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श्रावण माह में की जाने वाली भगवान शिव की लक्ष पूजा का वर्णन

Jaivardhan News July 7, 2023 1 minute read

श्रावण मास महात्म्य (तीसरा अध्याय)
सनत्कुमार बोले – हे भगवन ! आपने श्रावण मासों का संक्षिप्त वर्णन किया है, हे स्वामिन ! इससे हमारी तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप कृपा कर के विस्तार से वर्णन करें. जिसे सुनकर हे सुरेश्वर ! मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा।

ईश्वर बोले – हे योगीश ! जो बुद्धिमान नक्तव्रत के द्वारा श्रावण मास को व्यतीत करता है, वह बारहों महीने में नक्तव्रत करने के फल का भागी होता है. नक्तव्रत में दिन की समाप्ति के पूर्व सन्यासियों के लिए एवं रात्रि में गृहस्थों के लिए भोजन का विधान है। उसमें सूर्यास्त के बाद की तीन घड़ियों को छोड़कर नक्तभोजन का समय होता है, सूर्य के अस्त होने के पश्चात तीन घडी संध्या काल होता है. संध्या वेला में आहार, मैथुन, निद्रा और चौथा स्वाध्याय – इन चारों कर्मों का त्याग कर देना चाहिए, गृहस्थ और यति के भेद से उनकी व्यवस्था के विषय में मुझसे सुनिए. सूर्य के मंद पड़ जाने पर जब अपनी छाया अपने शरीर से दुगुनी हो जाए, उस समय के भोजन को यति के लिए नक्त भोजन कहा गया है, रात्रि भोजन उनके लिए नक्त भोजन नहीं होता है।

तारों के दृष्टिगत होने पर विद्वानों ने गृहस्थ के लिए नक्त कहा है. यति के लिए दिन के आठवें भाग के शेष रहने पर भोजन का विधान है, उसके लिए रात्रि में भोजन का निषेध किया गया है. गृहस्थ को चाहिए कि वह विधिपूर्वक रात्रि में नक्त भोजन करे और यति, विधवा तथा विधुर व्यक्ति सूर्य के रहते नक्तव्रत करें. विधुर व्यक्ति यदि पुत्रवान हो तब उसे भी रात्रि में ही नक्तव्रत करना चाहिए, अनाश्रमी हो अथवा आश्रमी हो अथवा पत्नीरहित हो अथवा पुत्रवान हो – उन्हें रात्रि में नक्तव्रत करना चाहिए।

इस प्रकार बुद्धिमान मनुष्य को अपने अधिकार के अनुसार नक्तव्रत करना चाहिए, इस मास में नक्तव्रत करने वाला व्यक्ति परम गति प्राप्त करता है. “मैं प्रातःकाल स्नान करूँगा, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा, नक्तभोजन करूँगा, पृथ्वी पर सोऊँगा और प्राणियों पर दया करूँगा. हे देव ! इस व्रत को प्रारम्भ करने पर यदि मैं मर जाऊँ तो हे जगत्पते ! आपकी कृपा से मेरा व्रत पूर्ण हो” – ऐसा संकल्प करके बुद्धिमान व्यक्ति को श्रावण मास में प्रतिदिन नक्तव्रत करना चाहिए. इस प्रकार नक्तव्रत करने वाला मुझे अत्यंत प्रिय होता है। ब्राह्मण के द्वारा अथवा स्वयं ही अतिरुद्र, महारुद्र अथवा रुद्रमंत्र से महीने भर प्रतिदिन अभिषेक करना चाहिए. हे वत्स ! मैं उस व्यक्ति पर प्रसन्न हो जाता हूँ, क्योंकि मैं जलधारा से अत्यंत प्रीति रखने वाला हूँ अथवा रुद्रमंत्र के द्वारा मेरे लिए अत्यंत प्रीतिकर होम प्रतिदिन करना चाहिए. अपने लिए जो भी भोज्य पदार्थ अथवा सुखोपभोग की वस्तु अतिप्रिय हो, संकल्प करके उन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रदान करके स्वयं महीने भर उन पदार्थों का त्याग करना चाहिए।

