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Devnarayan Mandir : कमल पुष्प से अवतार, Amazing Fact नीम में मीठा स्वाद, Malaseri Dungari

Jaivardhan News February 16, 2024 1 minute read

Devnarayan : लोक देवता देवनारायण भगवान के अवतार का इतिहास भी बड़ा ही रोचक व अनूठा है। विष्णु का अवतार माना जाता है, जिसका मुख्य अवतार स्थल राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के अंतर्गत दलपुरा गांव में स्थित मालासेरी डूंगरी है। यहां श्री देवनारायण मंदिर का प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण करीब 700 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर की खासियत है कि एक ही परिसर में कई देवी-देवता की प्रतिमाएं है। कहते हैं कि भगवान देवनारायण के दर्शन मात्र से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। मंदिर में श्रद्धाभाव से लोग पूजा करते हैं। मंदिर की विशालता व शैली से लेकर यहां का पौराणिक महत्व भी इसे एक अद्वितीय स्थान बनाता है। वर्षों तक वीर बगड़ावत सवाई भोज की पत्नी साडू माता ने अखंड तपस्या इसी मालासेरी डूंगरी पर की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने देवनारायण के रूप में कमल पुष्प पर संवत 968 माघ सप्तमी को सुबह 4 बजे अवतरित हुए। इसी कारण माघ सप्तमी को भगवान देवनारायण का जन्मोत्सव (अवतार दिवस) मनाया जाता है। भादवी छठ पर देवनारायण के प्रिय नीले घोड़े नीलाघर का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

Malaseri Dungari : राजस्थान के अलावा पंजाब, महाराष्ट्र, मधयप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हैदराबाद, उत्तरप्रदेश आदि राज्याें में भगवान देवनारायण के मंदिर हैं। देवनारायण के ननिहाल मध्य प्रदेश के देवास में मंदिर है, जो प्राचीन, ऐतिहासिक व पर्यटन की दृष्टि से प्रसिद्ध है। देवजी के वास के कारण शहर का नाम देवास पड़ा। यहां साल में दो बार मेला भरता है। चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई आदि महानगर में भी देवनारायण मंदिर है। भीलवाड़ा जिले के आसींद से शाहपुरा रोड पर 12 किलोमीटर दूर भगवान देवनारायण की जन्म स्थली मालासेरी डूंगरी में पहाड़ी पर मंदिर बना है, जहां पर भगवान देवनारायण के अवतार व इतिहास से आमजन को रूबरू कराने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से पेनोरमा भी बनाया गया है, जो काफी आकर्षण का केंद्र है।

devnarayan mandir : देवनारायण के दर्शन से भक्तों के दु:ख दूर

devnarayan mandir : मान्यता है कि इस मंदिर में देवनारायण भगवान के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है। खास तौर से कुत्ते के काटने व मानसिक विक्षिप्त लोग जल्दी ठीक होते है। एक आध्यात्मिक व सामाजिक समृद्धि केंद्र के रूप में मालासेरी डूंगरी के प्रति आस्था है। यहां आने वाले भक्तों को आत्मिक शांति व सुकून मिलता है। पुजारी रामगोपाल ने मीडिया को बताया कि यहां पर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

सैकड़ों कबूतर व जीव जंतुओं का बसेरा

मालासेरी डूंगरी पर प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में दर्शन के लिए श्रद्धालु यहां आते हैं। मंदिर में कबूतरों को रोजाना 25 से 30 किलो अनाज डाला जाता है। भक्तजन देवनारायण के दर पर अनाज लेकर आते हैं। इसके चलते मंदिर परिसर व मालासेरी डूंगरी की पहाड़ी पर कबूतरों के अलावा भी कई तरह के जीव जन्तुओं का यहां बसेरा है।

देवनारायण के अलावा कई मंदिर

मालासेरी डूंगरी पर भगवान देवनारायण के अलावा भी कई तरह के मंदिर है। भगवान भोलेबाबा,, भैरुनाथ, ब्रह्माजी, हनुमानजी, कृष्ण कन्हैया व कालिका माता की प्रतिमाएं स्थापित है। यहां एक साथ कई देवी देवताओं के दर्शन होते हैं। यह एक आध्यात्मिक स्थल है, जहां पर शांति व सुकून अहसास सदैव होता है। मंदिर की विशालता और शैली से लेकर यहां का पौराणिक महत्व भी इसे एक अद्वितीय स्थान बनाता है।

