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Maharana Pratap Haldighati : इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की… हल्दीघाटी और यहां की मिट्‌टी को नमन करते हैं लोग

Laxman Singh Rathor June 18, 2026 1 minute read

Maharana Pratap Haldighati : “आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की…, वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!…” कवि प्रदीप की लिखी इन पंक्तियों में जिस बलिदान और मातृभूमि के गौरव की बात कही गई है, उसका सजीव उदाहरण राजस्थान की वीरभूमि हल्दीघाटी है। अरावली की पर्वतमालाओं के बीच स्थित यह पवित्र धरती आज भी वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा सुनाती है। यहां की मिट्टी का प्रत्येक कण मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा प्रताप और उनके वीर सैनिकों के अदम्य साहस का साक्षी है। महाराणा प्रताप का नाम भारतीय इतिहास में स्वाभिमान, स्वतंत्रता और संघर्ष के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। कठिन परिस्थितियों, जंगलों में बिताए गए वर्षों और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अपने आत्मसम्मान और मातृभूमि की स्वतंत्रता से कभी समझौता नहीं किया। यही वजह है कि आज भी देश- दुनिया से जो लोग हल्दीघाटी देखने आते हैं, इस मिट्‌टी को न सिर्फ नमन करते हैं, बल्कि इससे तिलक लगाते हुए इसे सहेजकर अपने साथ ले जाते हैं।

Haldighati Battle 1576 : राजसमंद जिले के खमनोर में स्थित हल्दीघाटी दर्रा अपनी पीली मिट्टी के कारण प्रसिद्ध है, जिसका रंग हल्दी के समान दिखाई देता है, लेकिन इस मिट्टी की पहचान केवल उसके रंग से नहीं, बल्कि उस पर बहाए गए वीरों के रक्त और बलिदान से भी जुड़ी हुई है। 18 जून 1576 को इसी धरती पर भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित युद्धों में से एक हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया था। यह युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक बन गया। मुगल सम्राट अकबर मेवाड़ को अपने अधीन करना चाहता था, लेकिन महाराणा प्रताप ने उसके सामने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में विशाल मुगल सेना को मेवाड़ की ओर भेजा। 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के संकरे दर्रे में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं। महाराणा प्रताप के साथ भील समाज के वीर, हकीम खान सूरी, झाला मान सिंह, रामशाह तोमर और अनेक राजपूत योद्धा थे। संख्या में कम होने के बावजूद मेवाड़ की सेना में अद्भुत साहस और मातृभूमि के लिए मर मिटने का जज्बा था। हल्दीघाटी का संकरा दर्रा महाराणा प्रताप की रणनीति के लिए अनुकूल साबित हुआ। उन्होंने अपनी सेना के साथ ऐसा भीषण आक्रमण किया कि मुगल सेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। युद्ध के शुरुआती चरण में मेवाड़ी सेना ने मुगल सेना पर भारी दबाव बनाया और उन्हें दर्रे से पीछे धकेल दिया।

आज भी प्रेरणा देती है हल्दीघाटी की मिट्टी

Haldighati Soil Significance : हल्दीघाटी केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक है। यहां की मिट्टी आज भी हर भारतीय को देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा देती है। यही कारण है कि कहा जाता है— “इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की…”। महाराणा प्रताप का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, लेकिन स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हल्दीघाटी की यह वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्रप्रेम, त्याग और साहस का संदेश देती रहेगी। तभी तो मेवाड़ ही नहीं, बल्कि देश में कोई भी मांगलिक कार्य हो, इस हल्दीघाटी की मिट्‌टी को पूजन में शामिल करते हैं और लोग इस मिट्‌टी कर खुद को धन्य मानते हैं। हल्दीघाटी में अरण्य बाग के निवासी मोतीलाल माली ने बताया कि इस मिट्‌टी में उनका जन्म होना भी उनके लिए गौरव की बात है। यह बलिदान की भूमि है, जिसे लोग वंदन करते हैं, तिलक लगाते हैं और मिट्‌टी कलश में भर अपने घर ले जाते हैं। तभी तो कवि प्रदीप ने वंदे मातरम् गीत लिखा है- “इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की…”। वाकई इस मिट्‌टी के स्पर्श मात्र से ही एक जोश का अहसास आज भी महसूस किया जा सकता है।

एशिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक चंदन वन

Maharana Pratap Jayanti : हल्दीघाटी युद्ध स्थल के आस पास का क्षेत्र घना जंगल है, जो सर्वाधिक प्राकृतिक चंदन के पेड़े हैं। यह चंदन वन एशिया के सबसे बड़े प्राकृतिक चंदन वनों में गिना जाता है। यहां हजारों की संख्या में सफेद चंदन के पेड़ हैं। वन विभाग की देखरेख में इस दुर्लभ वन संपदा का संरक्षण किया जा रहा है। हल्दीघाटी का मुख्य ऐतिहासिक दर्रा भी इसी घने जंगलों के बीच स्थित है। अरावली की पहाड़ियों और वन क्षेत्र के कारण यह इलाका प्राकृतिक दृष्टि से बेहद समृद्ध माना जाता है। यही भौगोलिक संरचना हल्दीघाटी युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के लिए लाभदायक साबित हुई थी। हल्दीघाटी की मिट्टी का रंग हल्दी जैसा पीला होने के कारण ही इसे हल्दीघाटी के नाम से क्षेत्र की पहचान है। इस चंदन वन में पैंथर, लकड़बग्घा, सियार और अन्य वन्यजीव भी पाए जाते हैं।

बादशाही बाग अब बना अरण्य बाग

Maharana Pratap Haldighati Battle : हल्दीघाटी युद्ध के दौरान अकबर की सेना का पड़ाव बादशाही बाग में रहा, जिसे अब पुरातत्व विभाग द्वारा पुरा महत्व को बनाए रखते हुए विकसित किया है। इसे शाही बाग व बादशाही बाग भी कहते हैं। हालांकि अब अरण्य बाग के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाराणा प्रताप जयंती पर प्रतिवर्ष तीन दिवसीय भव्य मेला भरता है, जिससे न सिर्फ स्थानीय लोग, आदिवासी समाज शिरकत करता है, बल्कि देश दुनिया से आने वाले पर्यटक भी शामिल होते हैं। इस बार भी हल्दीघाटी मेले का आगाज बुधवार से हो गया। यहां तीन दिन तक विशेष आयोजन होंगे।

Maharana Pratap Haldighati : 17 से 19 जून तक मेले में यह खास

Haldighati Mela 2026 : हल्दीघाटी महोत्सव के तहत 17 से 19 जून तक तीन दिन विभिन्न गतिविधियां होगी। पहले दिन रक्त तलाई पर स्मारको पर श्रद्धांजलि, फिर साढ़े 7 बजे रक्त तलाई से अरण्य बाग तक शोभायात्रा निकाली जाएगी। उसके बाद दस बजे अरण्य बाग में मेले का उद्घाटन समारोह होगा। फिर रात को पर्यटन विभाग द्वारा सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होगा। इसी तरह दूसरे दिन 18 जून को खेलकूद प्रतियाेगिताएं होगी, जिसमें तीरदांजी, पहाड़ चढ़ाई, रस्साकस्सी, रूमाल झपट्‌टा, मटकी रेस आदि शामिल है और शाम को भजन संध्या में प्रेमशंकर जाट, रेखा राव व महेंद्र अलबेला भजनों की प्रस्तुतियां देंगे। दूसरे दिन चेतक अश्व मेला भी भरेगा, जिसमें समूचे मेवाड़ से अश्वपालक आएंगे। अश्वों की प्रतियोगिताएं और प्रदर्शन भी होगा। तीसरे दिन 19 जून को खेलकूद प्रतियोगिताएं और पुरस्कार वितरण समारोह के बाद शाम को कवि सम्मेलन होगा।

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Laxman Singh Rathor

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Laxman Singh Rathor को पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक का लंबा अनुभव है। 2005 में Dainik Bhakar से कॅरियर की शुरुआत कर बतौर Sub Editor कार्य किया। वर्ष 2012 से 2019 तक Rajasthan Patrika में Sub Editor, Crime Reporter और Patrika TV में Reporter के रूप में कार्य किया। डिजिटल मीडिया www.patrika.com पर भी 2 वर्ष कार्य किया। वर्ष 2020 से 2 वर्ष Zee News में राजसमंद जिला संवाददाता रहा। आज ETV Bharat और Jaivardhan News वेब पोर्टल में अपने अनुभव और ज्ञान से आमजन के दिल में बसे हैं। लक्ष्मण सिंह राठौड़ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि खबरों की दुनिया में एक ब्रांड हैं। उनकी गहरी समझ, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग, पाठक व दर्शकों से जुड़ने की क्षमता ने उन्हें पत्रकारिता का चमकदार सितारा बना दिया है। jaivardhanpatrika@gmail.com

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