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Chittorgarh fort history in hindi : भारत का सबसे वीर किला! चित्तौड़गढ़ का इतिहास सुनकर कांप उठेंगे दुश्मन

Parmeshwar Singh Chundwat May 11, 2026 1 minute read

Chittorgarh fort history in hindi : राजस्थान की वीरभूमि पर स्थित चित्तौड़गढ़ का किला केवल पत्थरों से बना एक विशाल दुर्ग नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, राजपूती आन-बान-शान और बलिदान की जीवंत पहचान है। यह वही भूमि है, जहां वीर योद्धाओं ने मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वहीं वीरांगनाओं ने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर की अग्नि में प्रवेश कर इतिहास में अमिट उदाहरण स्थापित किए। चित्तौड़गढ़ का हर पत्थर शौर्य की कहानी कहता है और यहां की हवाएं आज भी स्वाभिमान का संदेश देती हैं।

चित्तौड़गढ़ किले का भौगोलिक स्वरूप

Who built Chittorgarh fort : अजमेर से खंडवा जाने वाली रेलवे लाइन पर स्थित चित्तौड़गढ़ जंक्शन से लगभग दो मील उत्तर-पूर्व दिशा में एक विशाल पहाड़ी पर यह ऐतिहासिक दुर्ग बना हुआ है। समुद्र तल से करीब 1338 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह किला लगभग 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर फैला हुआ है। इसका आकार विशाल व्हेल जैसा दिखाई देता है। किला लगभग तीन मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है, जबकि पूरी पहाड़ी का घेरा करीब आठ मील माना जाता है। लगभग 609 एकड़ क्षेत्र में फैला यह दुर्ग भारत के सबसे विशाल किलों में गिना जाता है।

वीरता और बलिदान की धरती

Chittorgarh Fort history Padmavati : चित्तौड़गढ़ को वीरों की जन्मभूमि कहा जाता है। यहां असंख्य राजपूत योद्धाओं ने देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए तलवार उठाई। इस धरती ने कई ऐसे युद्ध देखे, जिनमें वीर सैनिक अंतिम सांस तक लड़ते रहे। दूसरी ओर, राजपूत रानियों और वीरांगनाओं ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर कर इतिहास रच दिया। यही कारण है कि चित्तौड़गढ़ भारतीय संस्कृति में साहस, त्याग और स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

किले के निर्माण को लेकर प्रचलित कथाएं

Chittorgarh Fort Rajasthan : चित्तौड़गढ़ किले के निर्माण को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। एक लोककथा के अनुसार महाभारत काल में पांडवों के भाई भीम ने इस किले का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि भीम की मुलाकात निर्भयनाथ नामक योगी से हुई, जिसने पारस पत्थर देने की शर्त पर पहाड़ी पर एक रात में दुर्ग निर्माण का कार्य सौंपा। भीम ने अपने भाइयों की सहायता से लगभग पूरा निर्माण कर लिया था, लेकिन छलपूर्वक मुर्गे की आवाज निकलवाकर निर्माण कार्य रुकवा दिया गया। क्रोधित होकर भीम ने जमीन पर लात मारी, जिससे बड़ा गड्ढा बन गया, जिसे आज भी भीमलत तालाब कहा जाता है।

हालांकि इतिहासकारों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण सातवीं शताब्दी में मौर्यवंशीय राजा चित्रांगद ने करवाया था। उन्होंने इस नगर को चित्रकूट नाम दिया, जो समय के साथ बदलकर चित्तौड़ कहलाने लगा। बाद में गुहिलवंशी शासक बप्पा रावल ने इस किले पर अधिकार स्थापित किया और यह मेवाड़ की शान बन गया।

चित्तौड़गढ़ पर हुए प्रमुख आक्रमण

Chittorgarh Fort Story : चित्तौड़गढ़ का इतिहास अनेक युद्धों और शाकाओं से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1303 में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। उस समय रावल रत्नसिंह शासक थे। इसी युद्ध को चित्तौड़ का पहला शाका कहा जाता है। इस संघर्ष के दौरान रानी पद्मिनी और हजारों महिलाओं ने जौहर किया।

इसके बाद 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया। यह मेवाड़ का दूसरा शाका माना जाता है। उस समय रानी कर्मवती ने हजारों महिलाओं के साथ जौहर कर लिया था। वर्ष 1567 में मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ को घेर लिया। यह चित्तौड़ का तीसरा और सबसे प्रसिद्ध शाका माना जाता है। इस युद्ध में वीर जयमल और पत्ता ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। युद्ध के बाद महाराणा उदयसिंह ने राजधानी को चित्तौड़ से हटाकर उदयपुर स्थापित किया।

रणनीतिक दृष्टि से किले का महत्व

Chittorgarh Fort Facts : चित्तौड़गढ़ का किला राजपूताना के सबसे महत्वपूर्ण दुर्गों में गिना जाता है। इसकी पहाड़ी स्थिति और सात विशाल द्वार इसे अत्यंत मजबूत बनाते थे। दुर्ग तक पहुंचना दुश्मनों के लिए बेहद कठिन था। हालांकि, यह दुर्ग खुले मैदान के बीच स्थित होने के कारण लंबे घेराव के समय रसद आपूर्ति में समस्या उत्पन्न हो जाती थी। यही कारण रहा कि कई बार भोजन और पानी की कमी के चलते राजपूतों को निर्णायक युद्ध लड़ना पड़ा।

