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Aravalli Hills Controversy : अरावली पहाड़ियों को लेकर क्यों गुस्से में हैं लोग? इसके कमजोर होने से देश को क्या-क्या नुकसान

Parmeshwar Singh Chundwat December 20, 2025 1 minute read

Aravalli Hills Controversy : भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर अरावली को लेकर इतना विरोध क्यों हो रहा है और अगर यह पर्वतमाला कमजोर हुई तो इसका असर देश पर कितना गंभीर होगा।

नवंबर–दिसंबर 2025 के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक केंद्रीय समिति द्वारा प्रस्तावित अरावली पहाड़ियों की नई कानूनी परिभाषा को मंजूरी दी। इस नई परिभाषा के तहत अब केवल वही पहाड़ियां अरावली मानी जाएंगी जिनकी ऊंचाई जमीन से कम से कम 100 मीटर अधिक है। कोर्ट का कहना है कि अरावली पांच राज्यों में फैली हुई है और हर राज्य के अपने-अपने नियम थे, जिससे भ्रम की स्थिति बन रही थी। इसी असमंजस को दूर करने के लिए एक समान परिभाषा तय की गई।

इस फैसले पर पर्यावरणविद् सवाल क्यों उठा रहे हैं?

Aravalli Hills Supreme Court verdict : पर्यावरणविदों का मानना है कि यह परिभाषा अरावली के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की एक आंतरिक रिपोर्ट के मुताबिक, अरावली क्षेत्र में 12,081 पहाड़ियां मैप की गई हैं, लेकिन इनमें से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर की शर्त पूरी करती हैं। इसका मतलब यह है कि करीब 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी पहाड़ियों को बाहर करने से अरावली पर्वतमाला की निरंतरता टूट जाएगी। यही नहीं, ऐसी पहाड़ियां खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए खुल सकती हैं, जिससे पर्यावरणीय संतुलन को भारी नुकसान पहुंचेगा।

अरावली में माइनिंग पूरी तरह बैन क्यों नहीं की गई?

Aravalli hills new legal definition : सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पुराने अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। कोर्ट के अनुसार, जब पहले पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था, तब अवैध माइनिंग बढ़ी, रेत माफिया सक्रिय हुए और पर्यावरणीय नुकसान और ज्यादा हुआ। इसी कारण कोर्ट ने बीच का रास्ता अपनाते हुए सख्त नियमों के साथ सीमित खनन की अनुमति दी है। हालांकि, नई माइनिंग लीज या पुरानी लीज के नवीनीकरण पर फिलहाल रोक जारी है।

अरावली पर्वतमाला देश के लिए इतनी अहम क्यों है?

Why Aravalli hills are important : अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। यह थार रेगिस्तान को दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ने से रोकती है। करीब 20 करोड़ साल पुरानी यह पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा जैसे सूखे इलाकों में भूजल को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाती है। अरावली की पहाड़ियों से चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों को पानी मिलता है। साथ ही यहां लीड, जिंक, कॉपर, सोना, लाइमस्टोन, मार्बल और ग्रेनाइट जैसे खनिज भी पाए जाते हैं, जो इसे आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

अरावली को नुकसान हुआ तो देश को क्या खमियाजा भुगतना पड़ेगा?

Aravalli hills controversy explained : पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अगर अरावली कमजोर होती है तो इसका असर सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। धूल प्रदूषण तेजी से बढ़ेगा, जिससे दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में हवा और भी जहरीली हो सकती है। बारिश का पैटर्न बदल सकता है, जिससे सूखा और जल संकट गहराने का खतरा है। इसके अलावा अरावली के वन क्षेत्र खत्म होने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होगा, जिससे मानव-पशु संघर्ष बढ़ेगा। उत्तर-पश्चिम भारत में गर्मी का तनाव और चरम मौसम की घटनाएं भी अधिक देखने को मिल सकती हैं।

अरावली में माइनिंग को लेकर अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए?

1990 के दशक में पर्यावरण मंत्रालय ने माइनिंग नियमों को सख्त किया था। इसके बाद 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात में खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी। 2024 में कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में नई माइनिंग लीज देने और पुरानी लीज के नवीनीकरण पर भी रोक लगा दी। 2025 में सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने वैज्ञानिक मैपिंग, माइक्रो-लेवल पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और इको-सेंसिटिव जोन में माइनिंग रोकने की सिफारिश की, जिसे नवंबर 2025 में कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इसी साल जून में केंद्र सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य अरावली के 29 जिलों में पांच किलोमीटर के बफर जोन में हरियाली बढ़ाना है।

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Parmeshwar Singh Chundwat

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