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Piplantri village : भाई की कलाई से पहले बहने पेड़ को बांधती है राखी, पिपलांत्री गांव की अनोखी परंपरा

Laxman Singh Rathor August 8, 2025 1 minute read

Piplantri village : देशभर में भाई व बहन के स्नेह का पर्व रक्षाबंधन शनिवार को परम्परागत तरीके से मनाया जाएगा, लेकिन राजस्थान के राजसमंद जिले के पिपलांत्री गांव में रक्षाबंधन का पर्व भाई- बहन के स्नेह तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की महिलाएं व युवतियां अपने भाई की कलाई से पहले पेड़ों को राखी बांधती है। इस गांव में हर पर्व महोत्सव के तार धरती और प्रकृति से साथ जुड़े रहते हैं। यहां रक्षाबंधन का पर्व दो से तीन दिन पहले पेड़ों को राख बांधकर मनाते हैं और इस बार राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के सानिध्य में महिलाओं व युवतियों ने पेड़ों को राखी बांधी और जिनके घर में बेटियों का जन्म हुआ, वे परिवार बेटियों के साथ पिपलांत्री पहुंचे और 111 पौधे रोपने के साथ उनके संरक्षण संवर्द्धन का संकल्प लिया।

अनोखी परंपरा और पर्यावरण के प्रति प्रेम के लिए देश दुनिया में मशहूर पिपलांत्री गांव में इस बार राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के सानिध्य में रक्षाबंधन का पर्व मनाया। रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है, इस गांव में एक अलग ही अंदाज में मनाने की परम्परा जुड़ गई। इसके तहत यहां की बेटियां अपने भाइयों की कलाई से पहले पेड़ों को राखी बांध कर उनके संरक्षण व संवर्द्धन का संकल्प लेती है। इस तरह यहां की महिलाएं व युवतियां पेड़ को भाई मानती है। यह परंपरा न केवल पर्यावरण संरक्षण की मिसाल है, बल्कि बेटियों के सम्मान और प्रकृति के प्रति गहरे लगाव का प्रतीक भी है।

यह गांव हमें सिखाता है कि अगर हम प्रकृति के साथ प्रेम और सम्मान का रिश्ता बनाएं, तो वह भी हमें बदले में जीवन देती है। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, पिपलांत्री का यह मॉडल एक उम्मीद की किरण है। यह हमें बताता है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। पिपलांत्री की बेटियां और उनके पेड़-भाई आज एक नई कहानी लिख रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

बेटी किरण की याद ने बदली सोच

Shyam Sundar Paliwal Piplantri : साल 2005 में पिपलांत्री गांव के लिए एक नया अध्याय शुरू हुआ। उस समय गांव के सरपंच चुने गए श्याम सुंदर पालीवाल ने एक ऐसी पहल शुरू की, जिसने न केवल गांव की तस्वीर बदली, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। श्याम सुंदर की जिंदगी में एक दुखद घटना घटी थी। उनकी छोटी सी बेटी किरण का कम उम्र में निधन हो गया था। इस दुख ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। अपनी बेटी की याद में उन्होंने एक पौधा लगाया। यह पौधा उनके लिए उनकी बेटी का प्रतीक बन गया। वे उस पौधे में अपनी बेटी को देखते थे और उसकी देखभाल में उन्हें सुकून मिलता था। इस घटना ने श्याम सुंदर को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सोचा कि अगर हर बेटी के जन्म पर पौधे लगाए जाएं, तो न केवल बेटियों का सम्मान होगा, बल्कि पर्यावरण भी संरक्षित होगा। इस तरह पिपलांत्री में एक अनोखी परंपरा की शुरुआत हुई। गांव में जब भी किसी बेटी का जन्म होता, उसके नाम पर 111 पौधे लगाए जाते। अगर किसी की मृत्यु होती, तो उसकी स्मृति में 11 पौधे लगाए जाते। इस परंपरा ने गांव के लोगों को प्रकृति के करीब ला दिया और बेटियों के प्रति सम्मान को और गहरा कर दिया। इसके तहत जिस भी परिवार में बेटी का जन्म होता है, उनके परिवार नन्हीं बेटियों को लेकर पिपलांत्री आते हैं और 111 पौधे रोपते हैं। साथ ही जिन जिन बेटियों के नाम पौधे रोपे जा चुके हैं और वे बड़ी हो गई, तो वे यहां आकर उन पेड़ों को राखी बांधती है।

