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Parsuram Mahadev : अरावली पहाड़ी में गुफा, अनवरत जलाभिषेक, चमत्कार व इतिहास की कहानी

Jaivardhan News March 8, 2024 1 minute read

Parsuram Mahadev mandir : अरावली की वादियों में मेवाड़ के अमरनाथ कहे जाने वाले परशुराम महादेव मंदिर का इतिहास और यहां के चमत्कार भी अनूठे है। मेवाड़ व मारवाड़ की सरहद पर स्थित परशुराम महादेव मंदिर पर दर्शनों के लिए हमेशा मेले सा माहौल बना रहता है। राजस्थान के राजसमंद व पाली जिले की सीमा पर स्थित अरावली की पहाड़ी की गोद में परशुराम महादेव गुफा मंदिर है। मान्यता है कि इसका निर्माण स्वंय परशुराम ने अपने फरसे से चट्टान को काटकर किया था। इस गुफा मंदिर तक जाने के लिए 500 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। इस गुफा मंदिर के अंदर एक स्वयं भू शिवलिंग है, जहां पर विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने भगवान शिव की कई वर्षो तक कठोर तपस्या की थी। ऐसी भी मान्यता है कि जहां पर यह शिवलिंग स्थापित है, उस गुफा को खुद परशुराम ने अपने फरसे से काटकर बनाया था। दुर्गम पहाड़ी, घुमावदार रास्ते, प्राकृतिक शिवलिंग, कल-कल करते झरने एवं प्राकृतिक सौंदर्य से ओत-प्रोत होने के कारण भक्तों ने इसे मेवाड़ के अमरनाथ का नाम दे दिया है। राजस्थान में मेवाड़ और मारवाड़ के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं। शायद यही वजह है कि हर साल लोग यहां सावन में भारी संख्या में भगवान के दर्शन करने आते हैं। खास बात यह है कि सावन के दिनों में मंदिर के चारों ओर का नजारा इतना मनोरम होता है मानो गुफा में बैठे भगवान परशुराम खुद प्रकृति की गोद में बैठ गए हों।

Mahadev Mandir : परशुराम महादेव मंदिर के इतिहास की कहानी

बताया जाता है कि परशुराम जी लाखों साल पहले त्रेता युग में मंदिर में बनी गुफा के रास्ते से यहां आए थे। यहां बैठकर भगवान शिव की गुप्त आराधना की। राजसमंद और पाली जिले की सीमा पर स्थित है चमत्कारिक परशुराम महादेव मंदिर का इतिहास सैकड़ों नहीं, बल्कि युगों पुराना है। मान्यता है कि इसी स्थान पर परशुराम ने भगवान शिव की तपस्या की थी और दिव्य अस्त्रों को प्राप्त किया था। परशुराम, भगवान विष्णु के छठवें अवतार हैं, लेकिन यह सर्वविदित है कि भगवान विष्णु व महादेव एक-दूसरे को ही अपना ईश्वर मानते हैं। इसके चलते परशुराम ने भी भगवान शिव की कठिन तपस्या की। माना जाता है कि महान तपस्वी परशुराम ने इस स्थान पर भगवान शिव की आराधना की और उनके दर्शन प्राप्त किए। अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित इस मंदिर का निर्माण उन्होंने ही किया था। परशुराम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें धनुष और अक्षय तरकश प्रदान किया। इसके अलावा जिस फरसे के लिए परशुराम जाने जाते हैं, वह फरसा भी उन्हें भगवान शिव से इसी स्थान पर प्राप्त हुआ था। इसके बाद उन्होंने अपने फरसे से ही चट्टानों को काटकर महादेव के इस गुफा मंदिर का निर्माण किया था। कहा जाता है कि पृथ्वी के 8 चिरंजीवियों में से एक परशुराम की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव, शिवलिंग के रूप में यहाँ स्थापित हुए। स्थानीय तौर पर इस मंदिर को अमरनाथ कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार अमरनाथ में भगवान शिव का साक्षात निवास माना जाता है।