किले के सात विशाल द्वार

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में प्रवेश के लिए सात प्रमुख द्वार बनाए गए हैं। प्रत्येक द्वार का अपना ऐतिहासिक महत्व है।

पाडन पोल

यह किले का पहला प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक युद्ध के दौरान यहां तक खून की धारा बह आई थी।

भैरव पोल

दूसरा द्वार भैरव पोल कहलाता है। इसका नाम वीर सोलंकी भैरोंदास के नाम पर रखा गया।

हनुमान पोल

इस द्वार के निकट हनुमानजी का मंदिर स्थित है, इसलिए इसे हनुमान पोल कहा जाता है।

गणेश पोल

यह चौथा प्रवेश द्वार है, जिसके पास गणपति मंदिर बना हुआ है।

जोड़ला पोल

पांचवें और छठे द्वार की निकटता के कारण इसे जोड़ला पोल कहा गया।

लक्ष्मण पोल

यह द्वार लक्ष्मणजी के मंदिर के कारण प्रसिद्ध है।

राम पोल

यह किले का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण द्वार है। इसके समीप भगवान राम का मंदिर स्थित है।

जयमल और पत्ता की वीरता

चित्तौड़गढ़ की तीसरी लड़ाई में जयमल और पत्ता ने अद्भुत शौर्य दिखाया। कहा जाता है कि अकबर की गोली से घायल होने के बाद भी जयमल युद्ध से पीछे नहीं हटे। कल्ला राठौड़ ने उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर युद्ध कराया। दोनों वीरों ने अंतिम सांस तक लड़ते हुए बलिदान दिया।

पद्मिनी महल का इतिहास

चित्तौड़गढ़ का पद्मिनी महल दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह झील के बीच स्थित सुंदर महल है। इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं दर्पण में रानी पद्मिनी की परछाई देखी थी। महल की स्थापत्य कला आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती है।

विजय स्तंभ : शौर्य की पहचान

महाराणा कुंभा द्वारा बनवाया गया विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ की सबसे प्रसिद्ध धरोहरों में गिना जाता है। यह लगभग नौ मंजिला विशाल स्तंभ है, जिसका निर्माण मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में कराया गया था। इस स्तंभ पर देवी-देवताओं, युद्ध दृश्यों और धार्मिक प्रतीकों की सुंदर नक्काशी की गई है।

जैन कीर्ति स्तंभ

चित्तौड़गढ़ में स्थित जैन कीर्ति स्तंभ भी स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। इसका निर्माण दिगंबर जैन समाज के व्यापारी जीजा ने करवाया था। यह स्तंभ भगवान आदिनाथ को समर्पित है।

गौमुख कुंड की धार्मिक महत्ता

गौमुख कुंड चित्तौड़गढ़ का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यहां चट्टान से निकलता जल निरंतर शिवलिंग पर गिरता रहता है। श्रद्धालु इसे पवित्र तीर्थ मानते हैं।

जौहर स्थल की करुण गाथा

समिध्देश्वर मंदिर के निकट स्थित महासती स्थल चित्तौड़गढ़ के इतिहास का सबसे भावुक अध्याय है। यहां हजारों महिलाओं ने जौहर कर अपने सम्मान की रक्षा की थी। आज भी यह स्थान वीरांगनाओं के बलिदान की याद दिलाता है।

महाराणा कुंभा का महल

किले में स्थित महाराणा कुंभा का महल अपनी विशाल संरचना और ऐतिहासिक घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है। यही वह स्थान है जहां महाराणा उदयसिंह का जन्म हुआ था और पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ की वंश परंपरा बचाई थी।

मीरा बाई का मंदिर

चित्तौड़गढ़ का मीरा मंदिर भक्तिरस का केंद्र माना जाता है। भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई ने यहीं भक्ति साधना की थी। मंदिर परिसर में आज भी भक्ति और आध्यात्मिकता का वातावरण महसूस किया जा सकता है।

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कालिका माता मंदिर

कालिका माता मंदिर मूल रूप से सूर्य मंदिर था। बाद में यहां मां कालिका की स्थापना की गई। मंदिर की स्थापत्य कला और नक्काशी बेहद आकर्षक है।

चित्तौड़गढ़ का सांस्कृतिक महत्व

चित्तौड़गढ़ केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और स्वाभिमान का प्रतीक है। यहां का हर स्मारक किसी न किसी वीर गाथा से जुड़ा हुआ है। यह किला हमें त्याग, साहस, धर्म रक्षा और राष्ट्रभक्ति का संदेश देता है।

पर्यटन का प्रमुख केंद्र

आज चित्तौड़गढ़ देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहां हर वर्ष हजारों पर्यटक इतिहास को करीब से देखने आते हैं। विशाल किले, मंदिर, महल, विजय स्तंभ और जौहर स्थल पर्यटकों को राजपूती इतिहास से रूबरू कराते हैं।

About the Author

Parmeshwar Singh Chundwat

Editor

Parmeshwar Singh Chundwat ने डिजिटल मीडिया में कॅरियर की शुरुआत Jaivardhan News के कुशल कंटेंट राइटर के रूप में की है। फोटोग्राफी और वीडियो एडिटिंग में उनकी गहरी रुचि और विशेषज्ञता है। चाहे वह घटना, दुर्घटना, राजनीतिक, सामाजिक या अपराध से जुड़ी खबरें हों, वे SEO आधारित प्रभावी न्यूज लिखने में माहिर हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, थ्रेड्स और यूट्यूब के लिए छोटे व बड़े वीडियो कंटेंट तैयार करने में निपुण हैं।

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