
गुड़िया घर लौटी। चेहरा थका-थका सा था। कंधे पर भारी बस्ता और चेहरे पर दिनभर की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसने बैग रखा और कुछ देर सो गई। थोड़ी देर बाद उठी और मेरे पास आकर बोली— “पापा, मुझे आपका मोबाइल चाहिए। मेरा होमवर्क उसी में आया है।”मैंने भी उसे मोबाइल दे दिया। आखिर होमवर्क करने के लिए मोबाइल देना ही पड़ता है। आजकल स्कूल से फोटो, पीडीएफ और दूसरी अध्ययन सामग्री मोबाइल पर ही तो आती है।
मैं अपने काम में लग गया। काफी देर बाद जब वापस आया तो देखा, गुड़िया मोबाइल में लगी हुई थी और उसी को देखते-देखते अपना होमवर्क कर रही थी। मैं कुछ देर उसे देखता रहा। समय के साथ स्कूल बदले, शिक्षा पद्धति बदली और उसके साथ हमारे बच्चे भी बदल गए। जब हम छोटे थे तब स्कूल में होमवर्क दिया जाता था, लेकिन वह इतना अधिक नहीं होता था। कई बार तो हम स्कूल में बैठकर ही अपना होमवर्क पूरा कर लिया करते थे। जरूरत पड़ती तो किसी साथी की कॉपी लेकर काम समझ लेते और अपना काम पूरा कर लेते। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। आज कई बच्चों के सामने स्थिति यह है कि वे पढ़ाई करें, पाठ याद करें या होमवर्क पूरा करें—समय कम पड़ जाता है। होमवर्क बच्चों के सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे उन्हें पाठ दोहराने, अभ्यास करने और स्वयं सीखने का अवसर मिलता है। लेकिन सवाल यह भी है कि होमवर्क कितना दिया जाए और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि होमवर्क किस तरीके से दिया जाए? कई बार अभिभावकों की ओर से भी यह शिकायत सुनने को मिलती है कि बच्चों को अधिक होमवर्क दिया जाना चाहिए, ताकि वे घर पर इधर-उधर समय न बिताएं।
यह आलेख इस बात पर बहस नहीं कर रहा कि होमवर्क होना चाहिए या नहीं। असली प्रश्न यह है कि आज जिस तरह होमवर्क मोबाइल के माध्यम से बच्चों तक पहुंच रहा है, क्या वह तरीका बच्चों के हित में है? मोबाइल ने आज हमारे जीवन के लगभग हर हिस्से को प्रभावित किया है। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही। मोबाइल ने पढ़ाई को कई मायनों में आसान भी बनाया है। बच्चे किसी कठिन पाठ को समझने के लिए शैक्षिक वीडियो देख सकते हैं, शब्दों का अर्थ खोज सकते हैं और अतिरिक्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस दृष्टि से मोबाइल एक तरह का शिक्षामित्र भी बन सकता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यही शिक्षामित्र धीरे-धीरे बच्चे का मनोरंजन साथी बन जाता है।
मोबाइल पर उपलब्ध हर सामग्री बच्चों के लिए उपयोगी नहीं होती। लगातार स्क्रीन देखने की आदत, अनावश्यक वीडियो और दूसरी सामग्री में उलझना बच्चों की पढ़ाई और दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। कम उम्र में अत्यधिक स्क्रीन समय आंखों में थकान, सिरदर्द, नींद की समस्या और शारीरिक गतिविधि में कमी जैसी परेशानियों से जुड़ सकता है। बच्चे चिड़चिड़े हो सकते हैं और मोबाइल से दूर करना अभिभावकों के लिए कठिन हो सकता है। फिर भी माता-पिता के सामने एक बड़ी मजबूरी है।

