
Kumbhalgarh fort News : राजसमंद जिले स्थित विश्व प्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह इसकी ऐतिहासिक भव्यता नहीं बल्कि विरासत संरक्षण को लेकर उठे सवाल हैं। मेवाड़ के गौरव और यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल कुंभलगढ़ किले की तलहटी में मौजूद करीब 200 वर्ष पुरानी रियासतकालीन जेल की बैरकों को अब महिला और पुरुष शौचालय में बदल दिया गया है। यह मामला सामने आने के बाद इतिहास प्रेमियों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जा रही है।
जिस स्थान पर कभी स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक बंदियों को नजरबंद रखा जाता था, वहां अब आधुनिक टॉयलेट की व्यवस्था दिखाई दे रही है। पुराने पत्थरों और दीवारों के बीच लगे फ्लश, पाइपलाइन और टाइल्स लोगों को हैरान कर रहे हैं। यही वजह है कि अब यह मामला “विरासत संरक्षण बनाम पर्यटन सुविधा” की बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। जानकारी के अनुसार कुंभलगढ़ दुर्ग परिसर में स्थित इस रियासतकालीन जेल में करीब 10 बैरकें मौजूद थीं। इनमें से चार बैरकों को भारतीय पुरातत्व विभाग ने वर्षों पहले पर्यटकों की सुविधा के लिए महिला और पुरुष शौचालय में परिवर्तित कर दिया। बाकी कमरों में वर्तमान में पुलिस चौकी और कर्मचारियों के आवास संचालित किए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक महत्व रखने वाली इन बैरकों को बिना संवेदनशीलता के टॉयलेट में बदल देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका मानना है कि यदि पर्यटकों के लिए सुविधा विकसित करनी थी तो परिसर में अन्य जगहों पर आधुनिक शौचालय बनाए जा सकते थे।

पहले अलग जगह बने थे टॉयलेट, बाद में बदली व्यवस्था
Kumbhalgarh jail converted toilet : दुर्ग में कार्यरत कर्मचारियों के मुताबिक पहले पर्यटकों के लिए अलग स्थान पर शौचालय बनाए गए थे। बाद में उसी जगह को बेबी केयर रूम में बदल दिया गया। इसके बाद प्रशासन ने रियासतकालीन जेल की बैरकों को ही शौचालय के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति लापरवाही को दर्शाता है। लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि शायद विभाग को लगा होगा कि अब कैदियों की जगह सुविधाओं को बंद कर देना चाहिए।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है यह परिसर
Kumbhalgarh fort latest controversy : इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार कुंभलगढ़ की यह जेल केवल अपराधियों को बंद रखने का स्थान नहीं थी, बल्कि इसका संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा है। मेवाड़ के स्वतंत्रता सेनानियों पर शोध करने वाले इतिहास शोधकर्ता दिनेश श्रीमाली बताते हैं कि वर्ष 1931 में नाथद्वारा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा को अंग्रेजों ने कुंभलगढ़ में नजरबंद किया था। अंग्रेजों का उद्देश्य उनकी राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करना और आंदोलन को कमजोर करना था। इसके अलावा वर्ष 1938 में प्रोफेसर नारायणदास बागोरा के नेतृत्व में राजसमंद और नाथद्वारा क्षेत्र के 16 स्वतंत्रता सेनानियों को भी इसी जेल में रखा गया था। बताया जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बार ब्रिटिश शासन ने आंदोलनकारियों को नजरबंद करने के लिए कुंभलगढ़ को चुना, क्योंकि यह इलाका अत्यंत सुरक्षित और दुर्गम माना जाता था।
आखिर कुंभलगढ़ ही क्यों चुना जाता था?
Historic jail turned toilet India : अरावली की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। यहां से मेवाड़ और मारवाड़ दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी। इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में यह इलाका इतना कठिन और दुर्गम था कि दुश्मनों के लिए यहां पहुंच पाना लगभग असंभव माना जाता था। यही कारण था कि ब्रिटिश शासन और मेवाड़ रियासत दोनों ही महत्वपूर्ण बंदियों को यहां रखने को सुरक्षित समझते थे। कुंभलगढ़ दुर्ग अपनी विशाल दीवार के लिए भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इसे चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार माना जाता है। करीब 36 किलोमीटर लंबी यह दीवार किले की सुरक्षा को अभेद्य बनाती थी।
खूंखार अपराधियों से लेकर राजनीतिक बंदियों तक को रखा गया
Kumbhalgarh freedom fighters jail : इतिहासकारों के अनुसार कुंभलगढ़ की जेल में केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि मेवाड़ स्टेट के शासनकाल में कई खतरनाक अपराधियों को भी रखा जाता था। दुर्ग परिसर में बने जेलनुमा सात कमरों में ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक बंदियों को खुली जेल की तरह रखा जाता था। ब्रिटिश जेल मैन्युअल के अनुसार वहां बंदियों को केवल नमक और रोटी दी जाती थी। कठिन परिस्थितियों और पहाड़ी इलाके के कारण यहां से भाग निकलना लगभग नामुमकिन माना जाता था।
विभागीय कर्मचारियों ने भी मानी बात
नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर विभागीय कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि वर्तमान में जिन कमरों में शौचालय संचालित किए जा रहे हैं, वे वास्तव में रियासतकालीन जेल की बैरकें ही थीं। हालांकि आधिकारिक तौर पर विभाग के अधिकारी इस मामले पर खुलकर कुछ भी कहने से बचते नजर आए।
संरक्षण मॉडल पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद विरासत संरक्षण को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। इतिहास प्रेमियों का कहना है कि यदि इसी तरह ऐतिहासिक धरोहरों की मूल पहचान खत्म की जाती रही, तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास से जुड़ाव खो देंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन उनका निर्माण इस तरीके से होना चाहिए जिससे ऐतिहासिक धरोहरों की मूल संरचना और पहचान प्रभावित न हो। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने प्रशासन से मांग की है कि ऐतिहासिक जेल की बैरकों को मूल स्वरूप में संरक्षित किया जाए और शौचालय की व्यवस्था किसी अन्य स्थान पर विकसित की जाए, ताकि कुंभलगढ़ की ऐतिहासिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।