भाई से पहले पेड़ को राखी

Rajasthan village story पिपलांत्री गांव में युवतियां व महिलाएं भाई से पहले पेड़ को राख बांधकर उनके लंबी उम्र की कामना करती है। पिपलांत्री में रक्षाबंधन का मतलब सिर्फ भाइयों तक सीमित नहीं है। यहां की बेटियां उन पेड़ों को राखी बांधती हैं, जो उनके जन्म के समय उनके नाम पर लगाए गए थे। इन पेड़ों को वे अपना भाई मानती हैं और उनकी देखभाल को अपनी जिम्मेदारी समझती हैं। हर साल रक्षाबंधन के दिन पिपलांत्री गांव में एक अनोखा उत्सव होता है। गांव की बेटियां और महिलाएं ढोल-नगाड़ों की थाप पर गीत गाती हैं, नाचती हैं और हर्षोल्लास के साथ पेड़ों को राखी बांधती हैं। यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक संकल्प है कि वे इन पेड़ों की रक्षा करेंगी और पर्यावरण को हरा-भरा रखेंगी। इस परंपरा की शुरुआत 2005 में हुई थी और पिछले 20 सालों से यह निरंतर चल रही है। अब न केवल पिपलांत्री, बल्कि आसपास के गांवों की महिलाएं और बेटियां भी इस उत्सव में शामिल होती हैं।

बंजर जमीन को बना दिया ऑक्सीजन का जंगल

Piplantri village raksha bandhan tradition पिपलांत्री गांव के आसपास मार्बल संगमरमर की खदानें हैं। इन खदानों से निकलने वाली स्लरी पहले पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या थी। यह स्लरी पौधों को नष्ट कर देती थी और जमीन को बंजर बना रही थी। लेकिन श्याम सुंदर पालीवाल की पहल ने इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया। गांव में पौधरोपण के साथ-साथ स्लरी को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठाए गए। पौधों की देखभाल के लिए पानी की व्यवस्था की गई, ताकि कोई भी पौधा सूखने न पाए। इस मुहिम का असर इतना गहरा हुआ कि पिपलांत्री गांव आज हरा-भरा है। यहां के पेड़ न केवल ऑक्सीजन का स्रोत हैं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ एक मजबूत कवच भी हैं। कोरोना काल में जब लोग ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे, तब पिपलांत्री के पेड़ों ने इस बात को और साबित किया कि प्रकृति की रक्षा करना कितना जरूरी है।

जब एक गांव बना ग्लोबल आइकन

Piplantri green village story पिपलांत्री की यह अनोखी परंपरा आज विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बन चुकी है। डेनमार्क के स्कूली पाठ्यक्रम में इस गांव की कहानी को शामिल किया गया है। वहां के बच्चे पिपलांत्री के पर्यावरण संरक्षण मॉडल को पढ़ते हैं और इससे प्रेरणा लेते हैं। यह गांव अब केवल एक गांव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और बेटियों के सम्मान का प्रतीक बन चुका है। इसे आदर्श ग्राम, निर्मल ग्राम, वृक्ष ग्राम और कन्या ग्राम जैसे नामों से जाना जाता है। पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल कहते हैं, “कोरोना काल में हमने देखा कि लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे थे। ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी थी, लेकिन प्रकृति के पास ऑक्सीजन का अथाह भंडार है। बस जरूरत है इन पेड़ों को बचाने और इनका सम्मान करने की।” उनकी यह बात आज हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो पर्यावरण के प्रति जागरूक होना चाहता है। Piplantri village photos

रिश्ता सिर्फ राखी का नहीं, सांसों का है

Piplantri Village history in Hindi पिपलांत्री की बेटियां इस परंपरा को केवल एक रस्म नहीं मानतीं। उनके लिए ये पेड़ उनके भाई हैं, जिनके साथ उनका भावनात्मक रिश्ता है। वे कहती हैं, “हमारे जन्म पर हमारे माता-पिता ने ये पेड़ लगाए थे। इनकी देखभाल करना हमारी जिम्मेदारी है। ये पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, हमें जीवन देते हैं।”

ये बेटियां ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण प्रदूषण के खतरों को भी समझती हैं। उनका मानना है कि अगर हम आज पेड़ों की रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और पर्यावरण नहीं मिलेगा। इसलिए वे हर साल रक्षाबंधन पर पेड़ों को राखी बांधकर यह संदेश देती हैं कि प्रकृति और इंसान का रिश्ता अटूट है।