उनका तर्क होता है— “मोबाइल से ही तो होमवर्क आता है। बच्चे को मोबाइल नहीं देंगे तो वह होमवर्क कैसे करेगा?” यही इस समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। अभिभावकों के सामने दूसरी परेशानी भी है। उनके अपने काम हैं, कार्यालय की जिम्मेदारियां हैं। हर समय बच्चे के पास बैठकर यह देखना संभव नहीं कि वह मोबाइल पर होमवर्क कर रहा है या कुछ और। मोबाइल हाथ में आया नहीं कि बच्चा होमवर्क के साथ दूसरी चीजों की ओर भी आकर्षित हो सकता है। ऐसे में गलती केवल बच्चे की भी नहीं है और अभिभावक भी पूरी तरह दोषी नहीं हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें विद्यार्थी, अभिभावक और विद्यालय—तीनों को मिलकर रास्ता निकालना होगा।
आज अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की संख्या बढ़ रही है और पढ़ाई का माध्यम भी कई परिवारों के लिए चुनौतीपूर्ण है। हर अभिभावक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा हुआ नहीं है और जो पढ़े हुए हैं, वे भी हमेशा बच्चों को पर्याप्त समय दे सकें, यह जरूरी नहीं। ऐसे में मोबाइल पर निर्भरता और बढ़ जाती है। तो क्या बच्चों को मोबाइल बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। जरूरत के अनुसार और अभिभावक की निगरानी में मोबाइल का शैक्षणिक उपयोग किया जा सकता है। लेकिन बच्चों की पढ़ाई को इस तरह मोबाइल पर निर्भर कर देना कि उन्हें प्रतिदिन होमवर्क करने के लिए लंबे समय तक स्क्रीन देखनी पड़े, इस व्यवस्था पर विचार करना जरूरी है। मुझे लगता है कि हमें विद्यार्थी, विद्यालय, अभिभावक और होमवर्क—इन चारों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना होगा।
विद्यालय प्रबंधन यदि संभव हो तो होमवर्क की मात्रा और उसके माध्यम पर विचार करे। हर छोटी-बड़ी चीज मोबाइल पर भेजने के बजाय मोबाइल का उपयोग मुख्यतः आवश्यक सूचनाओं के लिए किया जा सकता है। टाइम टेबल, विद्यालय के कार्यक्रम, छुट्टी की सूचना, आवश्यक निर्देश या ऐसी सामग्री जिसे वास्तव में डिजिटल माध्यम की जरूरत हो—वह मोबाइल पर भेजी जा सकती है। जहां संभव हो, बच्चों को ऐसा होमवर्क दिया जा सकता है जिसे वे अपनी पुस्तक, कॉपी और आसपास के वातावरण के माध्यम से पूरा कर सकें। इससे बच्चे मोबाइल से पूरी तरह दूर तो नहीं होंगे, लेकिन मोबाइल उनके अध्ययन का अनिवार्य द्वार भी नहीं बनेगा। विद्यालय और अभिभावकों के विचार इस विषय पर अलग-अलग हो सकते हैं। तकनीक को पूरी तरह नकारना भी संभव नहीं है और शायद उचित भी नहीं।
जरूरत इस बात की है कि तकनीक हमारे बच्चों के लिए साधन बने, उनकी आदत नहीं। बच्चों को मोबाइल की जरूरत हो सकती है, लेकिन मोबाइल को बच्चों की जरूरत बना देना चिंता का विषय है। आज हम जिस सुविधा को शिक्षा का माध्यम बनाकर अपना रहे हैं, उसके दूरगामी प्रभावों पर भी विचार करना होगा। आखिर बच्चे केवल अच्छे अंक लाने के लिए नहीं हैं। उनका स्वस्थ शरीर, सहज मन, खेलना, पढ़ना, परिवार के साथ समय बिताना और अपने आसपास की दुनिया को समझना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए समय रहते हमें सोचना होगा— होमवर्क बच्चों के सीखने का साधन बने, मोबाइल बच्चों की दुनिया का केंद्र नहीं।
क्योंकि ये नन्हे बच्चे केवल आज के विद्यार्थी नहीं हैं,
यही आने वाले कल का भविष्य हैं।
कमलेश जोशी ‘कमल’
कांकरोली, राजसमन्द