हे मुने! अब इसके बाद उत्तम लक्षपूजाविधि को सुनिए. लक्ष्मी चाहने वाले अथवा शान्ति की इच्छा वाले मनुष्य को लक्ष विल्वपत्रों या लक्ष दूर्वादलों से शिव की पूजा करनी चाहिए. आयु की कामना करने वाले को चम्पा के लक्ष पुष्पों तथा विद्या चाहने वाले व्यक्ति को मल्लिका या चमेली के लक्ष पुष्पों से श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए. शिव तथा विष्णु की प्रसन्नता तुलसी के दलों से सिद्ध होती है. पुत्र की कामना करने वाले को कटेरी के दलों से शिव तथा विष्णु का पूजन करना चाहिए।
बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए धान्य से पूजन करना प्रशस्त होता है. देव के समक्ष निर्मित किए गए रंगवल्ली आदि से विभिन्न रंगों से रचित पद्म, स्वस्तिक और चक्र आदि से प्रभु की पूजा करनी चाहिए. इस प्रकार सभी मनोरथों की सिद्धि के लिए सभी प्रकार के पुष्पों से यदि मनुष्य लक्ष पूजा करे तो शिवजी प्रसन्न होंगे. तत्पश्चात उद्यापन करना चाहिए. मंडप निर्माण करना चाहिए और मंडप के त्रिभाग परिमाण में वेदिका बनानी चाहिए. तदनन्तर पुण्याहवाचन कर के आचार्य का वरण करना चाहिए और उस मंडप में प्रविष्ट होकर गीत तथा वाद्य के शब्दों और तीव्र वेदध्वनि से रात्रि में जागरण करना चाहिए।
वेदिका के ऊपर उत्तम लिंगतोभद्र बनाना चाहिए और उसके बीच में चावलों से सुन्दर कैलाश का निर्माण करना चाहिए. उसके ऊपर तांबे का अत्यंत चमकीला तथा पंचपल्लवयुक्त कलश स्थापित करना चाहिए और उसे रेशमी वस्त्र से वेष्टित कर देना चाहिए, उसके ऊपर पार्वतीपति शिव की सुवर्णमय प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए. तत्पश्चात पंचामृतपूर्वक धूप, दीप तथा नैवेद्य से उस प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए और गीत, वाद्य, नृत्य तथा वेद, शास्त्र तथा पुराणों के पाठ के द्वारा रात्रि में जागरण करना चाहिए। इसके बाद प्रातःकाल भली भाँति स्नान कर के पवित्र हो जाना चाहिए और अपनी शाखा में निर्दिष्ट विधान के अनुसार वेदिका निर्माण करना चाहिए. तत्पश्चात मूल मन्त्र से या गायत्री मन्त्र से या शिव के सहस्त्रनामों के द्वारा तिल तथा घृतमिश्रित खीर से होम कराना चाहिए अथवा जिस मन्त्र से पूजा की गई है, उसी से होम करके पूर्णाहुति डालनी चाहिए. इसके बाद वस्त्र, अलंकार तथा भूषणों से भली-भाँति आचार्य का पूजन करना चाहिए।

