परिवार की भूमिका भी कम अहम नहीं रही है। कई पंचायतों में पति के बाद पत्नी ने चुनावी मैदान संभाला और परिवार की राजनीतिक पकड़ बरकरार रखी। डूंगाजी का गांव इसका एक उदाहरण है। यहां 2015-20 तक भूपेंद्र सिंह सरपंच रहे और 2020 में उनकी पत्नी कंचन राठौड़ ने सरपंच पद संभाला। अजीतगढ़ में परिवार की पकड़ का सिलसिला और लंबा रहा। वर्ष 2010 में सोहनी देवी, 2015 में उनके पति अमरसिंह और 2020 में फिर सोहनी देवी सरपंच बनीं। इस तरह पति-पत्नी के जरिए परिवार ने लगातार तीसरी बार पंचायत की सत्ता अपने पास रखी। पति-पत्नी के रूप में यह क्षेत्र का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इसी तरह बली जस्साखेड़ा में 2010 में हरीश टांक सरपंच बने और 2020 में उनकी पत्नी निधि टांक ने सरपंच पद संभाला।
हार के बाद लौटे तो फिर जमाया कब्जा
Rajsamand Panchayat Election : पंचायत चुनाव की सियासत में हार अंतिम पड़ाव नहीं रही। भीम क्षेत्र में ऐसे चेहरे भी रहे हैं, जिन्होंने चुनावी शिकस्त के बाद दोबारा मैदान में उतरकर वापसी की। बग्गड़ के विश्वम्भरकृष्ण सिंह, शेखावास के हालू काठात और समेलिया की ज्योतिबाला कंवर ऐसे ही नाम है, जिन्होंने हार के बाद वापसी करते हुए दोबारा सरपंच बनने में सफलता हासिल की। मण्डावर ग्राम पंचायत की सरपंच प्यारी कुमारी की शैक्षणिक योग्यता भी उन्हें अलग पहचान देती है वह तीन विषयों में पोस्ट ग्रेजुएट होने के साथ बीएड और एलएलबी की डिग्री धारक है। 2020 में वह उन पांच सरपंचों में शामिल रहीं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर अपनी कुर्सी बचाई।
पुराने चेहरे बनाम नए दावेदार, किसका चलेगा सिक्का ?
Gram Panchayat Election : आरक्षण की स्थिति ने कई संभावित उम्मीदवारों के पुराने समीकरण बदल दिए हैं। गांवों में जातीय समीकरण स्थानीय प्रभाव और पुराने राजनीतिक रिश्तों को लेकर बैठकों का दौर शुरू हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2020 में इतिहास रचने वाले पांच सरपंच एक बार फिर अपनी-अपनी कुर्सी बचाने की चुनौती स्वीकार करेंगे, या इस बार गांव की जनता नए चेहरों को मौका देगी? पिछले चुनाव का आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि भीम में लगातार दूसरी जीत आसान नहीं रही है। लेकिन जिन पांच सरपंचों ने 2020 में यह कारनामा कर दिखाया, उनकी चुनावी सफलता अब इस बार मैदान में उतरने वाले दावेदारों के लिए एक अलग तरह की चुनौती और नजीर दोनों बन गई है।
तीन बार सरपंच बनने का रिकॉर्ड
Rajasthan Panchayat Election 2026 : भीम पंचायत समिति में व्यक्तिगत रूप से तीन बार सरपंच बनने का रिकॉर्ड बग्गड़ के विश्वम्भरकृष्ण सिंह के नाम है उनकी राजनीतिक सक्रियता और पंचायत स्तर पर पकड़ आज भी क्षेत्र की सियासी चर्चाओं का हिस्सा बनी हुई है।
राजनीतिक विरासत भी बड़ा फैक्टर
गांवों की राजनीति में पुराने राजनीतिक रिश्तों और परिवार की विरासत का असर भी दिखाई देता रहा है। बार के सरपंच लक्ष्मण सिंह के पिता पूर्व में बार के सरपंच रह चुके हैं और भीम पंचायत समिति के प्रधान की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। वहीं बरार की सरपंच पंकज कंवर की सास भी पूर्व सरपंच रही हैं। ऐसे में यहां पंचायत की राजनीति में नई पीढ़ी के साथ पुरानी राजनीतिक विरासत का मेल भी देखने को मिलता है।
आरक्षण की लॉटरी ने बदली चुनावी बिसात
अब पंचायत राज चुनाव की आहट के साथ गांवों की सियासत फिर गर्माने लगी है पंचायत समिति प्रधान और सरपंच पदों की आरक्षण लॉटरी जारी होने के बाद लंबे समय से चुनावी तैयारी में जुटे दावेदारों ने अपने समीकरण नए सिरे से साधने शुरू कर दिए हैं। कहीं मनमाफिक आरक्षण आने से संभावित प्रत्याशियों में उत्साह है तो कहीं सीट आरक्षित होने से पुराने दावेदारों को रणनीति बदलनी पड़ रही है। महिला सीट होने की स्थिति में पत्नी या बहू के नाम पर भी दावेदारी की चर्चाएं शुरू हो गई है। लॉटरी के बाद गांवों के चाय- थड़ों, चौपालों और कोटड़ियों पर चुनावी गणित बैठने लगा है सोशल मीडिया पर भावी उम्मीदवारों के पोस्टर और उनके समर्थन में संदेशों का दौर भी शुरू हो गया है।