गुफा मंदिर के लिए चढ़नी पड़ती है 500 सीढ़ियां

Parshuram mandir : गुफा मंदिर तक पहुँचने के लिए 500 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। समुद्र तल से मंदिर की ऊँचाई लगभग 3600 फुट है। गुफा मंदिर की दीवारों पर एक राक्षस की आकृति दिखाई देती है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसका संहार भी परशुराम द्वारा किया गया था। इसके अलावा मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय भगवान की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।

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जिसने परशुराम के दर्शन किए, खोल सकता है बद्रीनाथ के कपाट

ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति ने परशुराम महादेव के दर्शन किए होते हैं, वहीं व्यक्ति उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट खोल सकता है। यह भी माना जाता है कि यह वही स्थान है, जहाँ परशुराम ने पांडवों में सबसे ज्येष्ठ कर्ण को शिक्षा प्रदान की थी। हालाँकि कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न किया था, लेकिन जब परशुराम को इस बात का पता चला तो उन्होंने कर्ण को मौका आने पर सारी विद्या भूल जाने का श्राप दे दिया था। मंदिर में स्थापित शिवलिंग भी किसी रहस्य से कम नहीं है। दरअसल इस शिवलिंग में छिद्र हैं, इस कारण जब इसमें जल चढ़ाया जाता है, तो यह सैकड़ों लीटर जल को अपने अंदर समाहित कर लेता है, लेकिन जब शिवलिंग को दूध अर्पित किया जाता है तो यह दूध शिवलिंग में समाता ही नहीं है। यह एक ऐसा रहस्य है जो आज भी अनसुलझा है। हर साल श्रावण महीने में यहाँ मेला लगता है। इस मेले में शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और भगवान शिव के दर्शन के साथ परशुराम को भी नमन करते हैं।

मेवाड़- मारवाड़ दोनों तरफ से आने के रास्ते

राजस्थान में राजसमंद व पाली जिले की सीमा पर स्थित है परशुराम महादेव का मंदिर। अरावली की पहाड़ी है, जिसका निज मंदिर राजसमंद जिले की सीमा है, जबकि कुंड व अन्य परिसर पाली जिले में आता है। यहां राजसमंद प्रशासन द्वारा फुटा देवल पर मेला भरा जाता है, जबकि पाली जिले की तरफ से भी अलग मेला भरा जाता है।

आवाजाही के लिए सड़क और पैदल का सफर भी

परशुराम महादेव मंदिर का नजदीकी हवाई अड्डा महाराणा प्रताप एयरपोर्ट उदयपुर है, तो दूसरी तरफ किशनगढ़ व जोधपुर है। रेलमार्ग के तहत पाली, सिरोही, अजमेर, उदयपुर से होकर पहुंचा जा सकता है। परशुराम महादेव गुफा मंदिर कुंभलगढ़ किले से लगभग 9 किमी की दूरी पर स्थित है। परशुराम महादेव मंदिर का निर्माण कुछ इस प्रकार हुआ है कि गुफा राजसमंद जिले में आती है तो यहाँ स्थित जल कुंड पाली जिले में। परशुराम महान तपस्वी और भगवान के अवतार हैं। वे सप्त चिरंजीवियों में से एक हैं। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार वे आज भी इसी पृथ्वी पर तपस्या में लीन हैं। यह समुद्र तल से 3600 फीट ऊंचाई पर है।

Parshuram को इसी जगह से प्राप्त हुआ था फरसा

किवदंती है कि भगवान परशुराम ने कठोर तप कर भगवान शिव से धनुष और अक्षय तरकश प्राप्त किया था। उस तरकश के बाण कभी खत्म नहीं होते थे और धनुष हमेशा अचूक निशाना लगाता था। यहीं से उन्हें अपना प्रसिद्ध फरसा प्राप्त हुआ था। यह पूरी गुफा एक चट्टान पर बनी है। शिवलिंग पर गोमुख बना हुआ है जिससे भगवान शिव पर जलधारा गिरती है। गुफा में शिला पर एक राक्षस की आकृति भी बनी है। कहते हैं कि राक्षस का अंत परशुराम ने फरसे से किया था। स्थानीय लोग इसे अमरनाथ धाम कहते हैं क्योंकि जिस प्रकार कश्मीर स्थित अमरनाथ धाम में भगवान शिव साक्षात वास करते हैं उसी प्रकार यहां भी शिव का अखंड निवास है।

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