
फादर्स डे : केवल एक दिन नहीं, जीवन भर का सम्मान
पिता बरगद की छांव हैं, जीवन का आधार हैं,
जिनके रहते घर में ही, ईश्वर के संस्कार है।
फादर्स डे पर हम पिता के सम्मान में बड़े-बड़े शब्द लिखते हैं, सुंदर तस्वीरें साझा करते हैं और उनके त्याग व संघर्ष को याद करते हैं। यह सब अच्छा है, लेकिन एक प्रश्न हम सभी को स्वयं से पूछना चाहिए—क्या पिता का सम्मान केवल एक दिन का विषय है, या जीवन भर निभाने वाला कर्तव्य?
पिता वह व्यक्तित्व हैं जो अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए स्वयं की इच्छाओं का त्याग कर देते हैं। वे अपनी परेशानियाँ छिपाकर परिवार के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हैं। बच्चों की सफलता के पीछे अक्सर एक पिता की अनगिनत चिंताएँ, अधूरे सपने और अथक परिश्रम छिपे होते हैं। किन्तु आज का समय एक कड़वी सच्चाई भी सामने रखता है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को उँगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही बुजुर्ग अपने ही घरों में उपेक्षा का दर्द झेल रहे हैं। बच्चों के पास मोबाइल के लिए समय है, मित्रों के लिए समय है, मनोरंजन के लिए समय है, लेकिन कई बार माता-पिता के साथ बैठकर दो बातें करने का समय नहीं है। कितनी विडंबना है कि जब पिता जीवित होते हैं, तब उनकी सलाह पुरानी लगती है, उनकी बातें लंबी लगती हैं और उनका साथ बोझ लगने लगता है। लेकिन जब वही पिता इस संसार से चले जाते हैं, तब उनकी तस्वीर के सामने खड़े होकर लोग लिखते हैं—
“मिस यू पापा…”
सच पूछिए तो “मिस यू पापा” लिखना उतना दर्दनाक नहीं है, जितना यह एहसास कि जब वे हमारे पास थे, तब हमने उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया। तस्वीरों पर श्रद्धांजलि लिखना आसान है, लेकिन जीते जी उनके चेहरे पर मुस्कान लाना कठिन नहीं, फिर भी हम अक्सर यही सबसे आवश्यक कार्य भूल जाते हैं। याद रखिए, एक दिन ऐसा भी आएगा जब आपके पिता की आवाज़ सुनने की इच्छा होगी, लेकिन वह आवाज़ सुनाई नहीं देगी। उनकी सलाह की आवश्यकता होगी, लेकिन वे पास नहीं होंगे। तब उनकी तस्वीर को देखकर आँखें अवश्य नम होंगी, पर समय वापस नहीं आएगा।
एक पल ठहरकर सोचिए…
- क्या हम अपने माता-पिता के साथ उतना समय बिताते हैं, जितना मोबाइल की स्क्रीन के साथ बिताते हैं?
- क्या हम उनके मन की बात उतनी ही ध्यान से सुनते हैं, जितनी दूसरों की सुनते हैं?
- क्या हमने कभी बिना किसी स्वार्थ के उनके पास बैठकर केवल उनका हाल पूछा है?
इसलिए फादर्स डे केवल उपहार देने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का दिन नहीं होना चाहिए। यह दिन आत्मचिंतन का दिन होना चाहिए। यह संकल्प लेने का दिन होना चाहिए कि हम अपने माता-पिता को केवल सम्मान ही नहीं देंगे, बल्कि अपना समय भी देंगे, अपना स्नेह भी देंगे और यह एहसास भी कराएँगे कि वे हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। क्योंकि पिता के जाने के बाद उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने वाले बहुत मिल जाते हैं, लेकिन पिता के जीवित रहते हुए उनके पास बैठकर उनका हाल पूछने वाले बहुत कम होते हैं।
आइए, इस फादर्स डे पर एक तस्वीर पोस्ट करने से पहले अपने पिता के पास बैठें, उनका हाथ थामें, उनकी बातें सुनें और उन्हें महसूस कराएँ कि वे आज भी हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं।
जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी पिता को खोना नहीं है,
बल्कि उनके रहते हुए उनकी कद्र न करना है।
जीते जी सम्मान दीजिए, प्रेम दीजिए, समय दीजिए…
कहीं ऐसा न हो कि कल तस्वीर देखकर केवल इतना ही लिखना पड़े—
“मिस यू पापा…”
वीणा वैष्णव ‘रागिनी’
राजसमंद (राजस्थान)