तत्पश्चात अन्य ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए और उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए. जिस-जिस वस्तु से उमापति शिव की लक्षपूजा की हो उसका दान करना चाहिए. स्वर्णमयी मूर्त्ति बनाकर शिव की पूजा करनी चाहिए. यदि दीपकर्म किया हो तो उस दीपक का दान करना चाहिए. चांदी का दीपक और स्वर्ण की वर्तिका अर्थात बत्ती बनाकर उसे गोघृत से भर कर सभी कामनाओं और अर्थ की सिद्धि के लिए उसका दान करना चाहिए. इसके बाद प्रभु से क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिए और अंत में एक सौ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए. हे मुने ! जो व्यक्ति इस प्रकार पूजा करता है, मैं उस पर प्रसन्न होता हूँ. उसमें भी जो श्रावण मास में पूजा करता है, उसका अनंत फल मिलता है। यदि अपने लिए अत्यंत प्रिय कोई वस्तु मुझे अर्पण करने के विचार से इस मास में कोई त्यागता है तो अब उसका फल सुनिए. इस लोक में तथा परलोक में उसकी प्राप्ति लाख गुना अधिक होती है. सकाम करने से अभिलषित सिद्धि होती है और निष्काम करने से परम गति मिलती है. इस मास में रुद्राभिषेक करने वाला मनुष्य उसके पाठ की अक्षर-संख्या से एक-एक अक्षर के लिए करोड़-करोड़ वर्षों तक रुद्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है. पंचामृत का अभिषेक करने से मनुष्य अमरत्व प्राप्त करता है।

इस मास में जो मनुष्य भूमि पर शयन करता है, उसका फल भी मुझसे सुनिए. हे द्विजश्रेष्ठ ! वह मनुष्य नौ प्रकार के रत्नों से जड़ी हुई, सुन्दर वस्त्र से आच्छादित, बिछे हुए कोमल गद्दे से सुशोभित, देश तकियों से युक्त, रम्य स्त्रियों से विभूषित, रत्ननिर्मित दीपों से मंडित तथा अत्यंत मृदु और गरुडाकार प्रवालमणिनिर्मित अथवा हाथी दाँत की बनी हुई अथवा चन्दन की बनी हुई उत्तम तथा शुभ शय्या प्राप्त करता है. इस मास में ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य की दृढ पुष्टि होती है, ओज, बल, शरीर की दृढ़ता और जो भी धर्म के विषय में उपकारक होते हैं – वह सब उसे प्राप्त हो जाता है. निष्काम ब्रह्मचर्य व्रती को साक्षात ब्रह्मप्राप्ति होती है और सकाम को स्वर्ग तथा सुन्दर देवांगनाओं की प्राप्ति होती है। इस मास में दिन-रात अथवा केवल दिन में अथवा भोजन के समय मौनव्रत धारण करने वाला भी महान वक्ता हो जाता है. व्रत के अंत में घंटा और पुस्तक का दान करना चाहिए। मौनव्रत के माहात्म्य से मनुष्य सभी शास्त्रों में कुशल तथा वेद-वेदांग में पारंगत हो जाता है तथा बुद्धि में बृहस्पति के समान हो जाता है. मौन धारण करने वाले का किसी से कलह नहीं होता अतः मौनव्रत अत्यंत उत्कृष्ट है।

।। श्री शिव चालीसा ।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान।।

जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला।।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के।।

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन छार लगाये।।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देख नाग मुनि मोहे।।

मैना मातु की ह्वै दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी।।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी।।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे।।

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ।।

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा।।

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी।।

तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ।।

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा।।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई।।

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी।।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं।।

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई।।

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला।
जरे सुरासुर भये विहाला।।

कीन्ह दया तहँ करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई।।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा।।

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी।।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई।।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भये प्रसन्न दिए इच्छित वर।।

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी।।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै।।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यहि अवसर मोहि आन उबारो।।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो।।

मातु पिता भ्राता सब कोई।
संकट में पूछत नहिं कोई।।

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु अब संकट भारी।।

धन निर्धन को देत सदाहीं।
जो कोई जांचे वो फल पाहीं।।

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी।।

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन।।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
नारद शारद शीश नवावैं।।

नमो नमो जय नमो शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय।।

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पार होत है शम्भु सहाई।।

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी।।

पुत्र हीन कर इच्छा कोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई।।

पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे।।

त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा।
तन नहीं ताके रहे कलेशा।।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे।।

जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्तवास शिवपुर में पावे।।

कहे अयोध्या आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी।।

दोहा-
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश।।

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्यान।।

महावीर व्यास
बामनिया कलां,
राजसमंद

मो. 7976384565

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