नाग आज भी देते हैं प्रत्यक्ष दर्शन

भगवान विष्णु ने श्री देवनारायण के रूप में चट्टान फाड़कर कमल फूल की नाभि से अवतार लिया। बताते हैं कि इसी के पास एक और सुरंग से नाग राजा का अवतार हुआ था, जिस स्थान पर कमल का फूल निकला उस स्थान पर अनन्त सुरंग है और वर्तमान में उस सुरंग पर देवजी की मूर्ति विराजमान है। मंदिर की छत प्राकृतिक चट्टान से बनी हुई है। यहाँ अखंड ज्योत जलती रहती है । मालासेरी डूंगरी के दुर्लभ पत्थर के विषय में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का भी मानना है कि इस स्थान पर वास्तव में भूकंप आया था और पत्थर धरती से बाहर आए थे। यहां प्रत्येक दिन नाग राजा के लिए देसी गौ माता का दूध रखा जाता है। भाग्यशाली भक्तो को आज भी उनके दर्शन होते हैं।

नीम का एक पत्ता कड़वा, तो दूसरा मीठा

मालासेरी डूंगरी के मंदिर के ऊपर एक नीम का पेड़ स्थित है जो बहुत पुराना है। इस नीम के पेड़ की विशेषता है कि दो पत्ते एक साथ तोड़ने पर एक पत्ता कड़वा लगता है जबकि एक पत्ता कड़वा नहीं लगता है। यहां पूजा एक ही परिवार के गुर्जर समाज से पोसवाल गोत्र परिवार के भोपाजी करते आ रहे हैं। भीलवाड़ा जिले के आसींद से शाहपुरा रोड पर 12 किलोमीटर दूर भगवान देवनारायण की जन्म स्थली मालासेरी डूंगरी में पहाड़ी पर मंदिर बना है। Devnarayan Jayanti

devnarayan bhagwan : आसींद में ऐतिहासिक मंदिर

लोक देवता भगवान श्री देवनारायण का जन्म आसींद के मालासेरी डूंगरी में संवत 968 ईस्वी को माही सप्तमी को हुआ था। भगवान देवनारायण के पिता महाराज सवाई भोज थे, जिनका मंदिर आसींद में स्थित है। सवाई भोज चौहान गौत्र के गुर्जर जाति से थे। यह करीब 400 साल पुराना बताया जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण सवाई भोज नामक एक गुर्जर युवक के बलिदान की याद में किया गया था। उन्हें भेनई के राजा की पत्नी जैमती से प्यार हो गया। राजपूत शासक ने अपने चार भाइयों और माँ के साथ उस पर हमला किया और उसे मार डाला। यह मंदिर सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है। क्योंकि इसके बगल में बैदा दरगाह नाम की एक मस्जिद है। हालाँकि, इस मस्जिद में नमाज़ (मुसलमानों द्वारा की जाने वाली प्रार्थना) की पेशकश नहीं की जाती है और इसका केवल प्रतीकात्मक महत्व है। मंदिर परिसर में विभिन्न देवताओं को समर्पित कई छोटे मंदिर भी हैं।

यहां का पैनोरमा है आकर्षण का केंद्र

मालासेरी की डूंगरी पर भगवान देवनारायण के जन्म स्थान पर पैनोरमा भी बना हुआ है। करीब चार करोड़ रुपए की लागत से बने इस पैनोरमा में लोक देवता भगवान देवनारायण की जीवन-गाथा, शौर्य-शक्ति और भक्ति को दिखाया गया है। सवाई भोज, साडू माता और भगवान देवनारायण के एक साथ दर्शन इस पैनोरमा में किए जा सकते है। मंदिर के इतिहास को लेकर विभिन्न् झांकियों व चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

भक्तों के लिए भोजनशाला में नि:शुल्क भोजन

मालासेरी डूंगरी पर देवनारायण भगवान के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क भोजन की भी व्यवस्था है। यहां सुबह- शाम नियमित भोजनशाला चलती है। श्रद्धालु स्वैच्छिक तौर पर राशि दान कर सकते हैं। इसके अलावा श्रद्धालु खुद भी भोजन बना सकते हैं। श्रद्धालु यहां आकर नियमित प्रसादी भी करते हैं।

31 साल की उम्र में देवनारायण ने त्याग दी देह

देवनारायण का जन्म एक गुर्जर शासक सवाईभोजन के घर में हुआ था, जिन्होंने भीलवाड़ा (मेवाड़) में राजधानी थी। उन्होंने अपने पराक्रम से अत्याचारी शासकों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। एक कुशल शासक के साथ आध्यात्मिक रुझान होने के कारण लंबी साधना की। दिव्य शक्तियों से लोक कल्याण के लिए कई चमत्कारिक कार्य किए। इस तरह वे देव स्वरूप में बनते गए और गुर्जर समाज में भगवान विष्णु के अवतार स्वरूप पूजे जाने लगे। ब्यावर के समीप मसूदा में 31 वर्ष की अल्पायु में देह त्याग दी।

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