
Rajkumar Roat Letter Amit Shah : राजस्थान के वागड़ अंचल से निकलकर देशभर में आदिवासी समाज की मुखर आवाज बन चुके भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद Rajkumar Roat ने एक बार फिर केंद्र सरकार के सामने आदिवासी समुदाय से जुड़ा बड़ा मुद्दा उठाया है। इस बार मामला दिल्ली में शुरू होने वाली House Listing एवं House Census 2026 की डिजिटल जनगणना प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
सांसद राजकुमार रोत ने केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah को पत्र लिखकर गंभीर चिंता जताई है कि दिल्ली में रहने वाले लाखों आदिवासियों की पहचान और संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना में इस्तेमाल हो रहे डिजिटल एप्लिकेशन में अनुसूचित जनजाति यानी ST वर्ग का विकल्प ही उपलब्ध नहीं कराया गया है। सांसद ने इस पूरे मुद्दे को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी साझा किया, जिसके बाद राजस्थान से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
Census HLO App में नहीं मिला ST वर्ग का विकल्प
Census HLO App ST Column : राजकुमार रोत ने अपने पत्र में बताया कि दिल्ली में मकान सूचीकरण और जनगणना के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे आधिकारिक मोबाइल एप्लिकेशन “Census HLO App” में अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के लिए कोई अलग कॉलम या विकल्प नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि इस तकनीकी खामी की वजह से फील्ड में काम कर रहे जनगणनाकर्मी और सुपरवाइजर आदिवासी परिवारों का डेटा मजबूरी में “सामान्य” या “अन्य” श्रेणी में दर्ज कर रहे हैं। सांसद ने इसे आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक पहचान पर सीधा हमला बताया है।
“सामान्य वर्ग” में दर्ज हो रहे आदिवासी परिवार
Tribal Census Issue India : रोत का कहना है कि यदि आदिवासियों की अलग और सही गणना नहीं होगी, तो भविष्य में उनके सामाजिक प्रतिनिधित्व, सरकारी योजनाओं और नीति निर्माण पर गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जनगणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं होती, बल्कि इसी आधार पर सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट तय करती हैं और सामाजिक वर्गों को अधिकार देती हैं। ऐसे में यदि आदिवासी समाज की वास्तविक संख्या ही रिकॉर्ड में नहीं आएगी, तो उनके अधिकार भी प्रभावित होंगे।

2011 जनगणना के आंकड़ों का भी किया जिक्र
BAP MP Rajkumar Roat : सांसद राजकुमार रोत ने अपने पत्र में वर्ष 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए दावा किया कि दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले आदिवासियों की संख्या “शून्य” दिखाई गई थी, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा कि दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों से आए करीब 20 से 22 लाख आदिवासी समुदाय के लोग रोजगार, मजदूरी, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में रह रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें स्थानीय ST सूची में शामिल नहीं किया गया और जनगणना में उनकी अलग पहचान भी दर्ज नहीं हो पाई। रोत ने आरोप लगाया कि इस बार भी उसी तरह की स्थिति दोहराई जा रही है।
राजस्थान के आदिवासियों से भी जुड़ा है मामला
Rajasthan Tribal News : यह मुद्दा केवल दिल्ली तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका सीधा असर राजस्थान के आदिवासी समुदाय पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर और सिरोही जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार रोजगार और शिक्षा के लिए दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं। यदि वहां जनगणना में उन्हें ST श्रेणी में दर्ज नहीं किया जाता, तो वे अपनी सामाजिक पहचान खो देते हैं और कई सरकारी योजनाओं व सामाजिक सुरक्षा लाभों से वंचित रह जाते हैं।
राजकुमार रोत ने रखीं तीन बड़ी मांगें
सांसद राजकुमार रोत ने गृह मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए तीन प्रमुख सुझाव दिए हैं।
1. Census App में तुरंत जोड़ा जाए ST विकल्प
उन्होंने मांग की कि जनगणना और हाउस लिस्टिंग के लिए उपयोग किए जा रहे Census HLO App में तत्काल प्रभाव से ST श्रेणी का विकल्प जोड़ा जाए।
2. अधिकारियों को जारी हों स्पष्ट निर्देश
रोत ने कहा कि दिल्ली के सभी जनगणनाकर्मियों, सुपरवाइजरों और संबंधित अधिकारियों को लिखित दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि किसी भी आदिवासी परिवार को सामान्य वर्ग में दर्ज न किया जाए।
3. आदिवासियों की वास्तविक संख्या दर्ज हो
उन्होंने मांग की कि दिल्ली में रहने वाले आदिवासी समुदाय की वास्तविक संख्या को सही तरीके से रिकॉर्ड किया जाए, ताकि उनके संवैधानिक और सामाजिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अहम मुद्दा
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राजकुमार रोत का यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी खामी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी पहचान और अधिकारों से जुड़ा बड़ा सामाजिक विषय बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार जनगणना देश का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज माना जाता है। इसी के आधार पर सामाजिक योजनाएं, आरक्षण नीति और विकास कार्यक्रम तय किए जाते हैं। ऐसे में यदि किसी वर्ग की सही गणना नहीं होती, तो उसका सीधा असर उस समाज के अधिकारों पर पड़ता है।
अब गृह मंत्रालय के फैसले पर नजर
अब सभी की नजर गृह मंत्रालय पर टिकी हुई है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि जनगणना एप में जल्द सुधार नहीं किया गया तो यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। साथ ही आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से भी इस विषय पर प्रतिक्रिया तेज होने की संभावना जताई जा रही है।