पिपलांत्री बना पर्यावरण की मिसाल

Piplantri village famous for राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने पिपलांत्री में रक्षाबंधन के महोत्सव में शामिल होने के बाद आयोजित समारोह में कहा कि पिपलांत्री गांव में पर्यावरण व प्रकृति के लिए पूरा गांव एकजुट है, जो अपने आप में बड़ी बात है। यहां हर बेटी के जन्म पर 111 पौधे रोपना और फिर उन्हें जीवित रखना उससे भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, मगर यहां के ग्रामवासी यह कर रहे हैं। राज्यपाल ने पद्मश्री श्यामसुंदर पालीवाल व प्रशासक अनिता पालीवाल के प्रयासों की भी सराहना की। राज्यपाल ने मारवाड़ में खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए हुए प्रयास में अमृतादेवी को याद करते हुए नमन किया और कहा कि पिपलांत्री सरीखे गांव आज हर जिले और हर तहसील में बनने चाहिए, तभी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बेहतर कार्य संभव है। पद्मश्री श्यामसुंदर पालीवाल ने दावा किया कि पिपलांत्री में एक अनुमान के मुताबिक 14 से 15 लाख पौधे रोपे जा चुके हैं, जिनमें एक लाख चंदन है। कार्यक्रम में जिला एवं सेशन न्यायाधीश राघवेंद्र काछवाल, जिला प्रमुख रतनदेवी माधवलाल जाट, प्रधान अरविन्द सिंह राठौड़, सम्भागीय आयुक्त प्रज्ञा केवलरमानी, जिला कलक्टर अरुण कुमार हसीजा, एसपी ममता गुप्ता भी मौजूद थे।

पिपलांत्री के प्रमुख तथ्य

  • Piplantri village Case study : 4 से 5 हजार की आबादी का गांव है पिपलांत्री
  • पिपलांत्री पंचायत में छाेटी मोरवड़, बड़ी मोरवड़, धर्मेटा, पिपलांत्री खुर्द, कड़ेचो का गुड़ा, आरना आदि गांव है शामिल
  • ग्रीन विलेज की पहचान : यह गांव पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल के लिए पूरे देश में “ग्रीन विलेज” के नाम से जाना जाता है।
  • पूर्व सरपंच एवं पद्मश्री श्यामसुंदर पालीवाल ने वर्ष 2005 से सघन पौधरोपण की मुहिम शुरू की।
  • पिपलांत्री पंचायत में हर घर में बेटी के जन्म होने पर 111 पौधे लगाने की परंपरा है।
  • पौधरोपण के बाद संरक्षण संवर्द्धन में जनसहभागिता के तहत बहने भाई स्वरूप में पेड़ को राखी बांधती है और उसके संरक्षण का संकल्प लेती है।
  • पिपलांत्री में जल संरक्षण के लिए चेकडेम, तालाब के जो कार्य हुए, उन्हें देखने के लिए देशभर के पंच व सरपंच आते हैं।
  • जैव विविधता संरक्षण को लेकर नीम, शीशम, खेजड़ी, बबूल जैसे हजारों औषधीय पौधे लगाए गए हैं
  • प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध है और ग्रामवासियों को कपड़े के थेले उपयोग के लिए प्रेरित करते हैं।
  • पौधरोपण के बाद पिपलांत्री अब ग्रामीण पर्यटन को लेकर फेमस हो रहा है, जहां पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है।
  • गांव में जिन बेटियों का निधन हो जाता है, उनके सम्मान में स्मृति वन विकसित किया जा रहा है।
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Laxman Singh Rathor

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Laxman Singh Rathor को पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक का लंबा अनुभव है। 2005 में Dainik Bhakar से कॅरियर की शुरुआत कर बतौर Sub Editor कार्य किया। वर्ष 2012 से 2019 तक Rajasthan Patrika में Sub Editor, Crime Reporter और Patrika TV में Reporter के रूप में कार्य किया। डिजिटल मीडिया www.patrika.com पर भी 2 वर्ष कार्य किया। वर्ष 2020 से 2 वर्ष Zee News में राजसमंद जिला संवाददाता रहा। आज ETV Bharat और Jaivardhan News वेब पोर्टल में अपने अनुभव और ज्ञान से आमजन के दिल में बसे हैं। लक्ष्मण सिंह राठौड़ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि खबरों की दुनिया में एक ब्रांड हैं। उनकी गहरी समझ, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग, पाठक व दर्शकों से जुड़ने की क्षमता ने उन्हें पत्रकारिता का चमकदार सितारा बना दिया है। jaivardhanpatrika@gmail.com

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