
rajkumar roat biography : राजस्थान की आदिवासी बहुल बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा सीट से सांसद बने राजकुमार रोत आज देशभर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। बेहद साधारण परिवार से निकलकर मात्र 32 साल की उम्र में विधायक से सांसद बनने तक का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और जनसेवा की मिसाल माना जा रहा है।
कभी शिक्षक बनने का सपना देखने वाले राजकुमार रोत आज आदिवासी समाज की बुलंद आवाज बन चुके हैं। उन्होंने बांसवाड़ा लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार और वरिष्ठ नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीया को हराकर बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की। राजकुमार रोत का राजनीतिक सफर केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे युवा की कहानी है जिसने कठिन परिस्थितियों में पलकर समाज सेवा के जरिए लोगों का भरोसा जीता और राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। राजकुमार रोत का जन्म 26 जून 1992 को राजस्थान के डूंगरपुर जिले के खाखर खुणया गांव में हुआ था। यह गांव जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है। उनके पिता का नाम शंकरलाल और माता का नाम पार्वती है। रोत की पत्नी का नाम गीता खराड़ी और उनका एक बच्चा है। बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, जिसके बाद परिवार आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से गुजरता रहा। कठिन हालातों में पले-बढ़े राजकुमार ने गरीबी, संघर्ष और समाज की समस्याओं को बहुत करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन की प्रेरणा बने।
शिक्षक बनने का था सपना

Rajkumar Roat education qualification : राजकुमार रोत का सपना राजनीति में आने का नहीं, बल्कि शिक्षक बनने का था। शिक्षा के प्रति लगाव के कारण उन्होंने स्नातक के बाद बीएड की पढ़ाई की। वे मानते थे कि शिक्षा ही समाज को बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है। इसी सोच के साथ उन्होंने पढ़ाई पूरी की और युवाओं तथा आदिवासी समाज में जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया। हालांकि समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि समाज की समस्याओं को बड़े स्तर पर उठाने के लिए राजनीति एक प्रभावी मंच हो सकता है। इसके बाद उन्होंने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की।
कॉलेज लाइफ से शुरू हुआ नेतृत्व

Rajkumar Roat Profile : राजकुमार रोत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय सरकारी स्कूल में पूरी की। इसके बाद उन्होंने डूंगरपुर कॉलेज से बीए और बीएड की पढ़ाई की। कॉलेज के दिनों में ही वे छात्र राजनीति से जुड़ गए। उन्होंने भीलप्रदेश विद्यार्थी मोर्चा (BPVM) नाम से छात्र संगठन बनाया और उसके अध्यक्ष भी रहे। यही वह दौर था जब उन्होंने आदिवासी युवाओं को शिक्षा, अधिकार और सामाजिक जागरूकता के लिए संगठित करना शुरू किया। कॉलेज के समय से ही उनकी पहचान एक तेजतर्रार और जुझारू युवा नेता के रूप में बनने लगी थी।
2018 में बने राजस्थान के सबसे युवा विधायक

Rajkumar Roat family : राजकुमार रोत ने वर्ष 2018 में भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के टिकट पर चौरासी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। उस समय उनकी उम्र बेहद कम थी, लेकिन उन्होंने अपने जनसंपर्क और सामाजिक कार्यों के दम पर बड़ी जीत हासिल की। वे राजस्थान विधानसभा के सबसे युवा विधायकों में शामिल हुए। आदिवासी इलाकों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। विधानसभा में उन्होंने आदिवासी अधिकार, शिक्षा, रोजगार, पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाया। यही कारण रहा कि वे कम समय में ही आदिवासी समाज की प्रमुख आवाज बन गए।

दूसरी बार विधायक बनने के बाद सांसद बने
Rajkumar Roat village : 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में राजकुमार रोत ने भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के उम्मीदवार के रूप में दोबारा चुनाव लड़ा। उन्होंने करीब 70 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। लेकिन दूसरी बार विधायक बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में बांसवाड़ा-डूंगरपुर सीट से उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा उम्मीदवार महेंद्रजीत सिंह मालवीया को करीब 2 लाख 47 हजार वोटों से हराया। यह जीत पूरे राजस्थान की राजनीति में बड़ी चर्चा का विषय बनी, क्योंकि उनके सामने भाजपा के दिग्गज नेताओं की मजबूत चुनौती थी।
भारत आदिवासी पार्टी की स्थापना

राजकुमार रोत ने आदिवासी समाज के मुद्दों को मजबूत आवाज देने के लिए भारत आदिवासी पार्टी (BAP) को आगे बढ़ाया। उनका कहना है कि आदिवासी समाज को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि शिक्षा, रोजगार, संस्कृति और अधिकारों के स्तर पर मजबूत करना जरूरी है। पार्टी में प्रत्याशी चयन की एक अनोखी प्रक्रिया अपनाई जाती है। उम्मीदवारों का चयन समाज की “जाजम” यानी सामूहिक बैठक में लोगों की सहमति और समर्थन के आधार पर किया जाता है।
आदिवासी अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष
राजकुमार रोत आदिवासी समुदाय के भूमि अधिकार, वन अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को लेकर लगातार मुखर रहे हैं। उन्होंने कई बार विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। उनका फोकस ग्रामीण इलाकों में सड़क, बिजली, पानी और रोजगार की सुविधाओं को बेहतर बनाने पर भी रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष जोर
राजकुमार रोत का मानना है कि आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत शिक्षा है। इसी वजह से उन्होंने अपने क्षेत्र में स्कूलों और कॉलेजों की स्थिति सुधारने पर जोर दिया। वे स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी लगातार सक्रिय रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने कई बार सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

आदिवासी संस्कृति को दिलाई नई पहचान
राजकुमार रोत आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को भी बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजनों के जरिए आदिवासी परंपराओं को बढ़ावा देते रहे हैं। संसद में शपथ ग्रहण के दौरान भी वे आदिवासी वेशभूषा में नजर आए, जिसकी काफी चर्चा हुई थी। उनका कहना है कि आदिवासी समाज की संस्कृति और पहचान देश की अमूल्य धरोहर है।
विवादों में भी रहे चर्चा में
वर्ष 2024 में राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के आदिवासी समाज को लेकर दिए गए बयान के बाद राजकुमार रोत चर्चा में आए थे। उन्होंने विरोध जताते हुए राज्यभर से डीएनए और रक्त नमूने इकट्ठा करने का अभियान शुरू किया। जयपुर स्थित अमर जवान ज्योति पर उन्होंने खुद भी रक्त नमूना दिया था। इस मुद्दे ने प्रदेशभर में राजनीतिक बहस को तेज कर दिया था।

जनता के बीच मजबूत पकड़
राजकुमार रोत की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क माना जाता है। वे लगातार अपने क्षेत्र में लोगों के बीच सक्रिय रहते हैं और आमजन की समस्याओं को सुनते हैं। ग्रामीण इलाकों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। खासतौर पर युवा और आदिवासी वर्ग उन्हें अपने अधिकारों की आवाज के रूप में देखता है।
संघर्ष से संसद तक का सफर बना प्रेरणा
राजकुमार रोत का जीवन उन युवाओं के लिए प्रेरणा माना जा रहा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। एक छोटे गांव से निकलकर शिक्षक बनने का सपना देखने वाला युवक आज देश की संसद में अपने क्षेत्र और आदिवासी समाज की आवाज बुलंद कर रहा है। उनकी कहानी बताती है कि मेहनत, संघर्ष और समाज सेवा के दम पर कोई भी व्यक्ति बड़ी सफलता हासिल कर सकता है।



